सतगुरु ने 'रामनाम' जैसी दिव्य वस्तु का दान शिष्य को दिया। शिष्य के पास प्रतिदान के लिए कोई भी उपयुक्त पदार्थ नहीं है। शिष्य के मन में हौसला, अभिलाषा, आकांक्षा अपूर्ण एवं बलवती बनी हुई है कि सतगुरु के महान् व्यक्तित्व की अनुकूल कौन-सी वस्तु प्रतिदान में दी जाय।
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
संदर्भ—सतगुरु दिव्यशक्ति से सम्पन्न है। उनकी महत्ता, महिमा अनिर्वचनीय है। उन्होंने अनन्त कृपा करके शिष्य को अपरिमेय शक्ति प्रदान की। राम नाम कै पटंतरै देबै कौं कुछ नाँहि। क्या ले गुरु संतोषिए, हौस रही मन माँहि॥
Kabir 1.4
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Translations & commentaries(2)
Sūtra — Translation
Padārtha — Word-meaning
पटंतरै—समान, बराबर। देवै—देने योग्य। कौ—को। ले—दे, देकर। सन्तोषिए—प्रसन्न कीजिए। हौसं = हौसला—इच्छा, आकांक्षा। मनमाँहि मन में।