Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali) · Chapter 19
Kavita Kosh दोहावली — पृष्ठ २
कबीर दोहावली / पृष्ठ २
92 verses
तब लग तारा जगमगे, जब लग उगे न सूर । तब लग जीव जग कर्मवश, ज्यों लग ज्ञान न पूर ॥
आस पराई राख्त, खाया घर का खेत । औरन को प्त बोधता, मुख में पड़ रेत ॥
सोना, सज्जन, साधु जन, टूट जुड़ै सौ बार । दुर्जन कुम्भ कुम्हार के, ऐके धका दरार ॥
सब धरती कारज करूँ, लेखनी सब बनराय । सात समुद्र की मसि करूँ गुरुगुन लिखा न जाय ॥
बलिहारी वा दूध की, जामे निकसे घीव । घी साखी कबीर की, चार वेद का जीव ॥
आग जो लागी समुद्र में, धुआँ न प्रकट होय । सो जाने जो जरमुआ, जाकी लाई होय ॥
साधु गाँठि न बाँधई, उदर समाता लेय । आगे-पीछे हरि खड़े जब भोगे तब देय ॥
कबिरा खालिक जागिया, और ना जागे कोय । जाके विषय विष भरा, दास बन्दगी होय ॥
ऊँचे कुल में जामिया, करनी ऊँच न होय । सौरन कलश सुरा, भरी, साधु निन्दा सोय ॥
सुमरण की सुब्यों करो ज्यों गागर पनिहार । होले-होले सुरत में, कहैं कबीर विचार ॥
सब आए इस एक में, डाल-पात फल-फूल । कबिरा पीछा क्या रहा, गह पकड़ी जब मूल ॥
जो जन भीगे रामरस, विगत कबहूँ ना रूख । अनुभव भाव न दरसते, ना दु:ख ना सुख ॥
सिंह अकेला बन रहे, पलक-पलक कर दौर । जैसा बन है आपना, तैसा बन है और ॥
यह माया है चूहड़ी, और चूहड़ा कीजो । बाप-पूत उरभाय के, संग ना काहो केहो ॥
जहर की जर्मी में है रोपा, अभी खींचे सौ बार । कबिरा खलक न तजे, जामे कौन विचार ॥
जग मे बैरी कोई नहीं, जो मन शीतल होय । यह आपा तो डाल दे, दया करे सब कोय ॥
जो जाने जीव न आपना, करहीं जीव का सार । जीवा ऐसा पाहौना, मिले ना दूजी बार ॥
कबीर जात पुकारया, चढ़ चन्दन की डार । बाट लगाए ना लगे फिर क्या लेत हमार ॥
लोग भरोसे कौन के, बैठे रहें उरगाय । जीय रही लूटत जम फिरे, मैँढ़ा लुटे कसाय ॥
एक कहूँ तो है नहीं, दूजा कहूँ तो गार । है जैसा तैसा हो रहे, रहें कबीर विचार ॥
जो तु चाहे मुक्त को, छोड़े दे सब आस । मुक्त ही जैसा हो रहे, बस कुछ तेरे पास ॥
साँई आगे साँच है, साँई साँच सुहाय । चाहे बोले केस रख, चाहे घौंट भुण्डाय ॥
अपने-अपने साख की, सबही लीनी मान । हरि की बातें दुरन्तरा, पूरी ना कहूँ जान ॥
खेत ना छोड़े सूरमा, जूझे दो दल मोह । आशा जीवन मरण की, मन में राखें नोह ॥
लीक पुरानी को तजें, कायर कुटिल कपूत । लीख पुरानी पर रहें, शातिर सिंह सपूत ॥
सन्त पुरुष की आरसी, सन्तों की ही देह । लखा जो चहे अलख को, उन्हीं में लख लेह ॥
भूखा-भूखा क्या करे, क्या सुनावे लोग । भांडा घड़ निज मुख दिया, सोई पूर्ण जोग ॥
गर्भ योगेश्वर गुरु बिना, लागा हर का सेव । कहे कबीर बैकुण्ठ से, फेर दिया शुक्देव ॥
प्रेमभाव एक चाहिए, भेष अनेक बनाय । चाहे घर में वास कर, चाहे बन को जाय ॥
कांचे भाडें से रहे, ज्यों कुम्हार का देह । भीतर से रक्षा करे, बाहर चोई देह ॥
साँई ते सब होते है, बन्दे से कुछ नाहिं । राई से पर्वत करे, पर्वत राई माहिं ॥
केतन दिन ऐसे गए, अन रुचे का नेह । अवसर बोवे उपजे नहीं, जो नहीं बरसे मेह ॥
एक ते अनन्त अन्त एक हो जाय । एक से परचे भया, एक मोह समाय ॥
साधु सती और सूरमा, इनकी बात अगाध । आशा छोड़े देह की, तन की अनथक साध ॥
हरि संगत शीतल भया, मिटी मोह की ताप । निशिवासर सुख निधि, लहा अन्न प्रगटा आप ॥
आशा का ईंधन करो, मनशा करो बभूत । जोगी फेरी यों फिरो, तब वन आवे सूत ॥
आग जो लगी समुद्र में, धुआँ ना प्रकट होय । सो जाने जो जरमुआ, जाकी लाई होय ॥
अपने-अपने साख की, सब ही लीनी भान । हरि की बात दुरन्तरा, पूरी ना कहूँ जान ॥
आस पराई राखता, खाया घर का खेत । और्न को पथ बोधता, मुख में डारे रेत ॥
आवत गारी एक है, उलटन होय अनेक । कह कबीर नहिं उलटिये, वही एक की एक ॥
आहार करे मनभावता, इंद्री की स्वाद । नाक तलक पूरन भरे, तो कहिए कौन प्रसाद ॥
आए हैं सो जाएँगे, राजा रंक फकीर । एक सिंहासन चढ़ि चले, एक बाँधि जंजीर ॥
आया था किस काम को, तू सोया चादर तान । सूरत सँभाल ए काफिला, अपना आप पह्चान ॥
उज्जवल पहरे कापड़ा, पान-सुपरी खाय । एक हरि के नाम बिन, बाँधा यमपुर जाय ॥
उतते कोई न आवई, पासू पूछूँ धाय । इतने ही सब जात है, भार लदाय लदाय ॥
अवगुन कहूँ शराब का, आपा अहमक होय । मानुष से पशुआ भया, दाम गाँठ से खोय ॥
ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोए । औरन को शीतल करे, आपौ शीतल होय ॥
कबीरा संग्ङति साधु की, जौ की भूसी खाय । खीर खाँड़ भोजन मिले, ताकर संग न जाय ॥
एक ते जान अनन्त, अन्य एक हो आय । एक से परचे भया, एक बाहे समाय ॥
कबीरा गरब न कीजिए, कबहूँ न हँसिये कोय । अजहूँ नाव समुद्र में, ना जाने का होय ॥
कबीरा कलह अरु कल्पना, सतसंगति से जाय । दुख बासे भागा फिरै, सुख में रहै समाय ॥
कबीरा संगति साधु की, जित प्रीत कीजै जाय । दुर्गति दूर वहावति, देवी सुमति बनाय ॥
कबीरा संगत साधु की, निष्फल कभी न होय । होमी चन्दन बासना, नीम न कहसी कोय ॥
को छूटौ इहिं जाल परि, कत फुरंग अकुलाय । ज्यों-ज्यों सुरझि भजौ चहै, त्यों-त्यों उरझत जाय ॥
काह भरोसा देह का, बिनस जात छिन मारहिं । साँस-साँस सुमिरन करो, और यतन कछु नाहिं ॥
काल करे से आज कर, सबहि सात तुव साथ । काल काल तू क्या करे काल काल के हाथ ॥
काया काढ़ा काल घुन, जतन-जतन सो खाय । काया बह्रा ईश बस, मर्म न काहूँ पाय ॥
कहा कियो हम आय कर, कहा करेंगे पाय । इनके भये न उतके, चाले मूल गवाय ॥
कुटिल बचन सबसे बुरा, जासे होत न हार । साधु वचन जल रूप है, बरसे अम्रत धार ॥
कहता तो बहूँना मिले, गहना मिला न कोय । सो कहता वह जान दे, जो नहीं गहना कोय ॥
कबीरा मन पँछी भया, भये ते बाहर जाय । जो जैसे संगति करै, सो तैसा फल पाय ॥
कबीरा लोहा एक है, गढ़ने में है फेर । ताहि का बखतर बने, ताहि की शमशेर ॥
कहे कबीर देय तू, जब तक तेरी देह । देह खेह हो जाएगी, कौन कहेगा देह ॥
करता था सो क्यों किया, अब कर क्यों पछिताय । बोया पेड़ बबूल का, आम कहाँ से खाय ॥
कस्तूरी कुन्डल बसे, म्रग ढ़ूंढ़े बन माहिं । ऐसे घट-घट राम है, दुनिया देखे नाहिं ॥
कबीरा सोता क्या करे, जागो जपो मुरार । एक दिना है सोवना, लांबे पाँव पसार ॥
कागा काको घन हरे, कोयल काको देय । मीठे शब्द सुनाय के, जग अपनो कर लेय ॥
कबिरा सोई पीर है, जो जा नैं पर पीर । जो पर पीर न जानइ, सो काफिर के पीर ॥
कबिरा मनहि गयन्द है, आकुंश दै-दै राखि । विष की बेली परि रहै, अम्रत को फल चाखि ॥
कबीर यह जग कुछ नहीं, खिन खारा मीठ । काल्ह जो बैठा भण्डपै, आज भसाने दीठ ॥
कबिरा आप ठगाइए, और न ठगिए कोय । आप ठगे सुख होत है, और ठगे दुख होय ॥
कथा कीर्तन कुल विशे, भव सागर की नाव । कहत कबीरा या जगत, नाहीं और उपाय ॥
कलि खोटा सजग आंधरा, शब्द न माने कोय । चाहे कहूँ सत आइना, सो जग बैरी होय ॥
कबीरा खालिक जागिया, और ना जागे कोय । जाके विषय विष भरा, दास बन्दगी होय ॥
गाँठि न थामहिं बाँध ही, नहिं नारी सो नेह । कह कबीर वा साधु की, हम चरनन की खेह ॥
खेत न छोड़े सूरमा, जूझे को दल माँह । आशा जीवन मरण की, मन में राखे नाँह ॥
चन्दन जैसा साधु है, सर्पहि सम संसार । वाके अग्ङ लपटा रहे, मन मे नाहिं विकार ॥
घी के तो दर्शन भले, खाना भला न तेल । दाना तो दुश्मन भला, मूरख का क्या मेल ॥
गारी ही सो ऊपजे, कलह कष्ट और भींच । हारि चले सो साधु हैं, लागि चले तो नीच ॥
चलती चक्की देख के, दिया कबीरा रोय । दुइ पट भीतर आइके, साबित बचा न कोय ॥
जा पल दरसन साधु का, ता पल की बलिहारी । राम नाम रसना बसे, लीजै जनम सुधारि ॥
जब लग भक्ति से काम है, तब लग निष्फल सेव । कह कबीर वह क्यों मिले, नि:कामा निज देव ॥
जो तोकूं काँटा बुवै, ताहि बोय तू फूल । तोकू फूल के फूल है, बाँकू है तिरशूल ॥
जा घट प्रेम न संचरे, सो घट जान समान । जैसे खाल लुहार की, साँस लेतु बिन प्रान ॥
ज्यों नैनन में पूतली, त्यों मालिक घर माहिं । मूर्ख लोग न जानिए, बहर ढ़ूंढ़त जांहि ॥
जाके मुख माथा नहीं, नाहीं रूप कुरूप । पुछुप बास तें पामरा, ऐसा तत्व अनूप ॥
जहाँ आप तहाँ आपदा, जहाँ संशय तहाँ रोग । कह कबीर यह क्यों मिटैं, चारों बाधक रोग ॥
जल की जमी में है रोपा, अभी सींचें सौ बार । कबिरा खलक न तजे, जामे कौन वोचार ॥
जहाँ ग्राहक तँह मैं नहीं, जँह मैं गाहक नाय । बिको न यक भरमत फिरे, पकड़ी शब्द की छाँय ॥
झूठे सुख को सुख कहै, मानता है मन मोद । जगत चबेना काल का, कुछ मुख में कुछ गोद ॥
जो तु चाहे मुक्ति को, छोड़ दे सबकी आस । मुक्त ही जैसा हो रहे, सब कुछ तेरे पास ॥
जो जाने जीव आपना, करहीं जीव का सार । जीवा ऐसा पाहौना, मिले न दीजी बार ॥