Sant Seva ParishadSant Seva ParishadSSP · sant seva
← Verse view|📖 Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali) · Ch 19
« Ch 18Ch 20 »

Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali) · अध्याय 19

Kavita Kosh दोहावली — पृष्ठ २

कबीर दोहावली / पृष्ठ २

  1. Kabir 19.1Open verse →

    तब लग तारा जगमगे, जब लग उगे न सूर । तब लग जीव जग कर्मवश, ज्यों लग ज्ञान न पूर ॥

  2. Kabir 19.2Open verse →

    आस पराई राख्त, खाया घर का खेत । औरन को प्त बोधता, मुख में पड़ रेत ॥

  3. Kabir 19.3Open verse →

    सोना, सज्जन, साधु जन, टूट जुड़ै सौ बार । दुर्जन कुम्भ कुम्हार के, ऐके धका दरार ॥

  4. Kabir 19.4Open verse →

    सब धरती कारज करूँ, लेखनी सब बनराय । सात समुद्र की मसि करूँ गुरुगुन लिखा न जाय ॥

  5. Kabir 19.5Open verse →

    बलिहारी वा दूध की, जामे निकसे घीव । घी साखी कबीर की, चार वेद का जीव ॥

  6. Kabir 19.6Open verse →

    आग जो लागी समुद्र में, धुआँ न प्रकट होय । सो जाने जो जरमुआ, जाकी लाई होय ॥

  7. Kabir 19.7Open verse →

    साधु गाँठि न बाँधई, उदर समाता लेय । आगे-पीछे हरि खड़े जब भोगे तब देय ॥

  8. Kabir 19.8Open verse →

    कबिरा खालिक जागिया, और ना जागे कोय । जाके विषय विष भरा, दास बन्दगी होय ॥

  9. Kabir 19.9Open verse →

    ऊँचे कुल में जामिया, करनी ऊँच न होय । सौरन कलश सुरा, भरी, साधु निन्दा सोय ॥

  10. Kabir 19.10Open verse →

    सुमरण की सुब्यों करो ज्यों गागर पनिहार । होले-होले सुरत में, कहैं कबीर विचार ॥

  11. Kabir 19.11Open verse →

    सब आए इस एक में, डाल-पात फल-फूल । कबिरा पीछा क्या रहा, गह पकड़ी जब मूल ॥

  12. Kabir 19.12Open verse →

    जो जन भीगे रामरस, विगत कबहूँ ना रूख । अनुभव भाव न दरसते, ना दु:ख ना सुख ॥

  13. Kabir 19.13Open verse →

    सिंह अकेला बन रहे, पलक-पलक कर दौर । जैसा बन है आपना, तैसा बन है और ॥

  14. Kabir 19.14Open verse →

    यह माया है चूहड़ी, और चूहड़ा कीजो । बाप-पूत उरभाय के, संग ना काहो केहो ॥

  15. Kabir 19.15Open verse →

    जहर की जर्मी में है रोपा, अभी खींचे सौ बार । कबिरा खलक न तजे, जामे कौन विचार ॥

  16. Kabir 19.16Open verse →

    जग मे बैरी कोई नहीं, जो मन शीतल होय । यह आपा तो डाल दे, दया करे सब कोय ॥

  17. Kabir 19.17Open verse →

    जो जाने जीव न आपना, करहीं जीव का सार । जीवा ऐसा पाहौना, मिले ना दूजी बार ॥

  18. Kabir 19.18Open verse →

    कबीर जात पुकारया, चढ़ चन्दन की डार । बाट लगाए ना लगे फिर क्या लेत हमार ॥

  19. Kabir 19.19Open verse →

    लोग भरोसे कौन के, बैठे रहें उरगाय । जीय रही लूटत जम फिरे, मैँढ़ा लुटे कसाय ॥

  20. Kabir 19.20Open verse →

    एक कहूँ तो है नहीं, दूजा कहूँ तो गार । है जैसा तैसा हो रहे, रहें कबीर विचार ॥

  21. Kabir 19.21Open verse →

    जो तु चाहे मुक्त को, छोड़े दे सब आस । मुक्त ही जैसा हो रहे, बस कुछ तेरे पास ॥

  22. Kabir 19.22Open verse →

    साँई आगे साँच है, साँई साँच सुहाय । चाहे बोले केस रख, चाहे घौंट भुण्डाय ॥

  23. Kabir 19.23Open verse →

    अपने-अपने साख की, सबही लीनी मान । हरि की बातें दुरन्तरा, पूरी ना कहूँ जान ॥

  24. Kabir 19.24Open verse →

    खेत ना छोड़े सूरमा, जूझे दो दल मोह । आशा जीवन मरण की, मन में राखें नोह ॥

  25. Kabir 19.25Open verse →

    लीक पुरानी को तजें, कायर कुटिल कपूत । लीख पुरानी पर रहें, शातिर सिंह सपूत ॥

  26. Kabir 19.26Open verse →

    सन्त पुरुष की आरसी, सन्तों की ही देह । लखा जो चहे अलख को, उन्हीं में लख लेह ॥

  27. Kabir 19.27Open verse →

    भूखा-भूखा क्या करे, क्या सुनावे लोग । भांडा घड़ निज मुख दिया, सोई पूर्ण जोग ॥

  28. Kabir 19.28Open verse →

    गर्भ योगेश्वर गुरु बिना, लागा हर का सेव । कहे कबीर बैकुण्ठ से, फेर दिया शुक्देव ॥

  29. Kabir 19.29Open verse →

    प्रेमभाव एक चाहिए, भेष अनेक बनाय । चाहे घर में वास कर, चाहे बन को जाय ॥

  30. Kabir 19.30Open verse →

    कांचे भाडें से रहे, ज्यों कुम्हार का देह । भीतर से रक्षा करे, बाहर चोई देह ॥

  31. Kabir 19.31Open verse →

    साँई ते सब होते है, बन्दे से कुछ नाहिं । राई से पर्वत करे, पर्वत राई माहिं ॥

  32. Kabir 19.32Open verse →

    केतन दिन ऐसे गए, अन रुचे का नेह । अवसर बोवे उपजे नहीं, जो नहीं बरसे मेह ॥

  33. Kabir 19.33Open verse →

    एक ते अनन्त अन्त एक हो जाय । एक से परचे भया, एक मोह समाय ॥

  34. Kabir 19.34Open verse →

    साधु सती और सूरमा, इनकी बात अगाध । आशा छोड़े देह की, तन की अनथक साध ॥

  35. Kabir 19.35Open verse →

    हरि संगत शीतल भया, मिटी मोह की ताप । निशिवासर सुख निधि, लहा अन्न प्रगटा आप ॥

  36. Kabir 19.36Open verse →

    आशा का ईंधन करो, मनशा करो बभूत । जोगी फेरी यों फिरो, तब वन आवे सूत ॥

  37. Kabir 19.37Open verse →

    आग जो लगी समुद्र में, धुआँ ना प्रकट होय । सो जाने जो जरमुआ, जाकी लाई होय ॥

  38. Kabir 19.38Open verse →

    अपने-अपने साख की, सब ही लीनी भान । हरि की बात दुरन्तरा, पूरी ना कहूँ जान ॥

  39. Kabir 19.39Open verse →

    आस पराई राखता, खाया घर का खेत । और्न को पथ बोधता, मुख में डारे रेत ॥

  40. Kabir 19.40Open verse →

    आवत गारी एक है, उलटन होय अनेक । कह कबीर नहिं उलटिये, वही एक की एक ॥

  41. Kabir 19.41Open verse →

    आहार करे मनभावता, इंद्री की स्वाद । नाक तलक पूरन भरे, तो कहिए कौन प्रसाद ॥

  42. Kabir 19.42Open verse →

    आए हैं सो जाएँगे, राजा रंक फकीर । एक सिंहासन चढ़ि चले, एक बाँधि जंजीर ॥

  43. Kabir 19.43Open verse →

    आया था किस काम को, तू सोया चादर तान । सूरत सँभाल ए काफिला, अपना आप पह्चान ॥

  44. Kabir 19.44Open verse →

    उज्जवल पहरे कापड़ा, पान-सुपरी खाय । एक हरि के नाम बिन, बाँधा यमपुर जाय ॥

  45. Kabir 19.45Open verse →

    उतते कोई न आवई, पासू पूछूँ धाय । इतने ही सब जात है, भार लदाय लदाय ॥

  46. Kabir 19.46Open verse →

    अवगुन कहूँ शराब का, आपा अहमक होय । मानुष से पशुआ भया, दाम गाँठ से खोय ॥

  47. Kabir 19.47Open verse →

    ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोए । औरन को शीतल करे, आपौ शीतल होय ॥

  48. Kabir 19.48Open verse →

    कबीरा संग्ङति साधु की, जौ की भूसी खाय । खीर खाँड़ भोजन मिले, ताकर संग न जाय ॥

  49. Kabir 19.49Open verse →

    एक ते जान अनन्त, अन्य एक हो आय । एक से परचे भया, एक बाहे समाय ॥

  50. Kabir 19.50Open verse →

    कबीरा गरब न कीजिए, कबहूँ न हँसिये कोय । अजहूँ नाव समुद्र में, ना जाने का होय ॥

  51. Kabir 19.51Open verse →

    कबीरा कलह अरु कल्पना, सतसंगति से जाय । दुख बासे भागा फिरै, सुख में रहै समाय ॥

  52. Kabir 19.52Open verse →

    कबीरा संगति साधु की, जित प्रीत कीजै जाय । दुर्गति दूर वहावति, देवी सुमति बनाय ॥

  53. Kabir 19.53Open verse →

    कबीरा संगत साधु की, निष्फल कभी न होय । होमी चन्दन बासना, नीम न कहसी कोय ॥

  54. Kabir 19.54Open verse →

    को छूटौ इहिं जाल परि, कत फुरंग अकुलाय । ज्यों-ज्यों सुरझि भजौ चहै, त्यों-त्यों उरझत जाय ॥

  55. Kabir 19.55Open verse →

    काह भरोसा देह का, बिनस जात छिन मारहिं । साँस-साँस सुमिरन करो, और यतन कछु नाहिं ॥

  56. Kabir 19.56Open verse →

    काल करे से आज कर, सबहि सात तुव साथ । काल काल तू क्या करे काल काल के हाथ ॥

  57. Kabir 19.57Open verse →

    काया काढ़ा काल घुन, जतन-जतन सो खाय । काया बह्रा ईश बस, मर्म न काहूँ पाय ॥

  58. Kabir 19.58Open verse →

    कहा कियो हम आय कर, कहा करेंगे पाय । इनके भये न उतके, चाले मूल गवाय ॥

  59. Kabir 19.59Open verse →

    कुटिल बचन सबसे बुरा, जासे होत न हार । साधु वचन जल रूप है, बरसे अम्रत धार ॥

  60. Kabir 19.60Open verse →

    कहता तो बहूँना मिले, गहना मिला न कोय । सो कहता वह जान दे, जो नहीं गहना कोय ॥

  61. Kabir 19.61Open verse →

    कबीरा मन पँछी भया, भये ते बाहर जाय । जो जैसे संगति करै, सो तैसा फल पाय ॥

  62. Kabir 19.62Open verse →

    कबीरा लोहा एक है, गढ़ने में है फेर । ताहि का बखतर बने, ताहि की शमशेर ॥

  63. Kabir 19.63Open verse →

    कहे कबीर देय तू, जब तक तेरी देह । देह खेह हो जाएगी, कौन कहेगा देह ॥

  64. Kabir 19.64Open verse →

    करता था सो क्यों किया, अब कर क्यों पछिताय । बोया पेड़ बबूल का, आम कहाँ से खाय ॥

  65. Kabir 19.65Open verse →

    कस्तूरी कुन्डल बसे, म्रग ढ़ूंढ़े बन माहिं । ऐसे घट-घट राम है, दुनिया देखे नाहिं ॥

  66. Kabir 19.66Open verse →

    कबीरा सोता क्या करे, जागो जपो मुरार । एक दिना है सोवना, लांबे पाँव पसार ॥

  67. Kabir 19.67Open verse →

    कागा काको घन हरे, कोयल काको देय । मीठे शब्द सुनाय के, जग अपनो कर लेय ॥

  68. Kabir 19.68Open verse →

    कबिरा सोई पीर है, जो जा नैं पर पीर । जो पर पीर न जानइ, सो काफिर के पीर ॥

  69. Kabir 19.69Open verse →

    कबिरा मनहि गयन्द है, आकुंश दै-दै राखि । विष की बेली परि रहै, अम्रत को फल चाखि ॥

  70. Kabir 19.70Open verse →

    कबीर यह जग कुछ नहीं, खिन खारा मीठ । काल्ह जो बैठा भण्डपै, आज भसाने दीठ ॥

  71. Kabir 19.71Open verse →

    कबिरा आप ठगाइए, और न ठगिए कोय । आप ठगे सुख होत है, और ठगे दुख होय ॥

  72. Kabir 19.72Open verse →

    कथा कीर्तन कुल विशे, भव सागर की नाव । कहत कबीरा या जगत, नाहीं और उपाय ॥

  73. Kabir 19.73Open verse →

    कलि खोटा सजग आंधरा, शब्द न माने कोय । चाहे कहूँ सत आइना, सो जग बैरी होय ॥

  74. Kabir 19.74Open verse →

    कबीरा खालिक जागिया, और ना जागे कोय । जाके विषय विष भरा, दास बन्दगी होय ॥

  75. Kabir 19.75Open verse →

    गाँठि न थामहिं बाँध ही, नहिं नारी सो नेह । कह कबीर वा साधु की, हम चरनन की खेह ॥

  76. Kabir 19.76Open verse →

    खेत न छोड़े सूरमा, जूझे को दल माँह । आशा जीवन मरण की, मन में राखे नाँह ॥

  77. Kabir 19.77Open verse →

    चन्दन जैसा साधु है, सर्पहि सम संसार । वाके अग्ङ लपटा रहे, मन मे नाहिं विकार ॥

  78. Kabir 19.78Open verse →

    घी के तो दर्शन भले, खाना भला न तेल । दाना तो दुश्मन भला, मूरख का क्या मेल ॥

  79. Kabir 19.79Open verse →

    गारी ही सो ऊपजे, कलह कष्ट और भींच । हारि चले सो साधु हैं, लागि चले तो नीच ॥

  80. Kabir 19.80Open verse →

    चलती चक्की देख के, दिया कबीरा रोय । दुइ पट भीतर आइके, साबित बचा न कोय ॥

  81. Kabir 19.81Open verse →

    जा पल दरसन साधु का, ता पल की बलिहारी । राम नाम रसना बसे, लीजै जनम सुधारि ॥

  82. Kabir 19.82Open verse →

    जब लग भक्ति से काम है, तब लग निष्फल सेव । कह कबीर वह क्यों मिले, नि:कामा निज देव ॥

  83. Kabir 19.83Open verse →

    जो तोकूं काँटा बुवै, ताहि बोय तू फूल । तोकू फूल के फूल है, बाँकू है तिरशूल ॥

  84. Kabir 19.84Open verse →

    जा घट प्रेम न संचरे, सो घट जान समान । जैसे खाल लुहार की, साँस लेतु बिन प्रान ॥

  85. Kabir 19.85Open verse →

    ज्यों नैनन में पूतली, त्यों मालिक घर माहिं । मूर्ख लोग न जानिए, बहर ढ़ूंढ़त जांहि ॥

  86. Kabir 19.86Open verse →

    जाके मुख माथा नहीं, नाहीं रूप कुरूप । पुछुप बास तें पामरा, ऐसा तत्व अनूप ॥

  87. Kabir 19.87Open verse →

    जहाँ आप तहाँ आपदा, जहाँ संशय तहाँ रोग । कह कबीर यह क्यों मिटैं, चारों बाधक रोग ॥

  88. Kabir 19.88Open verse →

    जल की जमी में है रोपा, अभी सींचें सौ बार । कबिरा खलक न तजे, जामे कौन वोचार ॥

  89. Kabir 19.89Open verse →

    जहाँ ग्राहक तँह मैं नहीं, जँह मैं गाहक नाय । बिको न यक भरमत फिरे, पकड़ी शब्द की छाँय ॥

  90. Kabir 19.90Open verse →

    झूठे सुख को सुख कहै, मानता है मन मोद । जगत चबेना काल का, कुछ मुख में कुछ गोद ॥

  91. Kabir 19.91Open verse →

    जो तु चाहे मुक्ति को, छोड़ दे सबकी आस । मुक्त ही जैसा हो रहे, सब कुछ तेरे पास ॥

  92. Kabir 19.92Open verse →

    जो जाने जीव आपना, करहीं जीव का सार । जीवा ऐसा पाहौना, मिले न दीजी बार ॥