Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali) · अध्याय 20
Kavita Kosh दोहावली — पृष्ठ ३
कबीर दोहावली / पृष्ठ ३
- Kabir 20.1Open verse →
ते दिन गये अकारथी, संगत भई न संत । प्रेम बिना पशु जीवना, भक्ति बिना भगवंत ॥
- Kabir 20.2Open verse →
तीर तुपक से जो लड़े, सो तो शूर न होय । माया तजि भक्ति करे, सूर कहावै सोय ॥
- Kabir 20.3Open verse →
तन को जोगी सब करे, मन को बिरला कोय । सहजै सब विधि पाइये, जो मन जोगी होय ॥
- Kabir 20.4Open verse →
तब लग तारा जगमगे, जब लग उगे नसूर । तब लग जीव जग कर्मवश, जब लग ज्ञान ना पूर ॥
- Kabir 20.5Open verse →
दुर्लभ मानुष जनम है, देह न बारम्बार । तरुवर ज्यों पत्ती झड़े, बहुरि न लागे डार ॥
- Kabir 20.6Open verse →
दस द्वारे का पींजरा, तामें पंछी मौन । रहे को अचरज भयौ, गये अचम्भा कौन ॥
- Kabir 20.7Open verse →
न्हाये धोये क्या हुआ, जो मन मैल न जाय । मीन सदा जल में रहै, धोये बास न जाय ॥
- Kabir 20.8Open verse →
पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ, पंडित भया न कोय । ढ़ाई आखर प्रेम का, पढ़ै सो पंड़ित होय ॥
- Kabir 20.9Open verse →
पानी केरा बुदबुदा, अस मानस की जात । देखत ही छिप जाएगा, ज्यों सारा परभात ॥
- Kabir 20.10Open verse →
पाहन पूजे हरि मिलें, तो मैं पूजौं पहार । याते ये चक्की भली, पीस खाय संसार ॥
- Kabir 20.11Open verse →
पत्ता बोला वृक्ष से, सुनो वृक्ष बनराय । अब के बिछुड़े ना मिले, दूर पड़ेंगे जाय ॥
- Kabir 20.12Open verse →
प्रेमभाव एक चाहिए, भेष अनेक बजाय । चाहे घर में बास कर, चाहे बन मे जाय ॥
- Kabir 20.13Open verse →
बन्धे को बँनधा मिले, छूटे कौन उपाय । कर संगति निरबन्ध की, पल में लेय छुड़ाय ॥
- Kabir 20.14Open verse →
बूँद पड़ी जो समुद्र में, ताहि जाने सब कोय । समुद्र समाना बूँद में, बूझै बिरला कोय ॥
- Kabir 20.15Open verse →
बाहर क्या दिखराइये, अन्तर जपिए राम । कहा काज संसार से, तुझे धनी से काम ॥
- Kabir 20.16Open verse →
बानी से पहचानिए, साम चोर की घात । अन्दर की करनी से सब, निकले मुँह की बात ॥
- Kabir 20.17Open verse →
बड़ा हुआ सो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर । पँछी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर ॥
- Kabir 20.18Open verse →
मूँड़ मुड़ाये हरि मिले, सब कोई लेय मुड़ाय । बार-बार के मुड़ते, भेड़ न बैकुण्ठ जाय ॥
- Kabir 20.19Open verse →
माया तो ठगनी बनी, ठगत फिरे सब देश । जा ठग ने ठगनी ठगो, ता ठग को आदेश ॥
- Kabir 20.20Open verse →
भज दीना कहूँ और ही, तन साधुन के संग । कहैं कबीर कारी गजी, कैसे लागे रंग ॥
- Kabir 20.21Open verse →
मथुरा भावै द्वारिका, भावे जो जगन्नाथ । साधु संग हरि भजन बिनु, कछु न आवे हाथ ॥
- Kabir 20.22Open verse →
माली आवत देख के, कलियान करी पुकार । फूल-फूल चुन लिए, काल हमारी बार ॥
- Kabir 20.23Open verse →
मैं रोऊँ सब जगत् को, मोको रोवे न कोय । मोको रोवे सोचना, जो शब्द बोय की होय ॥
- Kabir 20.24Open verse →
ये तो घर है प्रेम का, खाला का घर नाहिं । सीस उतारे भुँई धरे, तब बैठें घर माहिं ॥
- Kabir 20.25Open verse →
या दुनियाँ में आ कर, छाँड़ि देय तू ऐंठ । लेना हो सो लेइले, उठी जात है पैंठ ॥
- Kabir 20.26Open verse →
राम नाम चीन्हा नहीं, कीना पिंजर बास । नैन न आवे नीदरौं, अलग न आवे भास ॥
- Kabir 20.27Open verse →
राम बुलावा भेजिया, दिया कबीरा रोय । जो सुख साधु सगं में, सो बैकुंठ न होय ॥
- Kabir 20.28Open verse →
संगति सों सुख्या ऊपजे, कुसंगति सो दुख होय । कह कबीर तहँ जाइये, साधु संग जहँ होय ॥
- Kabir 20.29Open verse →
साहिब तेरी साहिबी, सब घट रही समाय । ज्यों मेहँदी के पात में, लाली रखी न जाय ॥
- Kabir 20.30Open verse →
साँझ पड़े दिन बीतबै, चकवी दीन्ही रोय । चल चकवा वा देश को, जहाँ रैन नहिं होय ॥
- Kabir 20.31Open verse →
संह ही मे सत बाँटे, रोटी में ते टूक । कहे कबीर ता दास को, कबहुँ न आवे चूक ॥
- Kabir 20.32Open verse →
साईं आगे साँच है, साईं साँच सुहाय । चाहे बोले केस रख, चाहे घौंट मुण्डाय ॥
- Kabir 20.33Open verse →
लकड़ी कहै लुहार की, तू मति जारे मोहिं । एक दिन ऐसा होयगा, मैं जारौंगी तोहि ॥
- Kabir 20.34Open verse →
हरिया जाने रुखड़ा, जो पानी का गेह । सूखा काठ न जान ही, केतुउ बूड़ा मेह ॥
- Kabir 20.35Open verse →
ज्ञान रतन का जतनकर माटी का संसार । आय कबीर फिर गया, फीका है संसार ॥
- Kabir 20.36Open verse →
ॠद्धि सिद्धि माँगो नहीं, माँगो तुम पै येह । निसि दिन दरशन शाधु को, प्रभु कबीर कहुँ देह ॥
- Kabir 20.37Open verse →
क्षमा बड़े न को उचित है, छोटे को उत्पात । कहा विष्णु का घटि गया, जो भुगु मारीलात ॥
- Kabir 20.38Open verse →
राम-नाम कै पटं तरै, देबे कौं कुछ नाहिं । क्या ले गुर संतोषिए, हौंस रही मन माहिं ॥
- Kabir 20.39Open verse →
बलिहारी गुर आपणौ, घौंहाड़ी कै बार । जिनि भानिष तैं देवता, करत न लागी बार ॥
- Kabir 20.40Open verse →
ना गुरु मिल्या न सिष भया, लालच खेल्या डाव । दुन्यू बूड़े धार में, चढ़ि पाथर की नाव ॥
- Kabir 20.41Open verse →
सतगुर हम सूं रीझि करि, एक कह्मा कर संग । बरस्या बादल प्रेम का, भींजि गया अब अंग ॥
- Kabir 20.42Open verse →
कबीर सतगुर ना मिल्या, रही अधूरी सीष । स्वाँग जती का पहरि करि, धरि-धरि माँगे भीष ॥
- Kabir 20.43Open verse →
यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान । सीस दिये जो गुरु मिलै, तो भी सस्ता जान ॥
- Kabir 20.44Open verse →
तू तू करता तू भया, मुझ में रही न हूँ । वारी फेरी बलि गई, जित देखौं तित तू ॥
- Kabir 20.45Open verse →
राम पियारा छांड़ि करि, करै आन का जाप । बेस्या केरा पूतं ज्यूं, कहै कौन सू बाप ॥
- Kabir 20.46Open verse →
कबीरा प्रेम न चषिया, चषि न लिया साव । सूने घर का पांहुणां, ज्यूं आया त्यूं जाव ॥
- Kabir 20.47Open verse →
कबीरा राम रिझाइ लै, मुखि अमृत गुण गाइ । फूटा नग ज्यूं जोड़ि मन, संधे संधि मिलाइ ॥
- Kabir 20.48Open verse →
लंबा मारग, दूरिधर, विकट पंथ, बहुमार । कहौ संतो, क्यूं पाइये, दुर्लभ हरि-दीदार ॥
- Kabir 20.49Open verse →
बिरह-भुवगम तन बसै मंत्र न लागै कोइ । राम-बियोगी ना जिवै जिवै तो बौरा होइ ॥
- Kabir 20.50Open verse →
यह तन जालों मसि करों, लिखों राम का नाउं । लेखणि करूं करंक की, लिखी-लिखी राम पठाउं ॥
- Kabir 20.51Open verse →
अंदेसड़ा न भाजिसी, सदैसो कहियां । के हरि आयां भाजिसी, कैहरि ही पास गयां ॥
- Kabir 20.52Open verse →
इस तन का दीवा करौ, बाती मेल्यूं जीवउं । लोही सींचो तेल ज्यूं, कब मुख देख पठिउं ॥
- Kabir 20.53Open verse →
अंषड़ियां झाईं पड़ी, पंथ निहारि-निहारि । जीभड़ियाँ छाला पड़या, राम पुकारि-पुकारि ॥
- Kabir 20.54Open verse →
सब रग तंत रबाब तन, बिरह बजावै नित्त । और न कोई सुणि सकै, कै साईं के चित्त ॥
- Kabir 20.55Open verse →
जो रोऊँ तो बल घटै, हँसो तो राम रिसाइ । मन ही माहिं बिसूरणा, ज्यूँ घुँण काठहिं खाइ ॥
- Kabir 20.56Open verse →
कबीर हँसणाँ दूरि करि, करि रोवण सौ चित्त । बिन रोयां क्यूं पाइये, प्रेम पियारा मित्व ॥
- Kabir 20.57Open verse →
सुखिया सब संसार है, खावै और सोवे । दुखिया दास कबीर है, जागै अरु रौवे ॥
- Kabir 20.58Open verse →
परबति परबति मैं फिरया, नैन गंवाए रोइ । सो बूटी पाऊँ नहीं, जातैं जीवनि होइ ॥
- Kabir 20.59Open verse →
पूत पियारौ पिता कौं, गौहनि लागो घाइ । लोभ-मिठाई हाथ दे, आपण गयो भुलाइ ॥
- Kabir 20.60Open verse →
हाँसी खैलो हरि मिलै, कौण सहै षरसान । काम क्रोध त्रिष्णं तजै, तोहि मिलै भगवान ॥
- Kabir 20.61Open verse →
जा कारणि में ढ़ूँढ़ती, सनमुख मिलिया आइ । धन मैली पिव ऊजला, लागि न सकौं पाइ ॥
- Kabir 20.62Open verse →
पहुँचेंगे तब कहैगें, उमड़ैंगे उस ठांई । आजहूं बेरा समंद मैं, बोलि बिगू पैं काई ॥
- Kabir 20.63Open verse →
दीठा है तो कस कहूं, कह्मा न को पतियाइ । हरि जैसा है तैसा रहो, तू हरिष-हरिष गुण गाइ ॥
- Kabir 20.64Open verse →
भारी कहौं तो बहुडरौं, हलका कहूं तौ झूठ । मैं का जाणी राम कूं नैनूं कबहूं न दीठ ॥
- Kabir 20.65Open verse →
कबीर एक न जाण्यां, तो बहु जाण्यां क्या होइ । एक तै सब होत है, सब तैं एक न होइ ॥
- Kabir 20.66Open verse →
कबीर रेख स्यंदूर की, काजल दिया न जाइ । नैनूं रमैया रमि रह्मा, दूजा कहाँ समाइ ॥
- Kabir 20.67Open verse →
कबीर कूता राम का, मुतिया मेरा नाउं । गले राम की जेवड़ी, जित खैंचे तित जाउं ॥
- Kabir 20.68Open verse →
कबीर कलिजुग आइ करि, कीये बहुत जो भीत । जिन दिल बांध्या एक सूं, ते सुख सोवै निचींत ॥
- Kabir 20.69Open verse →
जब लग भगहित सकामता, सब लग निर्फल सेव । कहै कबीर वै क्यूँ मिलै निह्कामी निज देव ॥
- Kabir 20.70Open verse →
पतिबरता मैली भली, गले कांच को पोत । सब सखियन में यों दिपै, ज्यों रवि ससि को जोत ॥
- Kabir 20.71Open verse →
कामी अभी न भावई, विष ही कौं ले सोधि । कुबुध्दि न जीव की, भावै स्यंभ रहौ प्रमोथि ॥
- Kabir 20.72Open verse →
भगति बिगाड़ी कामियां, इन्द्री केरै स्वादि । हीरा खोया हाथ थैं, जनम गँवाया बादि ॥
- Kabir 20.73Open verse →
परनारी का राचणौ, जिसकी लहसण की खानि । खूणैं बेसिर खाइय, परगट होइ दिवानि ॥
- Kabir 20.74Open verse →
परनारी राता फिरैं, चोरी बिढ़िता खाहिं । दिवस चारि सरसा रहै, अति समूला जाहिं ॥
- Kabir 20.75Open verse →
ग्यानी मूल गँवाइया, आपण भये करना । ताथैं संसारी भला, मन मैं रहै डरना ॥
- Kabir 20.76Open verse →
कामी लज्जा ना करै, न माहें अहिलाद । नींद न माँगै साँथरा, भूख न माँगे स्वाद ॥
- Kabir 20.77Open verse →
कलि का स्वामी लोभिया, पीतलि घरी खटाइ । राज-दुबारा यौं फिरै, ज्यँ हरिहाई गाइ ॥
- Kabir 20.78Open verse →
स्वामी हूवा सीतका, पैलाकार पचास । राम-नाम काठें रह्मा, करै सिषां की आंस ॥
- Kabir 20.79Open verse →
इहि उदर के कारणे, जग पाच्यो निस जाम । स्वामी-पणौ जो सिरि चढ़यो, सिर यो न एको काम ॥
- Kabir 20.80Open verse →
ब्राह्म्ण गुरु जगत् का, साधू का गुरु नाहिं । उरझि-पुरझि करि भरि रह्मा, चारिउं बेदा मांहि ॥
- Kabir 20.81Open verse →
कबीर कलि खोटी भई, मुनियर मिलै न कोइ । लालच लोभी मसकरा, तिनकूँ आदर होइ ॥
- Kabir 20.82Open verse →
कलि का स्वमी लोभिया, मनसा घरी बधाई । दैंहि पईसा ब्याज़ को, लेखां करता जाई ॥
- Kabir 20.83Open verse →
कबीर इस संसार कौ, समझाऊँ कै बार । पूँछ जो पकड़ै भेड़ की उतर या चाहे पार ॥
- Kabir 20.84Open verse →
तीरथ करि-करि जग मुवा, डूंधै पाणी न्हाइ । रामहि राम जपतंडां, काल घसीटया जाइ ॥
- Kabir 20.85Open verse →
चतुराई सूवै पढ़ी, सोइ पंजर मांहि । फिरि प्रमोधै आन कौं, आपण समझे नाहिं ॥
- Kabir 20.86Open verse →
कबीर मन फूल्या फिरै, करता हूँ मैं घ्रंम । कोटि क्रम सिरि ले चल्या, चेत न देखै भ्रम ॥ अगला भाग >>