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Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali) · अध्याय 21

Kavita Kosh दोहावली — पृष्ठ ४

कबीर दोहावली / पृष्ठ ४

  1. Kabir 21.1Open verse →

    सबै रसाइण मैं क्रिया, हरि सा और न कोई । तिल इक घर मैं संचरे, तौ सब तन कंचन होई ॥

  2. Kabir 21.2Open verse →

    हरि-रस पीया जाणिये, जे कबहुँ न जाइ खुमार । मैमता घूमत रहै, नाहि तन की सार ॥

  3. Kabir 21.3Open verse →

    कबीर भाठी कलाल की, बहुतक बैठे आई । सिर सौंपे सोई पिवै, नहीं तौ पिया न जाई ॥

  4. Kabir 21.4Open verse →

    त्रिक्षणा सींची ना बुझै, दिन दिन बधती जाइ । जवासा के रुष ज्यूं, घण मेहां कुमिलाइ ॥

  5. Kabir 21.5Open verse →

    कबीर सो घन संचिये, जो आगे कू होइ । सीस चढ़ाये गाठ की जात न देख्या कोइ ॥

  6. Kabir 21.6Open verse →

    कबीर माया मोहिनी, जैसी मीठी खांड़ । सतगुरु की कृपा भई, नहीं तौ करती भांड़ ॥

  7. Kabir 21.7Open verse →

    कबीर माया पापरगी, फंध ले बैठी हाटि । सब जग तौ फंधै पड्या, गया कबीर काटि ॥

  8. Kabir 21.8Open verse →

    कबीर जग की जो कहै, भौ जलि बूड़ै दास । पारब्रह्म पति छांड़ि करि, करै मानि की आस ॥

  9. Kabir 21.9Open verse →

    माया तजी तौ क्या भया, मानि तजि नही जाइ । मानि बड़े मुनियर मिले, मानि सबनि को खाइ ॥

  10. Kabir 21.10Open verse →

    करता दीसै कीरतन, ऊँचा करि करि तुंड । जाने-बूझै कुछ नहीं, यौं ही अंधा रुंड ॥

  11. Kabir 21.11Open verse →

    कबीर पढ़ियो दूरि करि, पुस्तक देइ बहाइ । बावन आषिर सोधि करि, ररै मर्मे चित्त लाइ ॥

  12. Kabir 21.12Open verse →

    मैं जाण्यूँ पाढ़िबो भलो, पाढ़िबा थे भलो जोग । राम-नाम सूं प्रीती करि, भल भल नींयो लोग ॥

  13. Kabir 21.13Open verse →

    पद गाएं मन हरषियां, साषी कह्मां अनंद । सो तत नांव न जाणियां, गल में पड़िया फंद ॥

  14. Kabir 21.14Open verse →

    जैसी मुख तै नीकसै, तैसी चाले चाल । पार ब्रह्म नेड़ा रहै, पल में करै निहाल ॥

  15. Kabir 21.15Open verse →

    काजी-मुल्ला भ्रमियां, चल्या युनीं कै साथ । दिल थे दीन बिसारियां, करद लई जब हाथ ॥

  16. Kabir 21.16Open verse →

    प्रेम-प्रिति का चालना, पहिरि कबीरा नाच । तन-मन तापर वारहुँ, जो कोइ बौलौ सांच ॥

  17. Kabir 21.17Open verse →

    सांच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप । जाके हिरदै में सांच है, ताके हिरदै हरि आप ॥

  18. Kabir 21.18Open verse →

    खूब खांड है खीचड़ी, माहि ष्डयाँ टुक कून । देख पराई चूपड़ी, जी ललचावे कौन ॥

  19. Kabir 21.19Open verse →

    साईं सेती चोरियाँ, चोरा सेती गुझ । जाणैंगा रे जीवएगा, मार पड़ैगी तुझ ॥

  20. Kabir 21.20Open verse →

    तीरथ तो सब बेलड़ी, सब जग मेल्या छाय । कबीर मूल निकंदिया, कौण हलाहल खाय ॥

  21. Kabir 21.21Open verse →

    जप-तप दीसैं थोथरा, तीरथ व्रत बेसास । सूवै सैंबल सेविया, यौ जग चल्या निरास ॥

  22. Kabir 21.22Open verse →

    जेती देखौ आत्म, तेता सालिगराम । राधू प्रतषि देव है, नहीं पाथ सूँ काम ॥

  23. Kabir 21.23Open verse →

    कबीर दुनिया देहुरै, सीत नवांवरग जाइ । हिरदा भीतर हरि बसै, तू ताहि सौ ल्यो लाइ ॥

  24. Kabir 21.24Open verse →

    मन मथुरा दिल द्वारिका, काया कासी जाणि । दसवां द्वारा देहुरा, तामै जोति पिछिरिग ॥

  25. Kabir 21.25Open verse →

    मेरे संगी दोइ जरग, एक वैष्णौ एक राम । वो है दाता मुक्ति का, वो सुमिरावै नाम ॥

  26. Kabir 21.26Open verse →

    मथुरा जाउ भावे द्वारिका, भावै जाउ जगनाथ । साथ-संगति हरि-भागति बिन-कछु न आवै हाथ ॥

  27. Kabir 21.27Open verse →

    कबीर संगति साधु की, बेगि करीजै जाइ । दुर्मति दूरि बंबाइसी, देसी सुमति बताइ ॥

  28. Kabir 21.28Open verse →

    उज्जवल देखि न धीजिये, वग ज्यूं माडै ध्यान । धीर बौठि चपेटसी, यूँ ले बूडै ग्यान ॥

  29. Kabir 21.29Open verse →

    जेता मीठा बोलरगा, तेता साधन जारिग । पहली था दिखाइ करि, उडै देसी आरिग ॥

  30. Kabir 21.30Open verse →

    जानि बूझि सांचहिं तर्जे, करै झूठ सूँ नेहु । ताकि संगति राम जी, सुपिने ही पिनि देहु ॥

  31. Kabir 21.31Open verse →

    कबीर तास मिलाइ, जास हियाली तू बसै । नहिंतर बेगि उठाइ, नित का गंजर को सहै ॥

  32. Kabir 21.32Open verse →

    कबीरा बन-बन मे फिरा, कारणि आपणै राम । राम सरीखे जन मिले, तिन सारे सवेरे काम ॥

  33. Kabir 21.33Open verse →

    कबीर मन पंषो भया, जहाँ मन वहाँ उड़ि जाय । जो जैसी संगति करै, सो तैसे फल खाइ ॥

  34. Kabir 21.34Open verse →

    कबीरा खाई कोट कि, पानी पिवै न कोई । जाइ मिलै जब गंग से, तब गंगोदक होइ ॥

  35. Kabir 21.35Open verse →

    माषी गुड़ मैं गड़ि रही, पंख रही लपटाई । ताली पीटै सिरि घुनै, मीठै बोई माइ ॥

  36. Kabir 21.36Open verse →

    मूरख संग न कीजिये, लोहा जलि न तिराइ । कदली-सीप-भुजगं मुख, एक बूंद तिहँ भाइ ॥

  37. Kabir 21.37Open verse →

    हरिजन सेती रुसणा, संसारी सूँ हेत । ते णर कदे न नीपजौ, ज्यूँ कालर का खेत ॥ काजल केरी कोठड़ी, तैसी यहु संसार । बलिहारी ता दास की, पैसिर निकसण हार ॥ 341 ॥

  38. Kabir 21.38Open verse →

    पाणी हीतै पातला, धुवाँ ही तै झीण । पवनां बेगि उतावला, सो दोस्त कबीर कीन्ह ॥

  39. Kabir 21.39Open verse →

    आसा का ईंधण करूँ, मनसा करूँ बिभूति । जोगी फेरी फिल करूँ, यौं बिनना वो सूति ॥

  40. Kabir 21.40Open verse →

    कबीर मारू मन कूँ, टूक-टूक है जाइ । विव की क्यारी बोइ करि, लुणत कहा पछिताइ ॥

  41. Kabir 21.41Open verse →

    कागद केरी नाव री, पाणी केरी गंग । कहै कबीर कैसे तिरूँ, पंच कुसंगी संग ॥

  42. Kabir 21.42Open verse →

    मैं मन्ता मन मारि रे, घट ही माहैं घेरि । जबहीं चालै पीठि दे, अंकुस दै-दै फेरि ॥

  43. Kabir 21.43Open verse →

    मनह मनोरथ छाँड़िये, तेरा किया न होइ । पाणी में घीव नीकसै, तो रूखा खाइ न कोइ ॥

  44. Kabir 21.44Open verse →

    एक दिन ऐसा होएगा, सब सूँ पड़े बिछोइ । राजा राणा छत्रपति, सावधान किन होइ ॥

  45. Kabir 21.45Open verse →

    कबीर नौबत आपणी, दिन-दस लेहू बजाइ । ए पुर पाटन, ए गली, बहुरि न देखै आइ ॥

  46. Kabir 21.46Open verse →

    जिनके नौबति बाजती, भैंगल बंधते बारि । एकै हरि के नाव बिन, गए जनम सब हारि ॥

  47. Kabir 21.47Open verse →

    कहा कियौ हम आइ करि, कहा कहैंगे जाइ । इत के भये न उत के, चलित भूल गँवाइ ॥

  48. Kabir 21.48Open verse →

    बिन रखवाले बाहिरा, चिड़िया खाया खेत । आधा-परधा ऊबरै, चेति सकै तो चैति ॥

  49. Kabir 21.49Open verse →

    कबीर कहा गरबियौ, काल कहै कर केस । ना जाणै कहाँ मारिसी, कै धरि के परदेस ॥

  50. Kabir 21.50Open verse →

    नान्हा कातौ चित्त दे, महँगे मोल बिलाइ । गाहक राजा राम है, और न नेडा आइ ॥

  51. Kabir 21.51Open verse →

    उजला कपड़ा पहिरि करि, पान सुपारी खाहिं । एकै हरि के नाव बिन, बाँधे जमपुरि जाहिं ॥

  52. Kabir 21.52Open verse →

    कबीर केवल राम की, तू जिनि छाँड़ै ओट । घण-अहरनि बिचि लौह ज्यूँ, घणी सहै सिर चोट ॥

  53. Kabir 21.53Open verse →

    मैं-मैं बड़ी बलाइ है सकै तो निकसौ भाजि । कब लग राखौ हे सखी, रुई लपेटी आगि ॥

  54. Kabir 21.54Open verse →

    कबीर माला मन की, और संसारी भेष । माला पहरयां हरि मिलै, तौ अरहट कै गलि देखि ॥

  55. Kabir 21.55Open verse →

    माला पहिरै मनभुषी, ताथै कछू न होइ । मन माला को फैरता, जग उजियारा सोइ ॥

  56. Kabir 21.56Open verse →

    कैसो कहा बिगाड़िया, जो मुंडै सौ बार । मन को काहे न मूंडिये, जामे विषम-विकार ॥

  57. Kabir 21.57Open verse →

    माला पहरयां कुछ नहीं, भगति न आई हाथ । माथौ मूँछ मुंडाइ करि, चल्या जगत् के साथ ॥

  58. Kabir 21.58Open verse →

    बैसनो भया तौ क्या भया, बूझा नहीं बबेक । छापा तिलक बनाइ करि, दगहया अनेक ॥

  59. Kabir 21.59Open verse →

    स्वाँग पहरि सो रहा भया, खाया-पीया खूंदि । जिहि तेरी साधु नीकले, सो तो मेल्ही मूंदि ॥

  60. Kabir 21.60Open verse →

    चतुराई हरि ना मिलै, ए बातां की बात । एक निस प्रेही निरधार का गाहक गोपीनाथ ॥

  61. Kabir 21.61Open verse →

    एष ले बूढ़ी पृथमी, झूठे कुल की लार । अलष बिसारयो भेष में, बूड़े काली धार ॥

  62. Kabir 21.62Open verse →

    कबीर हरि का भावता, झीणां पंजर । रैणि न आवै नींदड़ी, अंगि न चढ़ई मांस ॥

  63. Kabir 21.63Open verse →

    सिंहों के लेहँड नहीं, हंसों की नहीं पाँत । लालों की नहि बोरियाँ, साध न चलै जमात ॥

  64. Kabir 21.64Open verse →

    गाँठी दाम न बांधई, नहिं नारी सों नेह । कह कबीर ता साध की, हम चरनन की खेह ॥

  65. Kabir 21.65Open verse →

    निरबैरी निहकामता, साईं सेती नेह । विषिया सूं न्यारा रहै, संतनि का अंग सह ॥

  66. Kabir 21.66Open verse →

    जिहिं हिरदै हरि आइया, सो क्यूं छाना होइ । जतन-जतन करि दाबिये, तऊ उजाला सोइ ॥

  67. Kabir 21.67Open verse →

    काम मिलावे राम कूं, जे कोई जाणै राखि । कबीर बिचारा क्या कहै, जाकि सुख्देव बोले साख ॥

  68. Kabir 21.68Open verse →

    राम वियोगी तन बिकल, ताहि न चीन्हे कोई । तंबोली के पान ज्यूं, दिन-दिन पीला होई ॥

  69. Kabir 21.69Open verse →

    पावक रूपी राम है, घटि-घटि रह्या समाइ । चित चकमक लागै नहीं, ताथै घूवाँ है-है जाइ ॥

  70. Kabir 21.70Open verse →

    फाटै दीदै में फिरौं, नजिर न आवै कोई । जिहि घटि मेरा साँइयाँ, सो क्यूं छाना होई ॥

  71. Kabir 21.71Open verse →

    हैवर गैवर सघन धन, छत्रपती की नारि । तास पटेतर ना तुलै, हरिजन की पनिहारि ॥

  72. Kabir 21.72Open verse →

    जिहिं धरि साध न पूजि, हरि की सेवा नाहिं । ते घर भड़धट सारषे, भूत बसै तिन माहिं ॥

  73. Kabir 21.73Open verse →

    कबीर कुल तौ सोभला, जिहि कुल उपजै दास । जिहिं कुल दास न उपजै, सो कुल आक-पलास ॥

  74. Kabir 21.74Open verse →

    क्यूं नृप-नारी नींदिये, क्यूं पनिहारी कौ मान । वा माँग सँवारे पील कौ, या नित उठि सुमिरैराम ॥

  75. Kabir 21.75Open verse →

    काबा फिर कासी भया, राम भया रे रहीम । मोट चून मैदा भया, बैठि कबीरा जीम ॥

  76. Kabir 21.76Open verse →

    दुखिया भूखा दुख कौं, सुखिया सुख कौं झूरि । सदा अजंदी राम के, जिनि सुख-दुख गेल्हे दूरि ॥

  77. Kabir 21.77Open verse →

    कबीर दुबिधा दूरि करि, एक अंग है लागि । यहु सीतल बहु तपति है, दोऊ कहिये आगि ॥

  78. Kabir 21.78Open verse →

    कबीर का तू चिंतवै, का तेरा च्यंत्या होइ । अण्च्यंत्या हरिजी करै, जो तोहि च्यंत न होइ ॥

  79. Kabir 21.79Open verse →

    भूखा भूखा क्या करैं, कहा सुनावै लोग । भांडा घड़ि जिनि मुख यिका, सोई पूरण जोग ॥

  80. Kabir 21.80Open verse →

    रचनाहार कूं चीन्हि लै, खैबे कूं कहा रोइ । दिल मंदि मैं पैसि करि, ताणि पछेवड़ा सोइ ॥

  81. Kabir 21.81Open verse →

    कबीर सब जग हंडिया, मांदल कंधि चढ़ाइ । हरि बिन अपना कोउ नहीं, देखे ठोकि बनाइ ॥

  82. Kabir 21.82Open verse →

    मांगण मरण समान है, बिरता बंचै कोई । कहै कबीर रघुनाथ सूं, मति रे मंगावे मोहि ॥

  83. Kabir 21.83Open verse →

    मानि महतम प्रेम-रस गरवातण गुण नेह । ए सबहीं अहला गया, जबही कह्या कुछ देह ॥

  84. Kabir 21.84Open verse →

    संत न बांधै गाठड़ी, पेट समाता-तेइ । साईं सूं सनमुख रहै, जहाँ माँगे तहां देइ ॥

  85. Kabir 21.85Open verse →

    कबीर संसा कोउ नहीं, हरि सूं लाग्गा हेत । काम-क्रोध सूं झूझणा, चौडै मांड्या खेत ॥

  86. Kabir 21.86Open verse →

    कबीर सोई सूरिमा, मन सूँ मांडै झूझ । पंच पयादा पाड़ि ले, दूरि करै सब दूज ॥

  87. Kabir 21.87Open verse →

    जिस मरनै यैं जग डरै, सो मेरे आनन्द । कब मरिहूँ कब देखिहूँ पूरन परमानंद ॥