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Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali) · अध्याय 22

Kavita Kosh दोहावली — पृष्ठ ५

कबीर दोहावली / पृष्ठ ५

  1. Kabir 22.1Open verse →

    अब तौ जूझया ही बरगै, मुडि चल्यां घर दूर । सिर साहिबा कौ सौंपता, सोंच न कीजै सूर ॥

  2. Kabir 22.2Open verse →

    कबीर घोड़ा प्रेम का, चेतनि चाढ़ि असवार । ग्यान खड़ग गहि काल सिरि, भली मचाई मार ॥

  3. Kabir 22.3Open verse →

    कबीर हरि सब कूँ भजै, हरि कूँ भजै न कोइ । जब लग आस सरीर की, तब लग दास न होइ ॥

  4. Kabir 22.4Open verse →

    सिर साटें हरि सेवेये, छांड़ि जीव की बाणि । जे सिर दीया हरि मिलै, तब लगि हाणि न जाणि ॥

  5. Kabir 22.5Open verse →

    जेते तारे रैणि के, तेतै बैरी मुझ । धड़ सूली सिर कंगुरै, तऊ न बिसारौ तुझ ॥

  6. Kabir 22.6Open verse →

    आपा भेटियाँ हरि मिलै, हरि मेट् या सब जाइ । अकथ कहाणी प्रेम की, कह्या न कोउ पत्याइ ॥

  7. Kabir 22.7Open verse →

    जीवन थैं मरिबो भलौ, जो मरि जानैं कोइ । मरनैं पहली जे मरै, जो कलि अजरावर होइ ॥

  8. Kabir 22.8Open verse →

    कबीर मन मृतक भया, दुर्बल भया सरीर । तब पैंडे लागा हरि फिरै, कहत कबीर कबीर ॥

  9. Kabir 22.9Open verse →

    रोड़ा है रहो बाट का, तजि पाषंड अभिमान । ऐसा जे जन है रहै, ताहि मिलै भगवान ॥

  10. Kabir 22.10Open verse →

    कबीर चेरा संत का, दासनि का परदास । कबीर ऐसैं होइ रक्षा, ज्यूँ पाऊँ तलि घास ॥

  11. Kabir 22.11Open verse →

    अबरन कों का बरनिये, भोपै लख्या न जाइ । अपना बाना वाहिया, कहि-कहि थाके भाइ ॥

  12. Kabir 22.12Open verse →

    जिसहि न कोई विसहि तू, जिस तू तिस सब कोई । दरिगह तेरी सांइयाँ, जा मरूम कोइ होइ ॥

  13. Kabir 22.13Open verse →

    साँई मेरा वाणियां, सहति करै व्यौपार । बिन डांडी बिन पालड़ै तौले सब संसार ॥

  14. Kabir 22.14Open verse →

    झल बावै झल दाहिनै, झलहि माहि त्योहार । आगै-पीछै झलमाई, राखै सिरजनहार ॥

  15. Kabir 22.15Open verse →

    एसी बाणी बोलिये, मन का आपा खोइ । औरन को सीतल करै, आपौ सीतल होइ ॥

  16. Kabir 22.16Open verse →

    कबीर हरि कग नाव सूँ प्रीति रहै इकवार । तौ मुख तैं मोती झड़ै हीरे अन्त न पार ॥

  17. Kabir 22.17Open verse →

    बैरागी बिरकत भला, गिरही चित्त उदार । दुहुँ चूका रीता पड़ै वाकूँ वार न पार ॥

  18. Kabir 22.18Open verse →

    कोई एक राखै सावधां, चेतनि पहरै जागि । बस्तर बासन सूँ खिसै, चोर न सकई लागि ॥

  19. Kabir 22.19Open verse →

    बारी-बारी आपणीं, चले पियारे म्यंत । तेरी बारी रे जिया, नेड़ी आवै निंत ॥

  20. Kabir 22.20Open verse →

    पदारथ पेलि करि, कंकर लीया हाथि । जोड़ी बिछटी हंस की, पड़या बगां के साथि ॥

  21. Kabir 22.21Open verse →

    निंदक नियारे राखिये, आंगन कुटि छबाय । बिन पाणी बिन सबुना, निरमल करै सुभाय ॥

  22. Kabir 22.22Open verse →

    गोत्यंद के गुण बहुत हैं, लिखै जु हिरदै मांहि । डरता पाणी जा पीऊं, मति वै धोये जाहि ॥

  23. Kabir 22.23Open verse →

    जो ऊग्या सो आंथवै, फूल्या सो कुमिलाइ । जो चिणियां सो ढहि पड़ै, जो आया सो जाइ ॥

  24. Kabir 22.24Open verse →

    सीतलता तब जाणियें, समिता रहै समाइ । पष छाँड़ै निरपष रहै, सबद न देष्या जाइ ॥

  25. Kabir 22.25Open verse →

    खूंदन तौ धरती सहै, बाढ़ सहै बनराइ । कुसबद तौ हरिजन सहै, दूजै सह्या न जाइ ॥

  26. Kabir 22.26Open verse →

    नीर पियावत क्या फिरै, सायर घर-घर बारि । जो त्रिषावन्त होइगा, सो पीवेगा झखमारि ॥ कबीर सिरजन हार बिन, मेरा हित न कोइ । गुण औगुण बिहणै नहीं, स्वारथ बँधी लोइ ॥ 427 ॥

  27. Kabir 22.27Open verse →

    हीरा परा बजार में, रहा छार लपिटाइ । ब तक मूरख चलि गये पारखि लिया उठाइ ॥

  28. Kabir 22.28Open verse →

    सुरति करौ मेरे साइयां, हम हैं भोजन माहिं । आपे ही बहि जाहिंगे, जौ नहिं पकरौ बाहिं ॥

  29. Kabir 22.29Open verse →

    क्या मुख लै बिनती करौं, लाज आवत है मोहि । तुम देखत ओगुन करौं, कैसे भावों तोहि ॥

  30. Kabir 22.30Open verse →

    सब काहू का लीजिये, साचां सबद निहार । पच्छपात ना कीजिये कहै कबीर विचार ॥

  31. Kabir 22.31Open verse →

    गुरु सों ज्ञान जु लीजिये सीस दीजिए दान । बहुतक भोदूँ बहि गये, राखि जीव अभिमान ॥

  32. Kabir 22.32Open verse →

    गुरु को कीजै दण्डव कोटि-कोटि परनाम । कीट न जाने भृगं को, गुरु करले आप समान ॥

  33. Kabir 22.33Open verse →

    कुमति कीच चेला भरा, गुरु ज्ञान जल होय । जनम-जनम का मोरचा, पल में डारे धोय ॥

  34. Kabir 22.34Open verse →

    गुरु पारस को अन्तरो, जानत है सब सन्त । वह लोहा कंचन करे, ये करि लेय महन्त ॥

  35. Kabir 22.35Open verse →

    गुरु की आज्ञा आवै, गुरु की आज्ञा जाय । कहैं कबीर सो सन्त हैं, आवागमन नशाय ॥

  36. Kabir 22.36Open verse →

    जो गुरु बसै बनारसी, सीष समुन्दर तीर । एक पलक बिसरे नहीं, जो गुण होय शरीर ॥

  37. Kabir 22.37Open verse →

    गुरु समान दाता नहीं, याचक सीष समान । तीन लोक की सम्पदा, सो गुरु दीन्ही दान ॥

  38. Kabir 22.38Open verse →

    गुरु कुम्हार सिष कुंभ है, गढ़ि-गढ़ि काढ़ै खोट । अन्तर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट ॥

  39. Kabir 22.39Open verse →

    गुरु को सिर राखिये, चलिये आज्ञा माहिं । कहैं कबीर ता दास को, तीन लोक भय नहिं ॥

  40. Kabir 22.40Open verse →

    लच्छ कोष जो गुरु बसै, दीजै सुरति पठाय । शब्द तुरी बसवार है, छिन आवै छिन जाय ॥

  41. Kabir 22.41Open verse →

    गुरु मूरति गति चन्द्रमा, सेवक नैन चकोर । आठ पहर निरखता रहे, गुरु मूरति की ओर ॥

  42. Kabir 22.42Open verse →

    गुरु सों प्रीति निबाहिये, जेहि तत निबटै सन्त । प्रेम बिना ढिग दूर है, प्रेम निकट गुरु कन्त ॥

  43. Kabir 22.43Open verse →

    गुरु बिन ज्ञान न उपजै, गुरु बिन मिलै न मोष । गुरु बिन लखै न सत्य को, गुरु बिन मिटे न दोष ॥

  44. Kabir 22.44Open verse →

    गुरु मूरति आगे खड़ी, दुनिया भेद कछु नाहिं । उन्हीं कूँ परनाम करि, सकल तिमिर मिटि जाहिं ॥

  45. Kabir 22.45Open verse →

    गुरु शरणागति छाड़ि के, करै भरौसा और । सुख सम्पति की कह चली, नहीं परक ये ठौर ॥

  46. Kabir 22.46Open verse →

    सिष खांडा गुरु भसकला, चढ़ै शब्द खरसान । शब्द सहै सम्मुख रहै, निपजै शीष सुजान ॥

  47. Kabir 22.47Open verse →

    ज्ञान समागम प्रेम सुख, दया भक्ति विश्वास । गुरु सेवा ते पाइये, सद्गुरु चरण निवास ॥

  48. Kabir 22.48Open verse →

    अहं अग्नि निशि दिन जरै, गुरु सो चाहे मान । ताको जम न्योता दिया, होउ हमार मेहमान ॥

  49. Kabir 22.49Open verse →

    जैसी प्रीति कुटुम्ब की, तैसी गुरु सों होय । कहैं कबीर ता दास का, पला न पकड़ै कोय ॥

  50. Kabir 22.50Open verse →

    मूल ध्यान गुरु रूप है, मूल पूजा गुरु पाँव । मूल नाम गुरु वचन है, मूल सत्य सतभाव ॥

  51. Kabir 22.51Open verse →

    पंडित पाढ़ि गुनि पचि मुये, गुरु बिना मिलै न ज्ञान । ज्ञान बिना नहिं मुक्ति है, सत्त शब्द परनाम ॥

  52. Kabir 22.52Open verse →

    सोइ-सोइ नाच नचाइये, जेहि निबहे गुरु प्रेम । कहै कबीर गुरु प्रेम बिन, कतहुँ कुशल नहि क्षेम ॥

  53. Kabir 22.53Open verse →

    कहैं कबीर जजि भरम को, नन्हा है कर पीव । तजि अहं गुरु चरण गहु, जमसों बाचै जीव ॥

  54. Kabir 22.54Open verse →

    कोटिन चन्दा उगही, सूरज कोटि हज़ार । तीमिर तौ नाशै नहीं, बिन गुरु घोर अंधार ॥

  55. Kabir 22.55Open verse →

    तबही गुरु प्रिय बैन कहि, शीष बढ़ी चित प्रीत । ते रहियें गुरु सनमुखाँ कबहूँ न दीजै पीठ ॥

  56. Kabir 22.56Open verse →

    तन मन शीष निछावरै, दीजै सरबस प्रान । कहैं कबीर गुरु प्रेम बिन, कितहूँ कुशल नहिं क्षेम ॥

  57. Kabir 22.57Open verse →

    जो गुरु पूरा होय तो, शीषहि लेय निबाहि । शीष भाव सुत्त जानिये, सुत ते श्रेष्ठ शिष आहि ॥

  58. Kabir 22.58Open verse →

    भौ सागर की त्रास तेक, गुरु की पकड़ो बाँहि । गुरु बिन कौन उबारसी, भौ जल धारा माँहि ॥

  59. Kabir 22.59Open verse →

    करै दूरि अज्ञानता, अंजन ज्ञान सुदेय । बलिहारी वे गुरुन की हंस उबारि जुलेय ॥

  60. Kabir 22.60Open verse →

    सुनिये सन्तों साधु मिलि, कहहिं कबीर बुझाय । जेहि विधि गुरु सों प्रीति छै कीजै सोई उपाय ॥

  61. Kabir 22.61Open verse →

    अबुध सुबुध सुत मातु पितु, सबहि करै प्रतिपाल । अपनी और निबाहिये, सिख सुत गहि निज चाल ॥

  62. Kabir 22.62Open verse →

    लौ लागी विष भागिया, कालख डारी धोय । कहैं कबीर गुरु साबुन सों, कोई इक ऊजल होय ॥

  63. Kabir 22.63Open verse →

    राजा की चोरी करे, रहै रंग की ओट । कहैं कबीर क्यों उबरै, काल कठिन की चोट ॥

  64. Kabir 22.64Open verse →

    साबुन बिचारा क्या करे, गाँठे राखे मोय । जल सो अरसां नहिं, क्यों कर ऊजल होय ॥

  65. Kabir 22.65Open verse →

    सत्गुरु तो सतभाव है, जो अस भेद बताय । धन्य शीष धन भाग तिहि जो ऐसी सुधि पाय ॥

  66. Kabir 22.66Open verse →

    सतगुरु शरण न आवहीं, फिर फिर होय अकाज । जीव खोय सब जायेंगे काल तिहूँ पुर राज ॥

  67. Kabir 22.67Open verse →

    सतगुरु सम कोई नहीं सात दीप नौ खण्ड । तीन लोक न पाइये, अरु इक्कीस ब्रह्म्ण्ड ॥

  68. Kabir 22.68Open verse →

    सतगुरु मिला जु जानिये, ज्ञान उजाला होय । भ्रम का भांड तोड़ि करि, रहै निराला होय ॥

  69. Kabir 22.69Open verse →

    सतगुरु मिले जु सब मिले, न तो मिला न कोय । माता-पिता सुत बाँधवा ये तो घर घर होय ॥

  70. Kabir 22.70Open verse →

    जेहि खोजत ब्रह्मा थके, सुर नर मुनि अरु देव । कहै कबीर सुन साधवा, करु सतगुरु की सेव ॥

  71. Kabir 22.71Open verse →

    मनहिं दिया निज सब दिया, मन से संग शरीर । अब देवे को क्या रहा, यों कयि कहहिं कबीर ॥

  72. Kabir 22.72Open verse →

    सतगुरु को माने नही, अपनी कहै बनाय । कहै कबीर क्या कीजिये, और मता मन जाय ॥

  73. Kabir 22.73Open verse →

    जग में युक्ति अनूप है, साधु संग गुरु ज्ञान । तामें निपट अनूप है, सतगुरु लागा कान ॥

  74. Kabir 22.74Open verse →

    कबीर समूझा कहत है, पानी थाह बताय । ताकूँ सतगुरु का करे, जो औघट डूबे जाय ॥

  75. Kabir 22.75Open verse →

    बिन सतगुरु उपदेश, सुर नर मुनि नहिं निस्तरे । ब्रह्मा-विष्णु, महेश और सकल जिव को गिनै ॥

  76. Kabir 22.76Open verse →

    केते पढ़ि गुनि पचि भुए, योग यज्ञ तप लाय । बिन सतगुरु पावै नहीं, कोटिन करे उपाय ॥

  77. Kabir 22.77Open verse →

    डूबा औघट न तरै, मोहिं अंदेशा होय । लोभ नदी की धार में, कहा पड़ो नर सोइ ॥

  78. Kabir 22.78Open verse →

    सतगुरु खोजो सन्त, जोव काज को चाहहु । मेटो भव को अंक, आवा गवन निवारहु ॥

  79. Kabir 22.79Open verse →

    करहु छोड़ कुल लाज, जो सतगुरु उपदेश है । होये सब जिव काज, निश्चय करि परतीत करू ॥

  80. Kabir 22.80Open verse →

    यह सतगुरु उपदेश है, जो मन माने परतीत । करम भरम सब त्यागि के, चलै सो भव जल जीत ॥

  81. Kabir 22.81Open verse →

    जग सब सागर मोहिं, कहु कैसे बूड़त तेरे । गहु सतगुरु की बाहिं जो जल थल रक्षा करै ॥

  82. Kabir 22.82Open verse →

    जानीता बूझा नहीं बूझि किया नहीं गौन । अन्धे को अन्धा मिला, राह बतावे कौन ॥

  83. Kabir 22.83Open verse →

    जाका गुरु है आँधरा, चेला खरा निरन्ध । अन्धे को अन्धा मिला, पड़ा काल के फन्द ॥

  84. Kabir 22.84Open verse →

    गुरु लोभ शिष लालची, दोनों खेले दाँव । दोनों बूड़े बापुरे, चढ़ि पाथर की नाँव ॥

  85. Kabir 22.85Open verse →

    आगे अंधा कूप में, दूजे लिया बुलाय । दोनों बूडछे बापुरे, निकसे कौन उपाय ॥

  86. Kabir 22.86Open verse →

    गुरु किया है देह का, सतगुरु चीन्हा नाहिं । भवसागर के जाल में, फिर फिर गोता खाहि ॥

  87. Kabir 22.87Open verse →

    पूरा सतगुरु न मिला, सुनी अधूरी सीख । स्वाँग यती का पहिनि के, घर घर माँगी भीख ॥

  88. Kabir 22.88Open verse →

    कबीर गुरु है घाट का, हाँटू बैठा चेल । मूड़ मुड़ाया साँझ कूँ गुरु सबेरे ठेल ॥

  89. Kabir 22.89Open verse →

    गुरु-गुरु में भेद है, गुरु-गुरु में भाव । सोइ गुरु नित बन्दिये, शब्द बतावे दाव ॥

  90. Kabir 22.90Open verse →

    जो गुरु ते भ्रम न मिटे, भ्रान्ति न जिसका जाय । सो गुरु झूठा जानिये, त्यागत देर न लाय ॥

  91. Kabir 22.91Open verse →

    झूठे गुरु के पक्ष की, तजत न कीजै वार । द्वार न पावै शब्द का, भटके बारम्बार ॥

  92. Kabir 22.92Open verse →

    सद्गुरु ऐसा कीजिये, लोभ मोह भ्रम नाहिं । दरिया सो न्यारा रहे, दीसे दरिया माहि ॥

  93. Kabir 22.93Open verse →

    कबीर बेड़ा सार का, ऊपर लादा सार । पापी का पापी गुरु, यो बूढ़ा संसार ॥

  94. Kabir 22.94Open verse →

    जो गुरु को तो गम नहीं, पाहन दिया बताय । शिष शोधे बिन सेइया, पार न पहुँचा जाए ॥

  95. Kabir 22.95Open verse →

    सोचे गुरु के पक्ष में, मन को दे ठहराय । चंचल से निश्चल भया, नहिं आवै नहीं जाय ॥

  96. Kabir 22.96Open verse →

    गु अँधियारी जानिये, रु कहिये परकाश । मिटि अज्ञाने ज्ञान दे, गुरु नाम है तास ॥

  97. Kabir 22.97Open verse →

    गुरु नाम है गम्य का, शीष सीख ले सोय । बिनु पद बिनु मरजाद नर, गुरु शीष नहिं कोय ॥

  98. Kabir 22.98Open verse →

    गुरुवा तो घर फिरे, दीक्षा हमारी लेह । कै बूड़ौ कै ऊबरो, टका परदानी देह ॥

  99. Kabir 22.99Open verse →

    गुरुवा तो सस्ता भया, कौड़ी अर्थ पचास । अपने तन की सुधि नहीं, शिष्य करन की आस ॥ अगला भाग >>