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Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali) · Chapter 17

चाँणक कौ अंग

चाँणक कौ अंग

34 verses

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  1. Kabir 17.1
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    जिव बिलंब्या जीव सौ, अलख न लखिया जाइ। गोबिंद मिलै न झल बुझै, रहि बुझाइ बुझाइ॥

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    ―एक जीव दूसरे जीव का सहारा ले रहा है अलक्ष (नराकार) परमात्मा को कोई नहीं देखता। जब तक प्रभु मिलन नहीं होगा तब तक सांसारिक तापो कि अग्नि का बुझना शान्त होना असम्भव है भले हो इसके बुझाने के अनेको प्रयत्न किये जायें।

  2. Kabir 17.2
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    इहि उदार के कारणैं, जग जाच्यौं निस जाम। स्वामीं पणों जु सिरि चढयौ, सरया न एकौ काम॥

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    ―सांसारिक जीव अपनी उदरपूर्ति के लिए रातदिन संसार मे भटक-भटक कर याचना किया करते हैं किन्तु उनके अदर जो स्वामीपन की भावना का अहंकार होता है उसके कारण उनका एक भी काम नहीं बन पाता है न यह लोक ही सुख कर हो पाता है और परलोक मे ही मुक्ति का मार्ग बन पाता है।

  3. Kabir 17.3
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    ​ स्वामी हूॅणाॅ सोहरा, दोद्धा हूॅणाँ दास। गाडर ऑणीं ऊन कूॅ, बाँधी चरै कपास॥

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    ―इस संसार मे स्वामी बनना तो सरल है कोई भी व्यक्ति अपने अहंकार को प्रदर्शित कर कुछ व्यक्तियो पर अपना स्वामित्व प्रदर्शित कर सकता है किन्तु परमात्मा का भक्त बनना अत्यन्त कठिन है। जिस प्रकार भेड को ऊन प्राप्ति के लिए पाला जाता है किन्तु वह घर आकर कपास को भी चर लेती है ठीक उसी प्रकार ईश्वर भक्त मे यदि अह्म की भावना आ जाती है तो उसका परलोक और यह लोक दोनो नष्ट हो जाते हैं।

  4. Kabir 17.4
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    स्वामी हुवासीत का, पैकाकार पचास। राम नाम काँठै रहया, करै सिषाँ की आस॥

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    ―हे जीवात्मा। तू कण भर सपत्ति का स्वामी होकर भी दभ मे आकर पचासो सेवक बना रखे हैं हृदय से तूने कभी राम का नाम लिया ही नहीं केवल जीभ से ही राम नाम का उच्चारण करता रहा और अबतू शिष्य बनाने की आशा करता है।

  5. Kabir 17.5
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    कबीर तष्टा टोकणीं, लीयै फिरै सुभाइ। राम नाम चीन्हैं नहीं, पीतलि टी कै चाइ॥

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    ―कबीरदास जी कहते हैं कि तू अपने स्वभाव के अनुसार तसला और टोकनी लिए हुए इधर-उधर घूमकर खाने पीने का प्रवन्ध करता रहता है। तू ​राम नाम के अमूल्य रत्न को पहचानता नही और पीतल के पात्र खाने के लिए घूमता रहता है उसी मे मस्त है यह ठीक नहीं है।

  6. Kabir 17.6
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    कलि का स्वामी लोभिया, पीतलि धरी षटाइ। राज दुवारां यौं फिरै, ज्यूँ हरिहाई गाई॥

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    ―कबीरदास जी कहते हैं कि इस संसार के स्वामी और सन्यासी सभी लोभी हैं वे बाहर से देखने मे तो विरक्त लगते हैं और अंतःकरण मे लोभ व्याप्त रहता है जिस प्रकार पीतल पर खटाई लगा देने से क्षण भर के लिए उसमे चमक आ जाती है उसी प्रकार पाखंडी सन्यासी भी क्षण भर के लिए विरक्त हो जाते हैं। जिस प्रकार हरियाली के लोभ मे पड़ी हुई गाय बार-बार रोकने पर भी ही खेत की ओर दौडती चली जाती है उसी प्रकार वे सन्यासी भी लोभासक्त होकर धनवानो के दरवाजे पर जाया करते हैं।

  7. Kabir 17.7
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    संदर्भ―पाखंड करने और ईश्वर की भक्ति करने में बहुत बड़ा अंतर है। कलि का स्वांमीं लोभिया, मनसा धरी बधाई। दैंहि पईसा व्याज कौं, लेखाँ करतां जाइ॥

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    ―कलियुग के स्वामी सन्यासी अत्यन्त लोभी होते हैं वे अपनी इच्छाओ-अभिलाषाओ को अत्यन्त बढा चढ़ाकर रखते हैं। वे व्याज पर रुपया उधार देत हैं और बड़ी-बडी बहियो (बहीखाता) मे उसका हिसाब रखते हैं तब भला बताइए कि उनमे और एक ससारी प्राणी मे क्या अन्तर है?

  8. Kabir 17.8
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    संदर्भ―कलियुग के सन्यासी लोभी वृत्ति के होते हैं। कबीर कलि खोटी भई, मुनियर मिलै न कोइ। लालच लोभी मसकरा, तिनकूॅ आदर होइ॥

    अर्थ (Hindi) — hi.wikisource

    ―कबीरदास जी कहते हैं कि यह कलियुग अत्यन्त खोटा है इसमें कोई श्रेष्ठ मुनि नहीं मिल पाता है इसमे तो उन्ही व्यक्तियों का सम्मान हो पाता है जो लालची, लोभी और मनचले होते हैं।

  9. Kabir 17.9
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    संदर्भ―कलियुग मे लोभी और मनचले लोग ही सम्मान के पात्र होते हैं। चारिऊॅ वेद पढ़ाई करि, हरि सूॅ न लाया हेत। वालि कबीरा ले गया, पण्डित ढूॅढै खेत॥

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    ―कबीरदास जी कहते हैं कि चारो वेदो को पढ़ करके भी पंडित परमात्मा से प्रेम नही कर पाते हैं। भक्ति की भावना उनमे नही आ पाती है। भक्ति रूपी खेती की वास्तविक फसल बाली को तो मैंने ग्रहण कर लिया है अब पडित लोग व्यर्थं मे उसमे अग्न खोजने-की तत्व खोजने की चेष्टा कर रहे हैं।

  10. Kabir 17.10
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    सौंदर्भ―पुराण पथियो की निन्दा और व्यंग्य है। ब्राह्मण गुरु जगत का, साधू का गुरु नाहि। उरझि-पुरझि करि मरि रह्या, चारिडॅ वेदां माहिं॥

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    ब्राह्मण तो सारे संसार का गुरु है किन्तु वह साधुओ का गुरु नहीं हो सकता है क्योकि वह तो चारो वेदो को ही उलट-पुलट कर ब्रह्म तत्व को खोजता रहता है और साधू प्रेम के द्वारा ईश्वर को प्राप्त करने की चेष्टा करते हैं। शव्दार्थ―उरझि पुरझि=उलझ-पुलझकर।

  11. Kabir 17.11
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    साषित सण का जेवड़ा, भीगाँ सूॅ कठठाइ। दोइ आषिर गुरु बाहिरा, बांध्या जमपुर जाइ॥

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    कबीरदास जी कहते हैं कि शाक्त सम्प्रदाय को मानने वाले व्यक्ति सन की रस्सी के समान होते हैं जो जितना हो अधिक भीगती है उतना ही अधिक कड़ी होती जाती है उसी प्रकार शाक्त भी सासारिक विषय-वासनाओ मे लिपटते जाते हैं। वह राम नाम के दो अक्षरो और गुरु से बिलग होने के कारण सीधा बंधा हुआ यमपुर को चला जाता है।

  12. Kabir 17.12
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    पाड़ोसी सूॅ रूसणाँ, तिल-तिल सुख की हाँणि। पंडित भये सरावगी, पॉणी पीवै छाॅणि॥

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    ―कबीर दास जी कहते हैं कि अपने पडोसी से रूठ जाने पर प्रत्येक क्षरण के सुख की हानि होती रहती है किन्तु इसका विचार जैन सम्प्रदाय वाले नही करते हैं वे पानी तो छान-छान कर पोते हैं किन्तु पड़ोसियों से रूठे रहते हैं। ​ शव्दार्थ―रूसणां=रूठना। सरावगी=जैन साधु।

  13. Kabir 17.13
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    पंडित सेती कहि रह्या, भीतरि भेद्या नाहिं। औरूँ कौं परमोधतां, गया मुहरकां मांहिं॥

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    ―कबीरदास जी पंडित से कह रहे हैं कि तू ऊपर से ढोग दिखाकर ज्ञानी और भक्त बन रहा है किन्तु भक्ति अन्तःकरण में व्याप्त नही होती है और दूसरों को तो तू ज्ञान और भक्ति का प्रवोध, उपदेश देता रहता है किन्तु स्वयं घोर पाप करता रहता है।

  14. Kabir 17.14
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    चतुराई सूबै पढ़ी, सोई पांजर माँहि। फिरि प्रमोधै आँन कौ,आपण समझैं नाहिं॥

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    ―सम्पूर्णं चतुराई सीख लेने के कारण तोते को लोग पिंजडे मे बन्द कर देते हैं किन्तु स्वयं पिंजड़े मे बन्द होकर भी वह और लोगो को उपदेश देता है कि राम नाम का उच्चारण करो यद्यपि वह स्वय राम नाम के महत्व को समझ नही पाता है।

  15. Kabir 17.15
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    रासि पराई राषताँ, खाया घर का खेत। औरों कौं प्रमोधताँ, मुख मैं पड़िया रेत॥

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    ―कुछ किसान अपने खेतो के अनाज की रक्षा न करके थोडा अन्न पाने के लिए दूसरो के खेत की रक्षा करते हैं उसी प्रकार ढोगी पंडित दूसरो को हो उपदेश देते रहते हैं स्वयं तो विषय-वासना मे पडकर अपना जीवन नष्ट करते रहते हैं।

  16. Kabir 17.16
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    तारा मंडल वैसि करि, चंद बड़ाई खाइ। उदै भया जब सूर का, स्यूँ तारां छिपि जाइ॥

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    ―ताराओं के मध्य मे आकाश मंडल में विराजमान होकर चन्द्रमा ऐश्वर्य को प्राप्त करता है किन्तु सूर्य के उदय होने पर वह तारो के साथ अस्त हो जाता है ठीक उसी प्रकार जीव अज्ञानान्वकार में पड़ा रहता है ज्ञान के उदय होने पर संपूर्ण इच्छाएं नष्ट हो जाती हैं।

  17. Kabir 17.17
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    तीरथ करि करि जग मुवा, डूॅघै पांणीं न्हाइ। रामहि राम जपतडां, काल घसीट्या जाइ॥

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    ―कबीरदास जी कहते हैं कि अनेकानेक प्रकार के तीर्थों के दर्शन करके और गंदले पानी में स्नान करके लोग मर जाते हैं। मुंह से राम नाम का उच्चारण करते हुए भी मृत्यु उन्हें घसीट ले जाती है क्योकि राम नाम उच्चारण ही होना है हृदय से उसका जप नहीं होता है।

  18. Kabir 17.18
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    कासी कांठैं घर करैं, पीवै निर्मल नीर। मुकति नहीं हरि नाव बिन हौं कहै दास कबीर॥

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    ―शकर की पुरी काशी में निवास करते हुए और गंगाजी का निर्मल जल पीते हुए लोग मुक्ति की आशा करते हैं किंतु कबीरदास जी इस प्रकार कहते हैं, बिना हरि नाम के स्मरण के जीव को मुक्ति मिलना असंभव है।

  19. Kabir 17.19
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    कबीर इस संसार कौं; समझाऊॅ कै बार। पूँछ ज पकड़ै भेद की, उतर्या चाहै पार॥

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    ―कबीर दास जी कहते हैं इस संसार के जीवों को कितनी बार समझाऊं कि माया का आश्रय ग्रहरण कर भवसागर को पार उतरने की चाह रखना बिलकुल व्यर्थ है।

  20. Kabir 17.20
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    कबीर मन फूल्या फिरै, करता हूॅ मैं ध्रंम। कोटि क्रम सिरि ले चल्या, चेत न देखे भ्रंम॥

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    ―कबीर दास जी कहते हैं कि लोग अपने मन मे बहुत प्रसन्न रहते हैं कि मैं धर्मं कर रहा हूँ यद्यपि वे वाह्याचरण को ही धर्म के अंतर्गत मानते हैं और उसी से मुक्ति की कामना करते हैं। वह भ्रम का निवारण कर इस बात पर विचार नहीं करता कि अपने सिर पर करोड़ो कुकर्मों का भार लेकर चल रहा है फिर मुक्ति मिले तो कैसे?

  21. Kabir 17.21
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    मोर तोर की जेवड़ी, वलि वन्ध्या संसार। कांसि कहूँ वा सुत कलित, दाझण बारम्बार॥२२॥

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    ―मेरे तेरे की भावना रूपी रस्सी मे बलि के बक्ड़े के समान सारा संसार बंधा हुआ है। पुत्र एव स्त्री रूपी काम एवं कंडुआ के कारण जीवात्मा को आवागमन से मुक्ति नहीं मिल पाती है। वह बार-बार आवागमन चक्र मे पढ़ कर संसार तापो में दग्ध होता रहता है। ​

  22. Kabir 17.22
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    संदर्भ―अपने और पराए की भावना के कारण जीव को संसार से मुक्ति नहीं मिलती। कथणीं कथी तौ क्या मया, जे करणीं नां ठहराइ। कालबूत के कोट ज्यूॅ, देषत ही ढहि जाई॥

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    ―यदि केवल कहते ही कहते मनुष्य ने अपना जीवन व्यतीत कर दिया और उसी अनुसार कार्यं न किया तो उससे क्या लाभ। जिस प्रकार कालवूत के बने हुए कगूरे साधारण प्रयास से ही देखते ही देखते नष्ट हो जाते हैं उसी प्रकार मनुष्य के उस मौखिक कथन का भी कोई अस्तित्व नहीं रहता है वे साधारण परीक्षा मे भी खरे नहीं उतरते।

  23. Kabir 17.23
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    जैसी मुख तैं नीकसै, तैसी चालै चाल। पारब्रह्म नेड़ा रहै, पल में करै निहाल॥

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    ―जिस प्रकार की बातें मनुष्य के मुख से दूसरों के लिए निकलती हैं यदि उस पर वह स्वयं भी आचरण करे तो परब्रह्म उसके समीप ही रहता है और क्षण भर मे उसको मुक्ति प्रदान करके निहाल कर देता है।

  24. Kabir 17.24
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    जैसी मुख तैं नीकसै, तैसी चालै नाहिं। मानिष नहीं ते स्वान गति, बांध्या जमपुर जाँहि॥

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    ―जो व्यक्ति अपने मुख से दूसरो के उपदेश हेतु निकाली हुई बात पर स्वयं नही चलते हैं आचरण नहीं करते हैं वे व्यक्ति मनुष्य नहीं है बल्कि कुत्तो के समान हैं वे पापाचरण के कारण बाँधकर यमलोक ले जाये जाते हैं। ​

  25. Kabir 17.25
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    पद गाएँ मन हरषियाॅ, साषी कहयाँ अनन्द। सोतत नांव न जांणियाँ, गल में पड़िया फंध॥

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    ―मनुष्यो को ईश्वर भक्ति के पद गाने से मन मे प्रसन्नता होती है और साखियो को कहने से आनन्द मिलता है ऐसा लगता है कि उन्होने ईश्वर की सम्पूर्ण भक्ति कर ली है। किन्तु बिना उस परम तत्व के रहस्य को जाने और ध्यान किए उनकी मुक्ति नहीं हो पाती है और वे अन्त तक काल-पाश मे ही पड़े रहते हैं।

  26. Kabir 17.26
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    करता दीसै कीरतन, ऊँचा करि करि तूंड। जांणैं बूझै कुछ नहीं, यौं ही आँधाँ रुड॥५॥

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    ―जो व्यक्ति राम नाम का कीर्तन, बिना उसके महत्व को समझे हुए मुंह उठा-उठा कर ऊंचे स्वर से करते हैं वह वास्तविकता तो कुछ नही जानते-बूझते हैं अंधे रुंड के समान बिना सिर के शरीर के नीचे के भाँग के समान इधर-उधर डोलते हैं। १९. कथणीं बिना करणी कौ अंग

  27. Kabir 17.27
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    मैं जांन्यू पढ़िवौ भलौ, पढ़िया थैं भली जोग। रांम नांम सू प्रीति करि, भलभल नींदौ लोग॥

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    ―कबीरदास जी कहते हैं कि इस बात को मै भली-भांति जानता है कि वेद शास्त्रों का पढना अच्छा काम है किन्तु उससे भी अच्छा योग साधना करना ​है किन्तु यदि इनका ज्ञान न हो तब भी राम नाम का स्मरण करना अच्छा है भले ही लोग निन्दा करते रहे।

  28. Kabir 17.28
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    कबीर पढ़िवा दूरि करि, पुसतक देइ बहाइ। बांवन आषिर सोधि करि, ररै ममैंचित लाई ॥

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    ―कबीरदास जी कहते हैं कि पढना बन्द करके पुस्तको को वहा दे। और वर्णमाला के ५२ अक्षरो का भली प्रकार से शोध करके उसमे से केवल दो अक्षर 'र' और 'म' में अपने चित्त को लगा दे। उसी से मुक्ति प्राप्त होती है। शव्दार्थ―आषिर=अक्षर। ररै ममै=‘र’ और ‘म’।

  29. Kabir 17.29
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    सदर्भ―प्रभु-भक्ति ही जीव का काम्य है। कबीर पढ़िवा दूरि करि, आथि पढ़्या संसार। पीड़ न उपजी प्रीति सूॅ, तौ क्यूं करि करै पुकार॥

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    ―कबीरदास जी कहते हैं कि वेद शास्त्रों का अध्ययन करना छोड़ दे क्योकि उसके पढ़ने के बाद भी ससार का अन्त हो जाता है। यदि हृदय मे प्रभु-प्रेम की पीड़ा न उत्पन्न हुई तो केवल राम नाम का उच्चारण मात्र करने से क्या लाभ?

  30. Kabir 17.30
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    सौंदर्भ―शास्त्रादि के पाठ से ही मुक्ति सम्भव नही होती है । मुक्ति तो प्रभु-प्रेम से ही प्राप्त होती है। पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुवा, पंडित भया न कोइ। एकै अषिर पीव का, पढ़ सु पंडित होइ॥४॥

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    ―संसार के समस्त धर्म ग्रन्थो को पढ-पढ करके सारा संसार मरा गया किन्तु उनमे से कोई भी वास्तविक पंडित नहीं हो सका। किन्तु जिसने प्रियतम का (प्रभु का) एक शब्द ‘राम’ पढ़ लिया वह वास्तव मे पंडित हो गया।

  31. Kabir 17.31
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    संदर्भ―राम नाम का महत्व समझ लेना ही वास्तविक पण्डित होना है। कांमणि काली नागणीं, तीन्यूँ लोक मँझारि। राम सनेही ऊबरे, बिषई खाये भारि॥

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    कामिनी (स्त्री) काली नागिन के समान विष से भरी हुई है। वह तीनो लोको के मध्य घूम-घूम कर लोगो को डंसती रहती है उसके प्रभाव से केवल राम भक्त हो बच पाते हैं विषय वासना मे डूबे हुए व्यक्तियों को तो वह डस हो लेती है।

  32. Kabir 17.32
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    कांमणि मींनीं षांणि की, जे छेड़ौं तौ खाइ। जे हरि चरणां राचिया, तिनके निकट न जाइ॥

    अर्थ (Hindi) — hi.wikisource

    ―कबीर दास जी कहते हैं कि स्त्री मधुमक्खी के समान है जिस प्रकार मधुमक्खी को जो कोई छेडता है उसी को खा जाती है उसी प्रकार स्त्री को भी जो कोई छेड़ता है वह उसी का परलोक बिगाड़ देती है। किन्तु जिन्होने अपने मन को भगवान के चरणो मे लगा रखा है उनके निकट जाने का साहस यह मधुमक्खी रूपी स्त्री नहीं कर पाती है।

  33. Kabir 17.33
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    परनारी राता फिरैं, चोरी बिढ़ता खाँहिं। दिवसि चारि सरसा रहे, अंति समूला जाँहिं॥

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    ―जो व्यक्ति दूसरो की स्त्री मे अनुरक्त रहता है और चोरो की कमाई खाता है वह थोड़े दिनो के लिए भलेही फला फूला दिखाई दे समृद्धवान् हो जाय किन्तु अन्त मे जड़ सहित नष्ट हो जाता है।

  34. पर नारी पर-सुंदरी, बिरला धंचै कोई। खातां मींठी खाँड सी, अति कालि बिप होइ॥