कबीरदास जी कहते हैं कि शाक्त सम्प्रदाय को मानने वाले व्यक्ति सन की रस्सी के समान होते हैं जो जितना हो अधिक भीगती है उतना ही अधिक कड़ी होती जाती है उसी प्रकार शाक्त भी सासारिक विषय-वासनाओ मे लिपटते जाते हैं। वह राम नाम के दो अक्षरो और गुरु से बिलग होने के कारण सीधा बंधा हुआ यमपुर को चला जाता है।
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
साषित सण का जेवड़ा, भीगाँ सूॅ कठठाइ। दोइ आषिर गुरु बाहिरा, बांध्या जमपुर जाइ॥
Kabir 17.11
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Translations & commentaries(3)
Sūtra — Translation
Bhāṣya — Commentary
―इस साखी मे कबीर का शाक्तो के प्रति विरोध व्यक्त हुआ है।
Padārtha — Word-meaning
―साषित=शाक्त। कठठाइ=कडा होता है।