―यदि केवल कहते ही कहते मनुष्य ने अपना जीवन व्यतीत कर दिया और उसी अनुसार कार्यं न किया तो उससे क्या लाभ। जिस प्रकार कालवूत के बने हुए कगूरे साधारण प्रयास से ही देखते ही देखते नष्ट हो जाते हैं उसी प्रकार मनुष्य के उस मौखिक कथन का भी कोई अस्तित्व नहीं रहता है वे साधारण परीक्षा मे भी खरे नहीं उतरते।
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
संदर्भ―अपने और पराए की भावना के कारण जीव को संसार से मुक्ति नहीं मिलती। कथणीं कथी तौ क्या मया, जे करणीं नां ठहराइ। कालबूत के कोट ज्यूॅ, देषत ही ढहि जाई॥
Kabir 17.22
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Translations & commentaries(3)
Sūtra — Translation
Bhāṣya — Commentary
―कथनो के अनुसार ही करणी का होना आवश्यक है?
Padārtha — Word-meaning
―कथणी=कथन, कहना। करणी=कर्म।