―कबीरदास जी कहते हैं कि इस संसार के स्वामी और सन्यासी सभी लोभी हैं वे बाहर से देखने मे तो विरक्त लगते हैं और अंतःकरण मे लोभ व्याप्त रहता है जिस प्रकार पीतल पर खटाई लगा देने से क्षण भर के लिए उसमे चमक आ जाती है उसी प्रकार पाखंडी सन्यासी भी क्षण भर के लिए विरक्त हो जाते हैं। जिस प्रकार हरियाली के लोभ मे पड़ी हुई गाय बार-बार रोकने पर भी ही खेत की ओर दौडती चली जाती है उसी प्रकार वे सन्यासी भी लोभासक्त होकर धनवानो के दरवाजे पर जाया करते हैं।
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
कलि का स्वामी लोभिया, पीतलि धरी षटाइ। राज दुवारां यौं फिरै, ज्यूँ हरिहाई गाई॥
Kabir 17.6
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Translations & commentaries(2)
Sūtra — Translation
Padārtha — Word-meaning
―हरिहाई=जो हटाने पर भी नहीं हटती है।