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Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)

कबीर दोहावली

मूल श्लोकः

पंडित सेती कहि रह्या, भीतरि भेद्या नाहिं। औरूँ कौं परमोधतां, गया मुहरकां मांहिं॥

Kabir 17.13

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Translations & commentaries(3)

Sūtra Translation

Sūtrahi.wikisource· HI

―कबीरदास जी पंडित से कह रहे हैं कि तू ऊपर से ढोग दिखाकर ज्ञानी और भक्त बन रहा है किन्तु भक्ति अन्तःकरण में व्याप्त नही होती है और दूसरों को तो तू ज्ञान और भक्ति का प्रवोध, उपदेश देता रहता है किन्तु स्वयं घोर पाप करता रहता है।

Bhāṣya Commentary

Bhāṣyahi.wikisource· HI

―पंडत दूसरो को तो उपदेश देते हैं किन्तु स्वयं उस पर आचरण नहीं करते हैं।

Padārtha Word-meaning

Padārthahi.wikisource· HI

―पर बोधर्ता=उपदेश करता रहा। मुहरका=वधस्थान।