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Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)

कबीर दोहावली

मूल श्लोकः

कबीर मन फूल्या फिरै, करता हूॅ मैं ध्रंम। कोटि क्रम सिरि ले चल्या, चेत न देखे भ्रंम॥

Kabir 17.20

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Translations & commentaries(3)

Sūtra Translation

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―कबीर दास जी कहते हैं कि लोग अपने मन मे बहुत प्रसन्न रहते हैं कि मैं धर्मं कर रहा हूँ यद्यपि वे वाह्याचरण को ही धर्म के अंतर्गत मानते हैं और उसी से मुक्ति की कामना करते हैं। वह भ्रम का निवारण कर इस बात पर विचार नहीं करता कि अपने सिर पर करोड़ो कुकर्मों का भार लेकर चल रहा है फिर मुक्ति मिले तो कैसे?

Bhāṣya Commentary

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―वाह्याचरण से कहीं मुक्ति मिलती है?

Padārtha Word-meaning

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―ध्रंम=धर्म। क्रम=कर्म। चेति=चेत कर, सावधान होकर भ्रंम=भ्रम।