―जो व्यक्ति राम नाम का कीर्तन, बिना उसके महत्व को समझे हुए मुंह उठा-उठा कर ऊंचे स्वर से करते हैं वह वास्तविकता तो कुछ नही जानते-बूझते हैं अंधे रुंड के समान बिना सिर के शरीर के नीचे के भाँग के समान इधर-उधर डोलते हैं। १९. कथणीं बिना करणी कौ अंग
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
करता दीसै कीरतन, ऊँचा करि करि तूंड। जांणैं बूझै कुछ नहीं, यौं ही आँधाँ रुड॥५॥
Kabir 17.26
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Translations & commentaries(2)
Sūtra — Translation
Bhāṣya — Commentary
―बाह्य रूप से ही राम नाम की रट लगाने से कुछ नही होता जब तक हृदय से उसकी भक्ति नहीं होती है।