―मेरे तेरे की भावना रूपी रस्सी मे बलि के बक्ड़े के समान सारा संसार बंधा हुआ है। पुत्र एव स्त्री रूपी काम एवं कंडुआ के कारण जीवात्मा को आवागमन से मुक्ति नहीं मिल पाती है। वह बार-बार आवागमन चक्र मे पढ़ कर संसार तापो में दग्ध होता रहता है।
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
मोर तोर की जेवड़ी, वलि वन्ध्या संसार। कांसि कहूँ वा सुत कलित, दाझण बारम्बार॥२२॥
Kabir 17.21
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Translations & commentaries(2)
Sūtra — Translation
Padārtha — Word-meaning
―मोर तोर=अपना पराया। जेवडी=रस्सी। कांसि=काँस कंडूवा=बाली के अन्दर बिगडा हुआ दाना। दाझण=जलना। १८. करणीं बिना कथणीं कौ अंग