―कबीरदास जी कहते हैं कि तू अपने स्वभाव के अनुसार तसला और टोकनी लिए हुए इधर-उधर घूमकर खाने पीने का प्रवन्ध करता रहता है। तू राम नाम के अमूल्य रत्न को पहचानता नही और पीतल के पात्र खाने के लिए घूमता रहता है उसी मे मस्त है यह ठीक नहीं है।
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
कबीर तष्टा टोकणीं, लीयै फिरै सुभाइ। राम नाम चीन्हैं नहीं, पीतलि टी कै चाइ॥
Kabir 17.5
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Translations & commentaries(3)
Sūtra — Translation
Bhāṣya — Commentary
―जीव उदर पूर्ति के लिए ही भ्रमण करता रहता है राम का नाम नही लेता है। उसी के प्रति सकेत है।
Padārtha — Word-meaning
―तष्टा=तसला। टोकणी=टोकती। सुभाइ=स्वभाव। चाइ= चाव, इच्छा।