Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali) · Chapter 15
सूषिम जनम कौ अंग
सूषिम जनम कौ अंग
2 verses
कबीर सूषिम सुरति का, जीव न जाणैं जाल। कहै कबीरा दूरि करिं, आतम अदिष्टि काल॥
अर्थ (Hindi) — hi.wikisource
―कबीरदास जी कहते हैं कि सूक्ष्म ब्रह्म के स्मरण के रहस्य को जीव कुछ नही जानता क्योकि माया के आवरण के कारण उसको उसका ज्ञान नहीं हो पाता है। कबीर कहते हैं कि उस माया के आवरण को हटा देने पर ही आत्मा की आत्म तत्व का ज्ञान होगा।
प्राण पंड कौं तजि चलै, मूवा कहै सब कोइ। जीव छतां जांमैं मरै, सूषिम लखै न कोइ॥२॥
अर्थ (Hindi) — hi.wikisource
―जिस समय प्राण इस भौतिक शरीर को छोड़कर चल देते हैं उस समय संसार के सभी व्यक्ति उसको मरा हुआ कहते हैं। जीवात्मा जीवित रहते हुए भी अपने अस्तित्व को ब्रह्म मे लीन कर जीवन्मुक्त हो सकता है किन्तु उस ब्रह्म को कोई देख नहीं पाता है। शव्दार्थ―शरीर। छता=रहते हुए।