―जिस समय प्राण इस भौतिक शरीर को छोड़कर चल देते हैं उस समय संसार के सभी व्यक्ति उसको मरा हुआ कहते हैं। जीवात्मा जीवित रहते हुए भी अपने अस्तित्व को ब्रह्म मे लीन कर जीवन्मुक्त हो सकता है किन्तु उस ब्रह्म को कोई देख नहीं पाता है। शव्दार्थ―शरीर। छता=रहते हुए।
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
प्राण पंड कौं तजि चलै, मूवा कहै सब कोइ। जीव छतां जांमैं मरै, सूषिम लखै न कोइ॥२॥
Kabir 15.2
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Translations & commentaries(2)
Sūtra — Translation
Bhāṣya — Commentary
―जीवन्मुक्त प्राणी जीवित व्यवस्था में ही ब्रह्म के दर्शन कर लेता है।