―कबीरदास जी कहते हैं कि सूक्ष्म ब्रह्म के स्मरण के रहस्य को जीव कुछ नही जानता क्योकि माया के आवरण के कारण उसको उसका ज्ञान नहीं हो पाता है। कबीर कहते हैं कि उस माया के आवरण को हटा देने पर ही आत्मा की आत्म तत्व का ज्ञान होगा।
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
कबीर सूषिम सुरति का, जीव न जाणैं जाल। कहै कबीरा दूरि करिं, आतम अदिष्टि काल॥
Kabir 15.1
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Translations & commentaries(3)
Sūtra — Translation
Bhāṣya — Commentary
―माया के आवरण को हटा देने पर ही आत्मा को आत्म तत्व का ज्ञान हो सकता है।
Padārtha — Word-meaning
―सूषिम=सूक्ष्म। जाल=रहस्य।