सतगुरु ने प्रेमरूपी तैल से संयुक्त दीपक प्रदान किया, जो न घटने वाली वाती सम्पन्न था। दीपक के प्रकाश में शिष्य ने संसार रूपी बाजार में क्रय-विक्रय पूर्णं किया। अब इस संसार रूपी बाजार में पुनः नहीं आगमन होगा। विशेष—प्रस्तुत साखी में ज्ञान के दीपक में प्रेम का तैल तथा अघट वाती वा उल्लेख किया है। क्रय-विक्रय प्रकाश में किया जाता है। संसार रूपी हाट में अज्ञान का अंधकार, माया का तम चारों ओर प्रसारित है। उस तम या अंधकार के कारण सुकृत का क्रय-विक्रय सम्भावित नहीं था। अब अघट वाती तथा अक्षय तेल युक्त ज्ञान का दीपक प्राप्त हो गया है। अब सुकृत तथा पुण्य का क्रम कर है। अतः जीवन्मुक्त होकर साधक अब पुनर्जन्म के क्रम में नहीं पड़ेगा।
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
दीपक दीया तेल भरि, बाती दई अघट्ट। पूरा किया विसाहुणां बहुरि न आँवौ हट्ट॥
Kabir 1.12
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Translations & commentaries(3)
Sūtra — Translation
Bhāṣya — Commentary
सतगुरु की कृपा से न केवल अंधानुकरण से ही उन्मुक्ति प्राप्त हुई और न केवल अज्ञान से अवकाश मिला। वरन् ज्ञान का ऐसा दीपक मिला जो अक्षय और अनन्त हो सतगुरु ने जो ज्ञान का दीपक प्रदान किया, उसमें अक्षय तेल, अघट्ट वाती और अनन्त प्रकाश भी था।
Padārtha — Word-meaning
दीया = दिया = प्रदान किया। अघट्ट = अघट = न कम होने वाली। विसाहुणां = क्रय-विक्रय, खरीदारी। आवौं = आवो = आऊं = आना होगा। हट्ट = हट = हाट = बाजार। = अक्षय तेल लिया गया