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Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)

कबीर दोहावली

मूल श्लोकः

सतगुर साँचा सूरिवाँ, तातैं लोहिं लुहार। कसणी दे कंचन किया, ताइ लिया ततसार॥

Kabir 1.27

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Translations & commentaries(3)

Sūtra Translation

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सतगुर सच्चा शूरमा है। यथा लुहार लोहे को दग्ध करके शुद्ध करता है उसी प्रकार साधना की अग्नि में तप्त करके शिष्य को शुद्ध कर लिया है। शिष्य की साधना की कसौटी में कस कर कंचनवत् बना लिया है और सार तत्व को सम्प्राप्त कर लिया है। विशेष— प्रस्तुत साखी में साधना की अग्नि में शिष्य को निर्मल कर लेने का उल्लेख है। माया के असार तत्व साधना की कसौटी से हो दूर किए जा सकते हैं।

Bhāṣya Commentary

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कृत्रिम या असंगत गुरु मिलने का प्रतिफल होता है, "अधै अघा ठेलिया, दून्यूं कूप पडत" तथा "दून्यू बूड़े घार मैं चढ़ि पाथर की नाव।" सतगुर सम्पर्क में आने का क्या प्रभाव होता है। इसका उल्लेख कबीर ने प्रस्तुत "अंग" की साखी ५, ६, ७, ८, ९, १०, ११, १२, १३ आदि अकित किया है। यहाँ पर पुन कबीर ने सतगुरु की वन्दना करते हुए उसे तत्व एवं सार का शोधक माना है।

Padārtha Word-meaning

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साँचा = सच्चा सूरियाँ = सूरमा = शूरमा। ताते = तात = त्प्त कमणी = कमनी = कसौटी में कसने की प्रक्रिया। तत = तत्व ५.५.६२.