भिद्या—भिदा = भेदा = भेद गया। उनमनी = उन्मनी।
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
संदर्भ-- प्रस्तुत साखी मे कवि ने विगत साखो के भाव को अधिक विस्तार के साथ व्यक्त किया है। विगत साखी मे कवि ने सतगुरु के शूरत्व तथा प्रभावशाली व्यक्तित्व का उल्लेख किया है़। यहाँ उसी भाव का विश्नेषण करते हुए कबीर ने शब्द वाण के तीत्र्व एवं व्यापक प्रभाव को अंकित किया है़। हँसै न बोलै उन्मनी चंचल मेहल्या मारि। कहै कबीर भीतरि भिद्य,सतगुरु कै हथियारि॥
Kabir 1.9