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Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)

कबीर दोहावली

मूल श्लोकः

चेतनि चौकी बैसि करि, सतगुर दीन्हांँ धीर। निरभै होइ निसंक भजि, केवल कहै कबीर॥

Kabir 1.23

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Translations & commentaries(2)

Sūtra Translation

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चैतन्य चौकी पर आसीन होकर सतगुरु ने धैर्य धारण करने का उपदेश दिया। धैर्य के साथ ही सतगुरु ने निर्भर एवं निःशक होकर ईश्वर क आराधना का उपदेश दिया। विशेष—"चैतन्य चौकी" पर बैठकर से तात्पर्य है ज्ञान की चौकी या ज्ञान के आसन पर बैठकर। (२) चेतनि... धीर—ज्ञान के उच्च आसन पर बैठकर सत्गुरु ने शिष्य को धैर्य का धारण करने का आशीर्वाद दिया। (३) "निरभै होइ निसक भजि" से तात्पर्य है निर्भय और शंका रहित होकर आराधना कर। (४) "भजि" से तात्पर्य है 'जप।' यहाँ यह शब्द आदेशात्मक रूप में प्रयुक्त हुआ है। (५) "केवल" का तात्पर्य है अद्वैत ब्रह्म 'केवल' शब्द का प्रयोग संतों ने ब्रह्म अद्वैत अर्थ में किया है।

Padārtha Word-meaning

Padārthahi.wikisource· HI

चेतनि = चेतन = चैतन्य। वैसि = बैठि। धीर = धैर्य। निरभै = निर्भय। निसंक = निःषक। होइन होकर। भजि = भज। करि = कर।