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Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)

कबीर दोहावली

मूल श्लोकः

निस अँधियारी कारणौं, चौरासी लख चन्द। अति आतुर ऊदै किया, तऊ दिष्टि नहि मन्द॥

Kabir 1.18

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Translations & commentaries(3)

Sūtra Translation

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रात्रि के अन्धकार को दूर करने के लिए यदि अत्यन्त आतुरता के साथ ८४ लाख चन्द्र को उदित किया जाय तो भी अन्धकार दूर नहीं होगा, यदि दृष्टि मलिन है। विशेष—यदि दृष्टि मन्द है, या मलीन है तो एक साथ ८४ लाख चन्द्र का प्रकाश भी नहीं दृष्टिगत होगा। चन्द्र और द्वेषों के मध्य में विकारों का ​पर्दा पड़ा है। इसी प्रकार ब्रह्मानुभूति की शक्ति के बिना दृष्टि निर्मल नहीं होगी। (२) निस...कारणौं—रात्रि के अन्धकार के कारण या रात्रि के अन्धकार को दूर करने के लिए। (३) अति आतुर...किया = अत्यन्त आतुरता के साथ अथवा अत्यन्त तीव्रता के साथ चन्द्रमा उदय किया या आयोजित किया। (४) तऊ...मन्द = फिर भी दृष्टि नही है। दृष्टि मन्द ही रहेगी।

Bhāṣya Commentary

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विगत साखी में कवि ने कहा है कि "तिहि और किसको वाणियों जिहि घरि गोविन्द नाहि"। उसी भाव को विकसित करते हुए यहाँ कबीर ने कहा है कि अज्ञान निशा को दूर करने के लिए अत्यन्त आतुरता के साथ यदि ८४ लाख चन्द्र को उदित करने का आयोजन किया जाय तो यह दूर नहीं होगा, यदि दृष्टि माया के कारण मलीन है।

Padārtha Word-meaning

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ऊदै = उदय। दिष्टि—दृष्टि।