गुरु और गोविन्द में अन्तर नहीं है। दोनों एक हैं। उनसे जो कुछ भी भिन्न है वह आकार या माया है। यदि जीते-जी (जीवित रहते हुए) अन्त का (मानव) परित्याग कर देते हैं, ब्रह्मानुभूति से सम्भावित है। विशेष—प्रस्तुत साखी में कबीर ने दो भावों की अभिव्यक्ति की है। प्रथम यह कि सतगुरु और ब्रह्म अभिन्न है। सन्त, साहित्य में यह भाव अनेक बार बड़े उत्साह के साथ व्यक्त किए जाते हैं। द्वितीय भाव यह है कि अहं ब्रह्मानुभूति = या आत्मानुभूति में बाधक होती है। प्रेम एवं ब्रह्माराधना के मार्ग में अहं विनाशकारी। कबीर ने बारम्बार कहा है "यहु तौ घर है प्रेम का खाला का घर नांहि। सीस उतारै भुंई धरै पैठे घर माहिं।
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
संदर्भ—गुरुदेव को अंग की २० वीं साखी में कबीर ने गुरु को अद्वितीय शक्ति का उल्लेख किया है, जिसकी कृपा से एक आध शिष्य का उद्धार होता है। कबीर ने उक्त साखी में कहा है "कहै कबीर गुर ग्यान थै एक आध उबंरत।" यहाँ पर कबीर ने पुनः उमी आशय को अभिनव अप्रस्तुत योजना द्वारा नये कदम में व्यक्त किया है। गुर गोविंद तौ एक है, दूजा यहु आकार। आपा मेट जीवत मरै, तौ पावै करतार॥
Kabir 1.25
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Translations & commentaries(2)
Sūtra — Translation
Padārtha — Word-meaning
दूजा = दूसरा, द्वैत। आकार = माया। आपा = अंह। करतार =ब्रह्म।