―कबीरदास जी कहते हैं कि इस चंचल वृत्ति वाले मन को इतना मारूँगा कि वह टुकडे-टुकडे हो जायगा। पहले तो यह विषय वासना की क्यारी बोता है फिर उसके परिणाम को भोगने के समय क्यो पछिनाता है। कर्मों का फल तो भोगना ही पड़ेगा।
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
कबीर मारूॅ मन कूँ, टूक टूक ह्वै जाइ। विप की क्यारी बोह करि, लुणत कहा पछिताइ॥
Kabir 13.5
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Translations & commentaries(3)
Sūtra — Translation
Bhāṣya — Commentary
―बुरे कर्मों का परिणाम बुरा ही होता है किन्तु परिणाम भोगने में कष्ट होता है।
Padārtha — Word-meaning
―लुणत=काटते समय।