―मन की इच्छाओ का परित्याग कर देना चाहिए। क्यो कि जो कुछ मन चाहता है वह सब कुछ पूरा हो जाना सम्भव नहीं है। यदि जल को मथने से ही घो निकलने लगे तो इस संसार मे फिर कोई व्यक्ति बिना घी का सूखा भोजन क्यो करे? किन्तु वास्तविकता यह है कि पानी मे घी निकलता नही। मन की इच्छाएं पूरी होती नही।
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
मनह मनोर्थ छाँड़ि दे, तेरा किया न होइ। पाँणी मैं घीव निकसै, तौ रूखा खाइ न कोई॥
Kabir 13.29
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Translations & commentaries(3)
Sūtra — Translation
Bhāṣya — Commentary
―यदि मन की इच्छाएं पूरी हो जाया करे तो फिर कभी किस बात की?
Padārtha — Word-meaning
―मनोर्थं=मनोरथ।