―हृदय के भीतर ही आत्मा का दर्पण है किन्तु उसमे परमात्मा का मुख दिखाई नहीं पड़ता है यदि मन सांसारिक विषयों से अपनी चचलता का परित्याग कर दे तो ब्रह्म के दर्शन हो सकते हैं। शव्दार्थ―आरसी=दर्पण, शीशा।
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
हिरदा भीतरि आरसी, मुख देषणां न जाइ। मुख तौ तौपरि देखिये, जे मन की दुविधा जाइ॥
Kabir 13.8
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Translations & commentaries(2)
Sūtra — Translation
Bhāṣya — Commentary
―सासारिक द्वन्द्वो से छुटकारा तभी मिल सकता है जब हृदय के अंदर ब्रह्म का दर्पण हो।