―कबीरदास जी कहते हैं कि मन विषय-वासना के विकारो मे पड़ा हुआ है वह नानाप्रकार के स्वादो के उपभोग मे पढा हुआ है। जो वस्तु गले तक पहुँच गई है उसके लिए अब मना करने से क्या लाभ हो सकता है। इसी प्रकार जो मन इन्द्रियों के वश में हो गया है वह अब किसी भी प्रकार हाथ मे नही आ सकता है।
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
संदर्भ―बिना इन्द्रियो पर अधिकार किए भवसागर से पार पान कठिन है। कबीर मन बिकरै पड़ या, गया स्वाद कै साथि। गलका खाया वरजता, अब क्यूँ आवै हाथि॥
Kabir 13.16
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Translations & commentaries(2)
Sūtra — Translation
Padārtha — Word-meaning
―विकरै=विकारो मे। वरजता=वर्जित किया जाता हुआ।