―मन ही गोरखनाथ है मन हो पर ब्रह्म है और मन ही औघड़ नाथ है। मन ही इन पदों पर पहुँचाने वाला है। यदि मन प्रयत्न-पूर्वक वश में रखा जाये तो यही इस चराचर लोक का कर्ता, नियामक ब्रह्म बन सकता है।
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
मन गोरख मन गोविन्दौ, मन ही औघड़ होइ। जे मन राखैं जतनकरि, तौ आपैं करता सोइ॥
Kabir 13.10
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Translations & commentaries(2)
Sūtra — Translation
Padārtha — Word-meaning
―औघड़=एक प्रकार के साधु।