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Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)

कबीर दोहावली

मूल श्लोकः

मन जाणैं सब घात, जाणत ही औंगुण करैं। काहे की कुसलात, कर दीपक कुवै परैं॥

Kabir 13.7

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Translations & commentaries(2)

Sūtra Translation

Sūtrahi.wikisource· HI

―मन सब बातो को जानते हुए भी नाना प्रकार की बुराइयो को करता है। यदि हाथ मे दीपक लेकर चलने वाला भी कुएँ में गिर पड़े तो उस दीपक से क्या लाभ? उसी प्रकार जान बूझ कर भी यदि मन बुराई करता है तो उसे जानने से क्या लाभ? शव्दार्थ―जाणत जानना। कुवै=कुएँ मे।

Bhāṣya Commentary

Bhāṣyahi.wikisource· HI

―मन राम यूक्त कर भी बुराइयाँ करता है। ​