―हे जीव! कर्म करते समय तुझे इस बात का बोध क्यो नही हुआ कि बुरे कर्म नहीं करने चाहिए इनका परिणाम बुरा होगा और यदि अब बुरे कर्म किए ही हैं तो फिर पछताने से क्या लाभ? उसके परिणाम तो भोगने ही पड़ेंगे। यदि तूने कुकर्मं रूपी बबूल के वृक्ष लगाए हैं तो खाने के लिए मीठे आम कहाँ से प्राप्त हो सकते हैं। विशेष―तुलना कीजिये― कोउ न काहु सुख दुख कर दाता। निज कृत कर्मं भोग सुनु भ्राता॥ मानस-अरण्यकाण्ड शव्दार्थ―अब―आम।
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
संदर्भ―भक्ति के सकीर्ण मार्ग मे मन रूपी हाथी कैसे जा सकता है? करता था तौ क्यूॅ रहया, अब करि क्यूॅ पछताय। बोवै पेड़ बबूल का, अंब कहाँ ते खाय॥
Kabir 13.27