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Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)

कबीर दोहावली

मूल श्लोकः

मन प्रतीत का प्रेम रस, नाँ इस तन मैं ढंग। क्या जाणौ उस पीव सू, कैसे रहसी रंग॥

Kabir 11.14

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Sūtra Translation

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―कबीर दास जी कहते हैं कि मेरा मन न तो ईश्वर के प्रति अटूट विश्वास रखता है और न प्रेम रस से हो परिपूर्ण है और शरीर भी उसके मिलन के लिए उपयुक्त नहीं है फिर समझ में नहीं आता कि राम्र-रंग के खेलो मे उत्त ईश्वर के साथ कैने प्रवृति होगो।