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Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali) · अध्याय 27

Kavita Kosh दोहावली — पृष्ठ १०

कबीर दोहावली / पृष्ठ १०

  1. Kabir 27.1Open verse →

    हस्ती चढ़िये ज्ञान की, सहज दुलीचा डार । श्वान रूप संसार है, भूकन दे झक मार ॥

  2. Kabir 27.2Open verse →

    या दुनिया दो रोज की, मत कर या सो हेत । गुरु चरनन चित लाइये, जो पूरन सुख हेत ॥

  3. Kabir 27.3Open verse →

    कबीर यह तन जात है, सको तो राखु बहोर । खाली हाथों वह गये, जिनके लाख करोर ॥

  4. Kabir 27.4Open verse →

    सरगुन की सेवा करो, निरगुन का करो ज्ञान । निरगुन सरगुन के परे, तहीं हमारा ध्यान ॥

  5. Kabir 27.5Open verse →

    घन गरजै, दामिनि दमकै, बूँदैं बरसैं, झर लाग गए। हर तलाब में कमल खिले, तहाँ भानु परगट भये॥

  6. Kabir 27.6Open verse →

    क्या काशी क्या ऊसर मगहर, राम हृदय बस मोरा। जो कासी तन तजै कबीरा, रामे कौन निहोरा ॥