―कबीरदास जी कहते हैं कि इस संसार के आवागमन के चक्र के कारण शरीर तो बार-बार मरता है किन्तु माया के आकर्षण और मन की विषयों के पीछे की दौड़ समाप्त न हुई, और कभी सांसारिक आशाओ कामनाओ और तृष्णा का ही अन्त हुआ।
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
सदर्भ―माया सन्तो की तो सेवा करती है और अन्य व्यक्तियों को दुख देती है। माया मुई न मन मुवा, मरि मरि गया सरीर। आसा त्रिवणां नाँ मुई, यों कहि गया कबीर॥
Kabir 16.11
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Translations & commentaries(2)
Sūtra — Translation
Padārtha — Word-meaning
मुई=मरी।