―इस संसार के समस्त प्राणी माया की श्रृंखलाओ मे जकड़े हुए हैं किन्तु जब उनके सृजनकर्ता ब्रह्म ने ही उनको माया मे बाँध दिया है तो फिर वे मुक्त ही कैसे हो सकते हैं? शव्दार्थ―संकल=साक्त, श्रृंखला। बापुडे=बपुरे=बेचारे।
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
संकल ही तै सब लहै, माया इहि संसार। ते क्यूँ छूटैं बापुड़े, बाँधे सिरजनहार॥
Kabir 16.25
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Translations & commentaries(2)
Sūtra — Translation
Bhāṣya — Commentary
―ब्रह्म के द्वारा माया के बंधन में बांधा जीव कैसे मुक्त हो सकता है?