―मनुष्य ब्रह्म के अस्तित्व को अल्प समझ करके संसार को ही अधिक महत्वशाली समझता रहता है और उसी मे उलझता रहता है। मनुष्य उस व्यक्ति को ही अपना स्वामी समझ लेते हैं जो माया के साधीन होकर वैभवशाली दिखाई पड़ता है। रज बीरज की कली, तापरि साज्या रूप
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
सौंदर्भ―माया के साथ अहं का त्याग भी आवश्यक है। रामहि थोड़ा जाँणि करि, दुनियाँ आगैं दीन। जीवॉ कौ राजा कहैं, माया के आधीन॥
Kabir 16.18
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Translations & commentaries(2)
Sūtra — Translation
Bhāṣya — Commentary
―वास्तविक स्वामी तो पर ब्रह्म है।