―यह माया संसार रूपी बाडी पर बेलि के समान है और आशा के फंदो मे इसे उलझा दिया गया है। अर्थात् यह माया जीव को आशा और तृष्णा के फंदो मे उलझा देती है। यह टूट सकती है किन्तु किसी प्रकार से छुडाई नही जा सकती है। मानो हानि या लाभ कुछ भी होने पर यह जीवात्मा को पकडे रहने की प्रतिज्ञा कर चुकी है। शव्दार्थ―फंध=फंदा। वाचावन्ध=वचन वद्ध।
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
बाड़ि चंढ़ति बेलि ज्यूँ, उलझी आसा कंध। तूटै पणि छूटै नहीं, भई ज बाचा बंध॥
Kabir 16.26
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Translations & commentaries(2)
Sūtra — Translation
Bhāṣya — Commentary
―माया रूपी बेलि को तोड़ा जा सकता है किन्तु छुडाया नही जा सकता है।