―कबीर दास जी जीव को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि तृष्णा रूपी स्त्री बडी ही पापिनी और वेश्या के समान है अतः तू इससे प्रेम का व्यवहार न कर। पहले तो यह पीछे पडकर जीव को आकर्षित करती है किन्तु इसके संसर्ग से जीव को अनेक दोषो का शिकार बनना पडता है। शव्दार्थ―खोडि=अपराध, पाप
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
त्रिया त्रिषणाँ पापणीं, तासू प्रीति न जोड़ि। पैंड़ी चढ़ पाछाँ पड़ै, लागै मोटी खोड़ि॥
Kabir 16.14
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Translations & commentaries(2)
Sūtra — Translation
Bhāṣya — Commentary
―तृष्णा से विलग रहने का सकेत है।