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Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)

कबीर दोहावली

मूल श्लोकः

त्रिष्णां सांचीं नां बुझै, दिन-दिन बढ़ती जाय। जवासा के रूप ज्यूं, घण मेहाॅ कुमिलाइ॥

Kabir 16.15

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Translations & commentaries(3)

Sūtra Translation

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―सासारिक तृष्णा को जितना ही अधिक शान्त करने का प्रयास किया जाता है वह दिन प्रति दिन उतना ही अधिक बदली जाती है। जिस प्रकार जवासा जितनी ही अधिक वर्षा होती है उतना ही अधिक मुरझाता जाता है उसी प्रकार यह सासारिक तृष्णा भी प्रभु-भक्ति रूपी से हो मुरझा कर शान्त हो सकती है अन्य किसी विधि से नही। विशेष―(१) विभावना अलकार। (२) जवासा वरसात मे मुरझा जाता है― “अर्क जवास पात बिनु मयऊ।” मानस―किष्किन्धा काण्ड

Bhāṣya Commentary

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―सासारिक तृष्णा का विनाश प्रभु-भक्ति से ही सभव है।

Padārtha Word-meaning

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―बघती=बढती। घण=घना, अधिक।