―यह संसार एक बड़ा बाजार है जिसमे इंद्रियो के स्वाद रूपी ठग हैं और माया रूपी वेश्या भी जीवको ठगने का प्रयास करती है। ऐसी अवस्था मे हे जीव! यदि तू दृढतापूर्वक ईश्वर के चरणो का सहारा लेगा तब तो ठीक है नही तो इस संसार ही बाजार से विषय-वासना और माया के द्वारा बिना ठगे बच नहीं सकते हो। शव्दार्थ―वेसा=वेश्या। विशेष―रूपक अलकार।
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
जग हट वाड़ा स्वाद ठग, माया वेसों लाइ। राम चरन नीकों ग्रही, जिनि जाइ जनम ठगाई॥
Kabir 16.1
Audio
Translations & commentaries(2)
Sūtra — Translation
Bhāṣya — Commentary
―इस संसार मे जीव विषय-वासना और माया के द्वारा ठग लिया जाता है।