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Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)

कबीर दोहावली

मूल श्लोकः

⁠सन्द्र्भ――ईश्वर के विषय मे जो कुछ भी कहा जाय उसी पर लोगो को अश्चय् होता है। बसै अपण्डी पण्ड में, तागति लषै न कोइ। कहै कबीरा संत हौ, घडी अचंभा मोहि॥

Kabir 9.2

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Translations & commentaries(3)

Sūtra Translation

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―निराकार ब्रह्म इसी शरीर मे निवास करता है किन्तु फिर भी इस बात पर कोई ध्यान नही देता हे उनकी गति को कोई देख नहीं पाता है। कबीर दास जी कहते हैं कि मुझे बडा आश्चर्य इस बात पर होता है कि लोग साधना के द्वारा उसे प्राप्त क्यो नही कर पाते है।

Bhāṣya Commentary

Bhāṣyahi.wikisource· HI

―ब्रह्म का निवास ह्रदय मे होने पर भी उसको कोई प्राप्त, नहीं कर पाता है।

Padārtha Word-meaning

Padārthahi.wikisource· HI

―अपंडी=पयं=शरीर।