ज्ञान को अग्नि के प्रज्यसित हो जाने पर माया का सागर भहमो भूत हो गया ।आत्मा रुपी पक्षी जो माया रुपी सागर के निरट पे , अब निरिचन्त हो गये । ज्ञानागिन से प्रदग्ध देह भौतिक ददद मे है । यह अग्नि सतगुरु ने नना दिया । शब्दर्थ - दौ = दावाग्नि । मायर = सागर पंपो = रधो । दापी=दघ । पालयै=चड़ेतौ है । गुरु दाधा चेला जल्या, चिरटा लागी आगि
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
संदर्भ - ज्ञान की अग्नि के लगते हो माया और माया के तत्व विनसष्ट हो गये । दौ लागी सायर जल्या, पंपो बैठे आइ । दाधी देह न पालवैं, सतगुर गया लगाय ॥
Kabir 4.6
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Translations & commentaries(2)
Sūtra — Translation
Bhāṣya — Commentary
ज्ञान की अग्नि के लगते हो माया का मागर जल गया प्रौर आत्मा रुपी पक्षी को मुयित हो गई ।