कबीर कह्ते है कि न सागर है, न सीप है न स्वाती का बूंद् है। फिर भी शून्य शिखर गढ मे निर्गुण ब्रह़्म रूपी मोती की उप्लब्धि हो रही है।
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
संदार्भ— हृदय प्रदेश मे व्रह्म क वास है। मन भ्ंवरा वहा लुब्ध हो गया है। सायर नाही सीप बिन, स्वांति ब्ँद भी नांहि। कबीर मोती नीपजैं सुन्नि सिपर गढ मांहि॥
Kabir 4.17
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Translations & commentaries(3)
Sūtra — Translation
Bhāṣya — Commentary
शून्य शिखर गढ मे निर्गुण ब्र्ह्म के दर्शन हुए।
Padārtha — Word-meaning
सायर = सागर। स्वाति = स्वाती। नीप जै = उपजै। सुन्नि = शून्य।