जिसको मैं ढूंढत फिरता था वह सन्मुख मिल गया,परन्तु पाप से पंकिल आत्मा रूपी प्रिय स्त्री प्रिय के चरणो का स्पर्श कैसे करे।
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
जा कारणि मैं ढूंढता,सनमुख मिलिया आइ। धन मैली पिव ऊजला,लागि न सकौं पाइ॥
Kabir 4.35
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Translations & commentaries(3)
Sūtra — Translation
Bhāṣya — Commentary
प्रिय के साथ कैसे एकाकार होऊ मैं तो मलीन हूँ।
Padārtha — Word-meaning
धन=स्त्री,(आत्मा)। मैली=पापो से युक्त।