हृदय में ही मन मुग्ध होकर सीमित हो गया। अब यह बाहर कही नहीं जाता है। मोह की ज्वाला शान्त हो गई और अग्नि पीतल हो गई।
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
तन भीतरि मन मानियाँ, बाहरि कहा न जाइ। ज्वाला तैं फिर जल भया, बुझी बलंती लाइ॥
Kabir 4.30
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Translations & commentaries(3)
Sūtra — Translation
Bhāṣya — Commentary
अब मन अन्तर्मुखी हो गया।
Padārtha — Word-meaning
बाहरि = बाहर।