कबीर कहने हे कि मेरा मन मधुकर निगुंसा ब्रह्म पर घनुगन होकर उसी मे निरन्तर दम गया है । माया रूपी जन के मंहार्द मे परे विरुपिमान निर्गुण ब्रह्म की दर्शन कोई ग्रहण गाहक ही मुक्ता हे।
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
हदे छाँडि बेहदि गया,हुआ निरंतर बास। केवल ज फूल्या फूल बिन,को निरपै निज दास॥
Kabir 4.15
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Translations & commentaries(3)
Sūtra — Translation
Bhāṣya — Commentary
साधक ससीम ब्रह्म को त्याग;निःसीम ब्रह्मोपासना मे अनुरक्त हुआ ।
Padārtha — Word-meaning
मदफर=मदुकर,ब्रह्मर।निरंतर=गदत।नषद=वन।