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Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)

कबीर दोहावली

मूल श्लोकः

​ अहिडी दौ लाइया,मृग पुकारे ऱोई। जा वन मे क्रीला करी,दाभत है वन सोइ ॥

Kabir 4.8

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Translations & commentaries(3)

Sūtra Translation

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सतगुरु= अहेरी ने ज्ञान की अग्नि प्रज्वलित की,संसार रूपी वन गया और इस माया के वन मे वितरण करने वाले इन्द्रिय रूपी मृग रो उठे। जिस वन मे मृग किड़ा करते थे, अब वह वन जल गया। इस लिए मृग दुखि हो गये।

Bhāṣya Commentary

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ज्ञानाग्नि के लगते ही इन्द्रिया विषयो से उन्मुक्त हो गयि है।

Padārtha Word-meaning

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=अहेरी=शिकारि। दौ= दावाग्नि। मृग= इन्द्रिय। कीला= फीढा, सेन। दान्तन=दग्ध।