हरि के शरण मे जाते ही समस्त पाप विनष्ट हो गए। मोह की ज्वाला शान्त हो गाई जब से ब्रह्मा के दर्शन हुए तब से दिन-रात सुख की निधि प्राप्त हो गई।
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
हरि संगति सीतल भया, मिटी मोह की ताप। निस बासुरि सुख निध्य लह्या, जब अतरि प्रगट्या आप॥
Kabir 4.29
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Translations & commentaries(3)
Sūtra — Translation
Bhāṣya — Commentary
प्रभु की शरण मे जाने से समस्त पाप नष्ट हो गए।
Padārtha — Word-meaning
बासुरि = दित। निध्य = निधि।