निर्गुण निराकार ब्रह्म अगम है, अगोचर जहाँ ब्रह्म की ज्योति जगमगाती वहाँ किसी की गति नही है वह पाप-पुण्य कि सीमाओ से परे है। ऐसे ही ब्रह्म ही समक्ष कबीर की प्रार्थना प्रस्तुत होते है।
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
अगम अगोघर गमि नहीं,तहाँ जगमगै जोति। जहाँ कबीरा बंदिगी,(तहां)पाप पुन्य नहीं छोति॥
Kabir 4.14
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Translations & commentaries(3)
Sūtra — Translation
Bhāṣya — Commentary
ब्रह्म प्रकाश स्वरूप है। वह ज्योति का समूह है।
Padārtha — Word-meaning
गमि=गति। ज्योति=प्रकाश। छोति-छूत=अपवित्र।