Sant Seva ParishadSant Seva ParishadSSP · sant seva

Ramcharitmanas · Chapter 5

Sundara Kanda

सुन्दरकाण्ड

Hanuman's leap to Lanka, meeting Sita in the Ashoka grove, burning of Lanka — the most-chanted kanda.

676 verses

📖 Book View
  1. जामवंत के बचन सुहाए। सुनि हनुमंत हृदय अति भाए॥ तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई। सहि दुख कंद मूल फल खाई॥

    Meaning (English)

    Hanuman's heart was greatly cheered to hear Jambavan's auspicious words. 'Wait for me, brothers,' he said, 'sustained by roots, fruits and tubers.'

  2. RCM 5.1.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई। सहि दुख कंद मूल फल खाई।।

    अर्थ (Hindi)

    तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई। सहि दुख कंद मूल फल खाई।।

  3. RCM 5.1.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जब लगि आवौं सीतहि देखी। होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी।।

    अर्थ (Hindi)

    जब लगि आवौं सीतहि देखी। होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी।।

  4. RCM 5.1.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा। चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा।।

    अर्थ (Hindi)

    यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा। चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा।।

  5. RCM 5.1.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सिंधु तीर एक भूधर सुंदर। कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर।।

    अर्थ (Hindi)

    सिंधु तीर एक भूधर सुंदर। कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर।।

  6. RCM 5.1.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बार बार रघुबीर सँभारी। तरकेउ पवनतनय बल भारी।।

    अर्थ (Hindi)

    बार बार रघुबीर सँभारी। तरकेउ पवनतनय बल भारी।।

  7. RCM 5.1.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता। चलेउ सो गा पाताल तुरंता।।

    अर्थ (Hindi)

    जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता। चलेउ सो गा पाताल तुरंता।।

  8. RCM 5.1.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जिमि अमोघ रघुपति कर बाना। एही भाँति चलेउ हनुमाना।।

    अर्थ (Hindi)

    जिमि अमोघ रघुपति कर बाना। एही भाँति चलेउ हनुमाना।।

  9. RCM 5.1.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जलनिधि रघुपति दूत बिचारी। तैं मैनाक होहि श्रमहारी।।

    अर्थ (Hindi)

    जलनिधि रघुपति दूत बिचारी। तैं मैनाक होहि श्रमहारी।।

  10. RCM 5.1.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम।

    अर्थ (Hindi)

    हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम।

  11. RCM 5.1.11
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम।।1।।

    अर्थ (Hindi)

    राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम।।1।।

  12. RCM 5.2.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जात पवनसुत देवन्ह देखा। जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा।।

    अर्थ (Hindi)

    जात पवनसुत देवन्ह देखा। जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा।।

  13. RCM 5.2.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुरसा नाम अहिन्ह कै माता। पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता।।

    अर्थ (Hindi)

    सुरसा नाम अहिन्ह कै माता। पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता।।

  14. RCM 5.2.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा। सुनत बचन कह पवनकुमारा।।

    अर्थ (Hindi)

    आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा। सुनत बचन कह पवनकुमारा।।

  15. RCM 5.2.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम काजु करि फिरि मैं आवौं। सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं।।

    अर्थ (Hindi)

    राम काजु करि फिरि मैं आवौं। सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं।।

  16. RCM 5.2.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तब तव बदन पैठिहउँ आई। सत्य कहउँ मोहि जान दे माई।।

    अर्थ (Hindi)

    तब तव बदन पैठिहउँ आई। सत्य कहउँ मोहि जान दे माई।।

  17. RCM 5.2.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कबनेहुँ जतन देइ नहिं जाना। ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना।।

    अर्थ (Hindi)

    कबनेहुँ जतन देइ नहिं जाना। ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना।।

  18. RCM 5.2.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा। कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा।।

    अर्थ (Hindi)

    जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा। कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा।।

  19. RCM 5.2.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ। तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ। तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ।।

  20. RCM 5.2.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा। तासु दून कपि रूप देखावा।।

    अर्थ (Hindi)

    जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा। तासु दून कपि रूप देखावा।।

  21. RCM 5.2.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा। अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा।।

    अर्थ (Hindi)

    सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा। अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा।।

  22. RCM 5.2.11
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बदन पइठि पुनि बाहेर आवा। मागा बिदा ताहि सिरु नावा।।

    अर्थ (Hindi)

    बदन पइठि पुनि बाहेर आवा। मागा बिदा ताहि सिरु नावा।।

  23. RCM 5.2.12
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा। बुधि बल मरमु तोर मै पावा।।

    अर्थ (Hindi)

    मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा। बुधि बल मरमु तोर मै पावा।।

  24. RCM 5.2.13
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान।

    अर्थ (Hindi)

    राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान।

  25. RCM 5.2.14
    📖 Open verse-by-verse reader#

    आसिष देह गई सो हरषि चलेउ हनुमान।।2।।

    अर्थ (Hindi)

    आसिष देह गई सो हरषि चलेउ हनुमान।।2।।

  26. RCM 5.3.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    निसिचरि एक सिंधु महुँ रहई। करि माया नभु के खग गहई।।

    अर्थ (Hindi)

    निसिचरि एक सिंधु महुँ रहई। करि माया नभु के खग गहई।।

  27. RCM 5.3.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं। जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं। जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं।।

  28. RCM 5.3.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गहइ छाहँ सक सो न उड़ाई। एहि बिधि सदा गगनचर खाई।।

    अर्थ (Hindi)

    गहइ छाहँ सक सो न उड़ाई। एहि बिधि सदा गगनचर खाई।।

  29. RCM 5.3.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सोइ छल हनूमान कहँ कीन्हा। तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा।।

    अर्थ (Hindi)

    सोइ छल हनूमान कहँ कीन्हा। तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा।।

  30. RCM 5.3.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    ताहि मारि मारुतसुत बीरा। बारिधि पार गयउ मतिधीरा।।

    अर्थ (Hindi)

    ताहि मारि मारुतसुत बीरा। बारिधि पार गयउ मतिधीरा।।

  31. RCM 5.3.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तहाँ जाइ देखी बन सोभा। गुंजत चंचरीक मधु लोभा।।

    अर्थ (Hindi)

    तहाँ जाइ देखी बन सोभा। गुंजत चंचरीक मधु लोभा।।

  32. RCM 5.3.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नाना तरु फल फूल सुहाए। खग मृग बृंद देखि मन भाए।।

    अर्थ (Hindi)

    नाना तरु फल फूल सुहाए। खग मृग बृंद देखि मन भाए।।

  33. RCM 5.3.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सैल बिसाल देखि एक आगें। ता पर धाइ चढेउ भय त्यागें।।

    अर्थ (Hindi)

    सैल बिसाल देखि एक आगें। ता पर धाइ चढेउ भय त्यागें।।

  34. RCM 5.3.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    उमा न कछु कपि कै अधिकाई। प्रभु प्रताप जो कालहि खाई।।

    अर्थ (Hindi)

    उमा न कछु कपि कै अधिकाई। प्रभु प्रताप जो कालहि खाई।।

  35. RCM 5.3.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गिरि पर चढि लंका तेहिं देखी। कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी।।

    अर्थ (Hindi)

    गिरि पर चढि लंका तेहिं देखी। कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी।।

  36. RCM 5.3.11
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अति उतंग जलनिधि चहु पासा। कनक कोट कर परम प्रकासा।।

    अर्थ (Hindi)

    अति उतंग जलनिधि चहु पासा। कनक कोट कर परम प्रकासा।।

  37. RCM 5.3.12
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कनक कोट बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना।

    अर्थ (Hindi)

    कनक कोट बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना।

  38. RCM 5.3.13
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना।।

    अर्थ (Hindi)

    चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना।।

  39. RCM 5.3.14
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथिन्ह को गनै।।

    अर्थ (Hindi)

    गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथिन्ह को गनै।।

  40. RCM 5.3.15
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै।।

    अर्थ (Hindi)

    बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै।।

  41. RCM 5.3.16
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं।

    अर्थ (Hindi)

    बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं।

  42. RCM 5.3.17
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नर नाग सुर गंधर्ब कन्या रूप मुनि मन मोहहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    नर नाग सुर गंधर्ब कन्या रूप मुनि मन मोहहीं।।

  43. RCM 5.3.18
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं।

    अर्थ (Hindi)

    कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं।

  44. RCM 5.3.19
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नाना अखारेन्ह भिरहिं बहु बिधि एक एकन्ह तर्जहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    नाना अखारेन्ह भिरहिं बहु बिधि एक एकन्ह तर्जहीं।।

  45. RCM 5.3.20
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं।

    अर्थ (Hindi)

    करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं।

  46. RCM 5.3.21
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहुँ महिष मानषु धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    कहुँ महिष मानषु धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं।।

  47. RCM 5.3.22
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही।

    अर्थ (Hindi)

    एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही।

  48. RCM 5.3.23
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही।।

    अर्थ (Hindi)

    रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही।।

  49. RCM 5.3.24
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार।

    अर्थ (Hindi)

    पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार।

  50. RCM 5.3.25
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अति लघु रूप धरौं निसि नगर करौं पइसार।।3।।

    अर्थ (Hindi)

    अति लघु रूप धरौं निसि नगर करौं पइसार।।3।।

  51. RCM 5.4.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मसक समान रूप कपि धरी। लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी।।

    अर्थ (Hindi)

    मसक समान रूप कपि धरी। लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी।।

  52. RCM 5.4.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नाम लंकिनी एक निसिचरी। सो कह चलेसि मोहि निंदरी।।

    अर्थ (Hindi)

    नाम लंकिनी एक निसिचरी। सो कह चलेसि मोहि निंदरी।।

  53. RCM 5.4.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा। मोर अहार जहाँ लगि चोरा।।

    अर्थ (Hindi)

    जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा। मोर अहार जहाँ लगि चोरा।।

  54. RCM 5.4.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मुठिका एक महा कपि हनी। रुधिर बमत धरनीं ढनमनी।।

    अर्थ (Hindi)

    मुठिका एक महा कपि हनी। रुधिर बमत धरनीं ढनमनी।।

  55. RCM 5.4.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पुनि संभारि उठि सो लंका। जोरि पानि कर बिनय संसका।।

    अर्थ (Hindi)

    पुनि संभारि उठि सो लंका। जोरि पानि कर बिनय संसका।।

  56. RCM 5.4.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा। चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा।।

    अर्थ (Hindi)

    जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा। चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा।।

  57. RCM 5.4.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिकल होसि तैं कपि कें मारे। तब जानेसु निसिचर संघारे।।

    अर्थ (Hindi)

    बिकल होसि तैं कपि कें मारे। तब जानेसु निसिचर संघारे।।

  58. RCM 5.4.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तात मोर अति पुन्य बहूता। देखेउँ नयन राम कर दूता।।

    अर्थ (Hindi)

    तात मोर अति पुन्य बहूता। देखेउँ नयन राम कर दूता।।

  59. RCM 5.4.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।

    अर्थ (Hindi)

    तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।

  60. RCM 5.4.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग।।4।।

    अर्थ (Hindi)

    तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग।।4।।

  61. RCM 5.5.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रबिसि नगर कीजे सब काजा। हृदयँ राखि कौसलपुर राजा।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रबिसि नगर कीजे सब काजा। हृदयँ राखि कौसलपुर राजा।।

  62. RCM 5.5.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई।।

    अर्थ (Hindi)

    गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई।।

  63. RCM 5.5.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गरुड़ सुमेरु रेनू सम ताही। राम कृपा करि चितवा जाही।।

    अर्थ (Hindi)

    गरुड़ सुमेरु रेनू सम ताही। राम कृपा करि चितवा जाही।।

  64. RCM 5.5.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अति लघु रूप धरेउ हनुमाना। पैठा नगर सुमिरि भगवाना।।

    अर्थ (Hindi)

    अति लघु रूप धरेउ हनुमाना। पैठा नगर सुमिरि भगवाना।।

  65. RCM 5.5.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा। देखे जहँ तहँ अगनित जोधा।।

    अर्थ (Hindi)

    मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा। देखे जहँ तहँ अगनित जोधा।।

  66. RCM 5.5.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गयउ दसानन मंदिर माहीं। अति बिचित्र कहि जात सो नाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    गयउ दसानन मंदिर माहीं। अति बिचित्र कहि जात सो नाहीं।।

  67. RCM 5.5.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सयन किए देखा कपि तेही। मंदिर महुँ न दीखि बैदेही।।

    अर्थ (Hindi)

    सयन किए देखा कपि तेही। मंदिर महुँ न दीखि बैदेही।।

  68. RCM 5.5.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भवन एक पुनि दीख सुहावा। हरि मंदिर तहँ भिन्न बनावा।।

    अर्थ (Hindi)

    भवन एक पुनि दीख सुहावा। हरि मंदिर तहँ भिन्न बनावा।।

  69. RCM 5.5.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ।

    अर्थ (Hindi)

    रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ।

  70. RCM 5.5.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नव तुलसिका बृंद तहँ देखि हरषि कपिराइ।।5।।

    अर्थ (Hindi)

    नव तुलसिका बृंद तहँ देखि हरषि कपिराइ।।5।।

  71. RCM 5.6.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लंका निसिचर निकर निवासा। इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा।।

    अर्थ (Hindi)

    लंका निसिचर निकर निवासा। इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा।।

  72. RCM 5.6.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मन महुँ तरक करै कपि लागा। तेहीं समय बिभीषनु जागा।।

    अर्थ (Hindi)

    मन महुँ तरक करै कपि लागा। तेहीं समय बिभीषनु जागा।।

  73. RCM 5.6.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा। हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा।।

    अर्थ (Hindi)

    राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा। हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा।।

  74. RCM 5.6.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एहि सन हठि करिहउँ पहिचानी। साधु ते होइ न कारज हानी।।

    अर्थ (Hindi)

    एहि सन हठि करिहउँ पहिचानी। साधु ते होइ न कारज हानी।।

  75. RCM 5.6.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिप्र रुप धरि बचन सुनाए। सुनत बिभीषण उठि तहँ आए।।

    अर्थ (Hindi)

    बिप्र रुप धरि बचन सुनाए। सुनत बिभीषण उठि तहँ आए।।

  76. RCM 5.6.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करि प्रनाम पूँछी कुसलाई। बिप्र कहहु निज कथा बुझाई।।

    अर्थ (Hindi)

    करि प्रनाम पूँछी कुसलाई। बिप्र कहहु निज कथा बुझाई।।

  77. RCM 5.6.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई। मोरें हृदय प्रीति अति होई।।

    अर्थ (Hindi)

    की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई। मोरें हृदय प्रीति अति होई।।

  78. RCM 5.6.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    की तुम्ह रामु दीन अनुरागी। आयहु मोहि करन बड़भागी।।

    अर्थ (Hindi)

    की तुम्ह रामु दीन अनुरागी। आयहु मोहि करन बड़भागी।।

  79. RCM 5.6.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम।

    अर्थ (Hindi)

    तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम।

  80. RCM 5.6.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम।।6।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम।।6।।

  81. RCM 5.7.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनहु पवनसुत रहनि हमारी। जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनहु पवनसुत रहनि हमारी। जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी।।

  82. RCM 5.7.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा। करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा।।

    अर्थ (Hindi)

    तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा। करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा।।

  83. RCM 5.7.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तामस तनु कछु साधन नाहीं। प्रीति न पद सरोज मन माहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    तामस तनु कछु साधन नाहीं। प्रीति न पद सरोज मन माहीं।।

  84. RCM 5.7.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अब मोहि भा भरोस हनुमंता। बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता।।

    अर्थ (Hindi)

    अब मोहि भा भरोस हनुमंता। बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता।।

  85. RCM 5.7.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जौ रघुबीर अनुग्रह कीन्हा। तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा।।

    अर्थ (Hindi)

    जौ रघुबीर अनुग्रह कीन्हा। तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा।।

  86. RCM 5.7.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती। करहिं सदा सेवक पर प्रीती।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती। करहिं सदा सेवक पर प्रीती।।

  87. RCM 5.7.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहहु कवन मैं परम कुलीना। कपि चंचल सबहीं बिधि हीना।।

    अर्थ (Hindi)

    कहहु कवन मैं परम कुलीना। कपि चंचल सबहीं बिधि हीना।।

  88. RCM 5.7.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रात लेइ जो नाम हमारा। तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रात लेइ जो नाम हमारा। तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा।।

  89. RCM 5.7.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर।

    अर्थ (Hindi)

    अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर।

  90. RCM 5.7.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर।।7।।

    अर्थ (Hindi)

    कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर।।7।।

  91. RCM 5.8.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जानतहूँ अस स्वामि बिसारी। फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी।।

    अर्थ (Hindi)

    जानतहूँ अस स्वामि बिसारी। फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी।।

  92. RCM 5.8.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा। पावा अनिर्बाच्य बिश्रामा।।

    अर्थ (Hindi)

    एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा। पावा अनिर्बाच्य बिश्रामा।।

  93. RCM 5.8.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पुनि सब कथा बिभीषन कही। जेहि बिधि जनकसुता तहँ रही।।

    अर्थ (Hindi)

    पुनि सब कथा बिभीषन कही। जेहि बिधि जनकसुता तहँ रही।।

  94. RCM 5.8.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तब हनुमंत कहा सुनु भ्राता। देखी चहउँ जानकी माता।।

    अर्थ (Hindi)

    तब हनुमंत कहा सुनु भ्राता। देखी चहउँ जानकी माता।।

  95. RCM 5.8.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जुगुति बिभीषन सकल सुनाई। चलेउ पवनसुत बिदा कराई।।

    अर्थ (Hindi)

    जुगुति बिभीषन सकल सुनाई। चलेउ पवनसुत बिदा कराई।।

  96. RCM 5.8.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करि सोइ रूप गयउ पुनि तहवाँ। बन असोक सीता रह जहवाँ।।

    अर्थ (Hindi)

    करि सोइ रूप गयउ पुनि तहवाँ। बन असोक सीता रह जहवाँ।।

  97. RCM 5.8.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देखि मनहि महुँ कीन्ह प्रनामा। बैठेहिं बीति जात निसि जामा।।

    अर्थ (Hindi)

    देखि मनहि महुँ कीन्ह प्रनामा। बैठेहिं बीति जात निसि जामा।।

  98. RCM 5.8.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कृस तन सीस जटा एक बेनी। जपति हृदयँ रघुपति गुन श्रेनी।।

    अर्थ (Hindi)

    कृस तन सीस जटा एक बेनी। जपति हृदयँ रघुपति गुन श्रेनी।।

  99. RCM 5.8.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन।

    अर्थ (Hindi)

    निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन।

  100. RCM 5.8.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन।।8।।

    अर्थ (Hindi)

    परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन।।8।।

  101. RCM 5.9.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तरु पल्लव महुँ रहा लुकाई। करइ बिचार करौं का भाई।।

    अर्थ (Hindi)

    तरु पल्लव महुँ रहा लुकाई। करइ बिचार करौं का भाई।।

  102. RCM 5.9.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तेहि अवसर रावनु तहँ आवा। संग नारि बहु किएँ बनावा।।

    अर्थ (Hindi)

    तेहि अवसर रावनु तहँ आवा। संग नारि बहु किएँ बनावा।।

  103. RCM 5.9.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बहु बिधि खल सीतहि समुझावा। साम दान भय भेद देखावा।।

    अर्थ (Hindi)

    बहु बिधि खल सीतहि समुझावा। साम दान भय भेद देखावा।।

  104. RCM 5.9.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी। मंदोदरी आदि सब रानी।।

    अर्थ (Hindi)

    कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी। मंदोदरी आदि सब रानी।।

  105. RCM 5.9.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तव अनुचरीं करउँ पन मोरा। एक बार बिलोकु मम ओरा।।

    अर्थ (Hindi)

    तव अनुचरीं करउँ पन मोरा। एक बार बिलोकु मम ओरा।।

  106. RCM 5.9.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तृन धरि ओट कहति बैदेही। सुमिरि अवधपति परम सनेही।।

    अर्थ (Hindi)

    तृन धरि ओट कहति बैदेही। सुमिरि अवधपति परम सनेही।।

  107. RCM 5.9.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा। कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा। कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा।।

  108. RCM 5.9.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अस मन समुझु कहति जानकी। खल सुधि नहिं रघुबीर बान की।।

    अर्थ (Hindi)

    अस मन समुझु कहति जानकी। खल सुधि नहिं रघुबीर बान की।।

  109. RCM 5.9.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सठ सूने हरि आनेहि मोहि। अधम निलज्ज लाज नहिं तोही।।

    अर्थ (Hindi)

    सठ सूने हरि आनेहि मोहि। अधम निलज्ज लाज नहिं तोही।।

  110. RCM 5.9.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान।

    अर्थ (Hindi)

    आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान।

  111. RCM 5.9.11
    📖 Open verse-by-verse reader#

    परुष बचन सुनि काढ़ि असि बोला अति खिसिआन।।9।।

    अर्थ (Hindi)

    परुष बचन सुनि काढ़ि असि बोला अति खिसिआन।।9।।

  112. RCM 5.10.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सीता तैं मम कृत अपमाना। कटिहउँ तव सिर कठिन कृपाना।।

    अर्थ (Hindi)

    सीता तैं मम कृत अपमाना। कटिहउँ तव सिर कठिन कृपाना।।

  113. RCM 5.10.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नाहिं त सपदि मानु मम बानी। सुमुखि होति न त जीवन हानी।।

    अर्थ (Hindi)

    नाहिं त सपदि मानु मम बानी। सुमुखि होति न त जीवन हानी।।

  114. RCM 5.10.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    स्याम सरोज दाम सम सुंदर। प्रभु भुज करि कर सम दसकंधर।।

    अर्थ (Hindi)

    स्याम सरोज दाम सम सुंदर। प्रभु भुज करि कर सम दसकंधर।।

  115. RCM 5.10.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सो भुज कंठ कि तव असि घोरा। सुनु सठ अस प्रवान पन मोरा।।

    अर्थ (Hindi)

    सो भुज कंठ कि तव असि घोरा। सुनु सठ अस प्रवान पन मोरा।।

  116. RCM 5.10.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चंद्रहास हरु मम परितापं। रघुपति बिरह अनल संजातं।।

    अर्थ (Hindi)

    चंद्रहास हरु मम परितापं। रघुपति बिरह अनल संजातं।।

  117. RCM 5.10.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सीतल निसित बहसि बर धारा। कह सीता हरु मम दुख भारा।।

    अर्थ (Hindi)

    सीतल निसित बहसि बर धारा। कह सीता हरु मम दुख भारा।।

  118. RCM 5.10.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनत बचन पुनि मारन धावा। मयतनयाँ कहि नीति बुझावा।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनत बचन पुनि मारन धावा। मयतनयाँ कहि नीति बुझावा।।

  119. RCM 5.10.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहेसि सकल निसिचरिन्ह बोलाई। सीतहि बहु बिधि त्रासहु जाई।।

    अर्थ (Hindi)

    कहेसि सकल निसिचरिन्ह बोलाई। सीतहि बहु बिधि त्रासहु जाई।।

  120. RCM 5.10.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मास दिवस महुँ कहा न माना। तौ मैं मारबि काढ़ि कृपाना।।

    अर्थ (Hindi)

    मास दिवस महुँ कहा न माना। तौ मैं मारबि काढ़ि कृपाना।।

  121. RCM 5.10.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भवन गयउ दसकंधर इहाँ पिसाचिनि बृंद।

    अर्थ (Hindi)

    भवन गयउ दसकंधर इहाँ पिसाचिनि बृंद।

  122. RCM 5.10.11
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सीतहि त्रास देखावहि धरहिं रूप बहु मंद।।10।।

    अर्थ (Hindi)

    सीतहि त्रास देखावहि धरहिं रूप बहु मंद।।10।।

  123. RCM 5.11.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    त्रिजटा नाम राच्छसी एका। राम चरन रति निपुन बिबेका।।

    अर्थ (Hindi)

    त्रिजटा नाम राच्छसी एका। राम चरन रति निपुन बिबेका।।

  124. RCM 5.11.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सबन्हौ बोलि सुनाएसि सपना। सीतहि सेइ करहु हित अपना।।

    अर्थ (Hindi)

    सबन्हौ बोलि सुनाएसि सपना। सीतहि सेइ करहु हित अपना।।

  125. RCM 5.11.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सपनें बानर लंका जारी। जातुधान सेना सब मारी।।

    अर्थ (Hindi)

    सपनें बानर लंका जारी। जातुधान सेना सब मारी।।

  126. RCM 5.11.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    खर आरूढ़ नगन दससीसा। मुंडित सिर खंडित भुज बीसा।।

    अर्थ (Hindi)

    खर आरूढ़ नगन दससीसा। मुंडित सिर खंडित भुज बीसा।।

  127. RCM 5.11.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई। लंका मनहुँ बिभीषन पाई।।

    अर्थ (Hindi)

    एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई। लंका मनहुँ बिभीषन पाई।।

  128. RCM 5.11.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नगर फिरी रघुबीर दोहाई। तब प्रभु सीता बोलि पठाई।।

    अर्थ (Hindi)

    नगर फिरी रघुबीर दोहाई। तब प्रभु सीता बोलि पठाई।।

  129. RCM 5.11.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    यह सपना में कहउँ पुकारी। होइहि सत्य गएँ दिन चारी।।

    अर्थ (Hindi)

    यह सपना में कहउँ पुकारी। होइहि सत्य गएँ दिन चारी।।

  130. RCM 5.11.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तासु बचन सुनि ते सब डरीं। जनकसुता के चरनन्हि परीं।।

    अर्थ (Hindi)

    तासु बचन सुनि ते सब डरीं। जनकसुता के चरनन्हि परीं।।

  131. RCM 5.11.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जहँ तहँ गईं सकल तब सीता कर मन सोच।

    अर्थ (Hindi)

    जहँ तहँ गईं सकल तब सीता कर मन सोच।

  132. RCM 5.11.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मास दिवस बीतें मोहि मारिहि निसिचर पोच।।11।।

    अर्थ (Hindi)

    मास दिवस बीतें मोहि मारिहि निसिचर पोच।।11।।

  133. RCM 5.12.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    त्रिजटा सन बोली कर जोरी। मातु बिपति संगिनि तैं मोरी।।

    अर्थ (Hindi)

    त्रिजटा सन बोली कर जोरी। मातु बिपति संगिनि तैं मोरी।।

  134. RCM 5.12.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तजौं देह करु बेगि उपाई। दुसहु बिरहु अब नहिं सहि जाई।।

    अर्थ (Hindi)

    तजौं देह करु बेगि उपाई। दुसहु बिरहु अब नहिं सहि जाई।।

  135. RCM 5.12.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    आनि काठ रचु चिता बनाई। मातु अनल पुनि देहि लगाई।।

    अर्थ (Hindi)

    आनि काठ रचु चिता बनाई। मातु अनल पुनि देहि लगाई।।

  136. RCM 5.12.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सत्य करहि मम प्रीति सयानी। सुनै को श्रवन सूल सम बानी।।

    अर्थ (Hindi)

    सत्य करहि मम प्रीति सयानी। सुनै को श्रवन सूल सम बानी।।

  137. RCM 5.12.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनत बचन पद गहि समुझाएसि। प्रभु प्रताप बल सुजसु सुनाएसि।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनत बचन पद गहि समुझाएसि। प्रभु प्रताप बल सुजसु सुनाएसि।।

  138. RCM 5.12.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    निसि न अनल मिल सुनु सुकुमारी। अस कहि सो निज भवन सिधारी।।

    अर्थ (Hindi)

    निसि न अनल मिल सुनु सुकुमारी। अस कहि सो निज भवन सिधारी।।

  139. RCM 5.12.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कह सीता बिधि भा प्रतिकूला। मिलहि न पावक मिटिहि न सूला।।

    अर्थ (Hindi)

    कह सीता बिधि भा प्रतिकूला। मिलहि न पावक मिटिहि न सूला।।

  140. RCM 5.12.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देखिअत प्रगट गगन अंगारा। अवनि न आवत एकउ तारा।।

    अर्थ (Hindi)

    देखिअत प्रगट गगन अंगारा। अवनि न आवत एकउ तारा।।

  141. RCM 5.12.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पावकमय ससि स्त्रवत न आगी। मानहुँ मोहि जानि हतभागी।।

    अर्थ (Hindi)

    पावकमय ससि स्त्रवत न आगी। मानहुँ मोहि जानि हतभागी।।

  142. RCM 5.12.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनहि बिनय मम बिटप असोका। सत्य नाम करु हरु मम सोका।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनहि बिनय मम बिटप असोका। सत्य नाम करु हरु मम सोका।।

  143. RCM 5.12.11
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नूतन किसलय अनल समाना। देहि अगिनि जनि करहि निदाना।।

    अर्थ (Hindi)

    नूतन किसलय अनल समाना। देहि अगिनि जनि करहि निदाना।।

  144. RCM 5.12.12
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देखि परम बिरहाकुल सीता। सो छन कपिहि कलप सम बीता।।

    अर्थ (Hindi)

    देखि परम बिरहाकुल सीता। सो छन कपिहि कलप सम बीता।।

  145. RCM 5.12.13
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारी तब।

    अर्थ (Hindi)

    कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारी तब।

  146. RCM 5.12.14
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जनु असोक अंगार दीन्हि हरषि उठि कर गहेउ।।12।।

    अर्थ (Hindi)

    जनु असोक अंगार दीन्हि हरषि उठि कर गहेउ।।12।।

  147. RCM 5.13.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तब देखी मुद्रिका मनोहर। राम नाम अंकित अति सुंदर।।

    अर्थ (Hindi)

    तब देखी मुद्रिका मनोहर। राम नाम अंकित अति सुंदर।।

  148. RCM 5.13.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चकित चितव मुदरी पहिचानी। हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी।।

    अर्थ (Hindi)

    चकित चितव मुदरी पहिचानी। हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी।।

  149. RCM 5.13.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जीति को सकइ अजय रघुराई। माया तें असि रचि नहिं जाई।।

    अर्थ (Hindi)

    जीति को सकइ अजय रघुराई। माया तें असि रचि नहिं जाई।।

  150. RCM 5.13.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सीता मन बिचार कर नाना। मधुर बचन बोलेउ हनुमाना।।

    अर्थ (Hindi)

    सीता मन बिचार कर नाना। मधुर बचन बोलेउ हनुमाना।।

  151. RCM 5.13.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रामचंद्र गुन बरनैं लागा। सुनतहिं सीता कर दुख भागा।।

    अर्थ (Hindi)

    रामचंद्र गुन बरनैं लागा। सुनतहिं सीता कर दुख भागा।।

  152. RCM 5.13.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लागीं सुनैं श्रवन मन लाई। आदिहु तें सब कथा सुनाई।।

    अर्थ (Hindi)

    लागीं सुनैं श्रवन मन लाई। आदिहु तें सब कथा सुनाई।।

  153. RCM 5.13.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    श्रवनामृत जेहिं कथा सुहाई। कहि सो प्रगट होति किन भाई।।

    अर्थ (Hindi)

    श्रवनामृत जेहिं कथा सुहाई। कहि सो प्रगट होति किन भाई।।

  154. RCM 5.13.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तब हनुमंत निकट चलि गयऊ। फिरि बैंठीं मन बिसमय भयऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    तब हनुमंत निकट चलि गयऊ। फिरि बैंठीं मन बिसमय भयऊ।।

  155. RCM 5.13.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम दूत मैं मातु जानकी। सत्य सपथ करुनानिधान की।।

    अर्थ (Hindi)

    राम दूत मैं मातु जानकी। सत्य सपथ करुनानिधान की।।

  156. RCM 5.13.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    यह मुद्रिका मातु मैं आनी। दीन्हि राम तुम्ह कहँ सहिदानी।।

    अर्थ (Hindi)

    यह मुद्रिका मातु मैं आनी। दीन्हि राम तुम्ह कहँ सहिदानी।।

  157. RCM 5.13.11
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नर बानरहि संग कहु कैसें। कहि कथा भइ संगति जैसें।।

    अर्थ (Hindi)

    नर बानरहि संग कहु कैसें। कहि कथा भइ संगति जैसें।।

  158. RCM 5.13.12
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कपि के बचन सप्रेम सुनि उपजा मन बिस्वास।।

    अर्थ (Hindi)

    कपि के बचन सप्रेम सुनि उपजा मन बिस्वास।।

  159. RCM 5.13.13
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जाना मन क्रम बचन यह कृपासिंधु कर दास।।13।।

    अर्थ (Hindi)

    जाना मन क्रम बचन यह कृपासिंधु कर दास।।13।।

  160. RCM 5.14.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    हरिजन जानि प्रीति अति गाढ़ी। सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी।।

    अर्थ (Hindi)

    हरिजन जानि प्रीति अति गाढ़ी। सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी।।

  161. RCM 5.14.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बूड़त बिरह जलधि हनुमाना। भयउ तात मों कहुँ जलजाना।।

    अर्थ (Hindi)

    बूड़त बिरह जलधि हनुमाना। भयउ तात मों कहुँ जलजाना।।

  162. RCM 5.14.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अब कहु कुसल जाउँ बलिहारी। अनुज सहित सुख भवन खरारी।।

    अर्थ (Hindi)

    अब कहु कुसल जाउँ बलिहारी। अनुज सहित सुख भवन खरारी।।

  163. RCM 5.14.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कोमलचित कृपाल रघुराई। कपि केहि हेतु धरी निठुराई।।

    अर्थ (Hindi)

    कोमलचित कृपाल रघुराई। कपि केहि हेतु धरी निठुराई।।

  164. RCM 5.14.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सहज बानि सेवक सुख दायक। कबहुँक सुरति करत रघुनायक।।

    अर्थ (Hindi)

    सहज बानि सेवक सुख दायक। कबहुँक सुरति करत रघुनायक।।

  165. RCM 5.14.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कबहुँ नयन मम सीतल ताता। होइहहि निरखि स्याम मृदु गाता।।

    अर्थ (Hindi)

    कबहुँ नयन मम सीतल ताता। होइहहि निरखि स्याम मृदु गाता।।

  166. RCM 5.14.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बचनु न आव नयन भरे बारी। अहह नाथ हौं निपट बिसारी।।

    अर्थ (Hindi)

    बचनु न आव नयन भरे बारी। अहह नाथ हौं निपट बिसारी।।

  167. RCM 5.14.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देखि परम बिरहाकुल सीता। बोला कपि मृदु बचन बिनीता।।

    अर्थ (Hindi)

    देखि परम बिरहाकुल सीता। बोला कपि मृदु बचन बिनीता।।

  168. RCM 5.14.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मातु कुसल प्रभु अनुज समेता। तव दुख दुखी सुकृपा निकेता।।

    अर्थ (Hindi)

    मातु कुसल प्रभु अनुज समेता। तव दुख दुखी सुकृपा निकेता।।

  169. RCM 5.14.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जनि जननी मानहु जियँ ऊना। तुम्ह ते प्रेमु राम कें दूना।।

    अर्थ (Hindi)

    जनि जननी मानहु जियँ ऊना। तुम्ह ते प्रेमु राम कें दूना।।

  170. RCM 5.14.11
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रघुपति कर संदेसु अब सुनु जननी धरि धीर।

    अर्थ (Hindi)

    रघुपति कर संदेसु अब सुनु जननी धरि धीर।

  171. RCM 5.14.12
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अस कहि कपि गद गद भयउ भरे बिलोचन नीर।।14।।

    अर्थ (Hindi)

    अस कहि कपि गद गद भयउ भरे बिलोचन नीर।।14।।

  172. RCM 5.15.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहेउ राम बियोग तव सीता। मो कहुँ सकल भए बिपरीता।।

    अर्थ (Hindi)

    कहेउ राम बियोग तव सीता। मो कहुँ सकल भए बिपरीता।।

  173. RCM 5.15.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नव तरु किसलय मनहुँ कृसानू। कालनिसा सम निसि ससि भानू।।

    अर्थ (Hindi)

    नव तरु किसलय मनहुँ कृसानू। कालनिसा सम निसि ससि भानू।।

  174. RCM 5.15.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कुबलय बिपिन कुंत बन सरिसा। बारिद तपत तेल जनु बरिसा।।

    अर्थ (Hindi)

    कुबलय बिपिन कुंत बन सरिसा। बारिद तपत तेल जनु बरिसा।।

  175. RCM 5.15.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जे हित रहे करत तेइ पीरा। उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा।।

    अर्थ (Hindi)

    जे हित रहे करत तेइ पीरा। उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा।।

  176. RCM 5.15.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहेहू तें कछु दुख घटि होई। काहि कहौं यह जान न कोई।।

    अर्थ (Hindi)

    कहेहू तें कछु दुख घटि होई। काहि कहौं यह जान न कोई।।

  177. RCM 5.15.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा। जानत प्रिया एकु मनु मोरा।।

    अर्थ (Hindi)

    तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा। जानत प्रिया एकु मनु मोरा।।

  178. RCM 5.15.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं। जानु प्रीति रसु एतेनहि माहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं। जानु प्रीति रसु एतेनहि माहीं।।

  179. RCM 5.15.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रभु संदेसु सुनत बैदेही। मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रभु संदेसु सुनत बैदेही। मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही।।

  180. RCM 5.15.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कह कपि हृदयँ धीर धरु माता। सुमिरु राम सेवक सुखदाता।।

    अर्थ (Hindi)

    कह कपि हृदयँ धीर धरु माता। सुमिरु राम सेवक सुखदाता।।

  181. RCM 5.15.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    उर आनहु रघुपति प्रभुताई। सुनि मम बचन तजहु कदराई।।

    अर्थ (Hindi)

    उर आनहु रघुपति प्रभुताई। सुनि मम बचन तजहु कदराई।।

  182. RCM 5.15.11
    📖 Open verse-by-verse reader#

    निसिचर निकर पतंग सम रघुपति बान कृसानु।

    अर्थ (Hindi)

    निसिचर निकर पतंग सम रघुपति बान कृसानु।

  183. RCM 5.15.12
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जननी हृदयँ धीर धरु जरे निसाचर जानु।।15।।

    अर्थ (Hindi)

    जननी हृदयँ धीर धरु जरे निसाचर जानु।।15।।

  184. RCM 5.16.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जौं रघुबीर होति सुधि पाई। करते नहिं बिलंबु रघुराई।।

    अर्थ (Hindi)

    जौं रघुबीर होति सुधि पाई। करते नहिं बिलंबु रघुराई।।

  185. RCM 5.16.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रामबान रबि उएँ जानकी। तम बरूथ कहँ जातुधान की।।

    अर्थ (Hindi)

    रामबान रबि उएँ जानकी। तम बरूथ कहँ जातुधान की।।

  186. RCM 5.16.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अबहिं मातु मैं जाउँ लवाई। प्रभु आयसु नहिं राम दोहाई।।

    अर्थ (Hindi)

    अबहिं मातु मैं जाउँ लवाई। प्रभु आयसु नहिं राम दोहाई।।

  187. RCM 5.16.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कछुक दिवस जननी धरु धीरा। कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा।।

    अर्थ (Hindi)

    कछुक दिवस जननी धरु धीरा। कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा।।

  188. RCM 5.16.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं। तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं।।

    अर्थ (Hindi)

    निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं। तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं।।

  189. RCM 5.16.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    हैं सुत कपि सब तुम्हहि समाना। जातुधान अति भट बलवाना।।

    अर्थ (Hindi)

    हैं सुत कपि सब तुम्हहि समाना। जातुधान अति भट बलवाना।।

  190. RCM 5.16.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मोरें हृदय परम संदेहा। सुनि कपि प्रगट कीन्ह निज देहा।।

    अर्थ (Hindi)

    मोरें हृदय परम संदेहा। सुनि कपि प्रगट कीन्ह निज देहा।।

  191. RCM 5.16.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कनक भूधराकार सरीरा। समर भयंकर अतिबल बीरा।।

    अर्थ (Hindi)

    कनक भूधराकार सरीरा। समर भयंकर अतिबल बीरा।।

  192. RCM 5.16.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सीता मन भरोस तब भयऊ। पुनि लघु रूप पवनसुत लयऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    सीता मन भरोस तब भयऊ। पुनि लघु रूप पवनसुत लयऊ।।

  193. RCM 5.16.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनु माता साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल।

    अर्थ (Hindi)

    सुनु माता साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल।

  194. RCM 5.16.11
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल।।16।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल।।16।।

  195. RCM 5.17.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मन संतोष सुनत कपि बानी। भगति प्रताप तेज बल सानी।।

    अर्थ (Hindi)

    मन संतोष सुनत कपि बानी। भगति प्रताप तेज बल सानी।।

  196. RCM 5.17.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    आसिष दीन्हि रामप्रिय जाना। होहु तात बल सील निधाना।।

    अर्थ (Hindi)

    आसिष दीन्हि रामप्रिय जाना। होहु तात बल सील निधाना।।

  197. RCM 5.17.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अजर अमर गुननिधि सुत होहू। करहुँ बहुत रघुनायक छोहू।।

    अर्थ (Hindi)

    अजर अमर गुननिधि सुत होहू। करहुँ बहुत रघुनायक छोहू।।

  198. RCM 5.17.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना। निर्भर प्रेम मगन हनुमाना।।

    अर्थ (Hindi)

    करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना। निर्भर प्रेम मगन हनुमाना।।

  199. RCM 5.17.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बार बार नाएसि पद सीसा। बोला बचन जोरि कर कीसा।।

    अर्थ (Hindi)

    बार बार नाएसि पद सीसा। बोला बचन जोरि कर कीसा।।

  200. RCM 5.17.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अब कृतकृत्य भयउँ मैं माता। आसिष तव अमोघ बिख्याता।।

    अर्थ (Hindi)

    अब कृतकृत्य भयउँ मैं माता। आसिष तव अमोघ बिख्याता।।

  201. RCM 5.17.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनहु मातु मोहि अतिसय भूखा। लागि देखि सुंदर फल रूखा।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनहु मातु मोहि अतिसय भूखा। लागि देखि सुंदर फल रूखा।।

  202. RCM 5.17.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनु सुत करहिं बिपिन रखवारी। परम सुभट रजनीचर भारी।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनु सुत करहिं बिपिन रखवारी। परम सुभट रजनीचर भारी।।

  203. RCM 5.17.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तिन्ह कर भय माता मोहि नाहीं। जौं तुम्ह सुख मानहु मन माहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    तिन्ह कर भय माता मोहि नाहीं। जौं तुम्ह सुख मानहु मन माहीं।।

  204. RCM 5.17.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देखि बुद्धि बल निपुन कपि कहेउ जानकीं जाहु।

    अर्थ (Hindi)

    देखि बुद्धि बल निपुन कपि कहेउ जानकीं जाहु।

  205. RCM 5.17.11
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रघुपति चरन हृदयँ धरि तात मधुर फल खाहु।।17।।

    अर्थ (Hindi)

    रघुपति चरन हृदयँ धरि तात मधुर फल खाहु।।17।।

  206. RCM 5.18.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चलेउ नाइ सिरु पैठेउ बागा। फल खाएसि तरु तोरैं लागा।।

    अर्थ (Hindi)

    चलेउ नाइ सिरु पैठेउ बागा। फल खाएसि तरु तोरैं लागा।।

  207. RCM 5.18.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रहे तहाँ बहु भट रखवारे। कछु मारेसि कछु जाइ पुकारे।।

    अर्थ (Hindi)

    रहे तहाँ बहु भट रखवारे। कछु मारेसि कछु जाइ पुकारे।।

  208. RCM 5.18.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नाथ एक आवा कपि भारी। तेहिं असोक बाटिका उजारी।।

    अर्थ (Hindi)

    नाथ एक आवा कपि भारी। तेहिं असोक बाटिका उजारी।।

  209. RCM 5.18.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    खाएसि फल अरु बिटप उपारे। रच्छक मर्दि मर्दि महि डारे।।

    अर्थ (Hindi)

    खाएसि फल अरु बिटप उपारे। रच्छक मर्दि मर्दि महि डारे।।

  210. RCM 5.18.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि रावन पठए भट नाना। तिन्हहि देखि गर्जेउ हनुमाना।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि रावन पठए भट नाना। तिन्हहि देखि गर्जेउ हनुमाना।।

  211. RCM 5.18.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सब रजनीचर कपि संघारे। गए पुकारत कछु अधमारे।।

    अर्थ (Hindi)

    सब रजनीचर कपि संघारे। गए पुकारत कछु अधमारे।।

  212. RCM 5.18.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पुनि पठयउ तेहिं अच्छकुमारा। चला संग लै सुभट अपारा।।

    अर्थ (Hindi)

    पुनि पठयउ तेहिं अच्छकुमारा। चला संग लै सुभट अपारा।।

  213. RCM 5.18.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    आवत देखि बिटप गहि तर्जा। ताहि निपाति महाधुनि गर्जा।।

    अर्थ (Hindi)

    आवत देखि बिटप गहि तर्जा। ताहि निपाति महाधुनि गर्जा।।

  214. RCM 5.18.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कछु मारेसि कछु मर्देसि कछु मिलएसि धरि धूरि।

    अर्थ (Hindi)

    कछु मारेसि कछु मर्देसि कछु मिलएसि धरि धूरि।

  215. RCM 5.18.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कछु पुनि जाइ पुकारे प्रभु मर्कट बल भूरि।।18।।

    अर्थ (Hindi)

    कछु पुनि जाइ पुकारे प्रभु मर्कट बल भूरि।।18।।

  216. RCM 5.19.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि सुत बध लंकेस रिसाना। पठएसि मेघनाद बलवाना।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि सुत बध लंकेस रिसाना। पठएसि मेघनाद बलवाना।।

  217. RCM 5.19.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मारसि जनि सुत बांधेसु ताही। देखिअ कपिहि कहाँ कर आही।।

    अर्थ (Hindi)

    मारसि जनि सुत बांधेसु ताही। देखिअ कपिहि कहाँ कर आही।।

  218. RCM 5.19.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चला इंद्रजित अतुलित जोधा। बंधु निधन सुनि उपजा क्रोधा।।

    अर्थ (Hindi)

    चला इंद्रजित अतुलित जोधा। बंधु निधन सुनि उपजा क्रोधा।।

  219. RCM 5.19.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कपि देखा दारुन भट आवा। कटकटाइ गर्जा अरु धावा।।

    अर्थ (Hindi)

    कपि देखा दारुन भट आवा। कटकटाइ गर्जा अरु धावा।।

  220. RCM 5.19.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अति बिसाल तरु एक उपारा। बिरथ कीन्ह लंकेस कुमारा।।

    अर्थ (Hindi)

    अति बिसाल तरु एक उपारा। बिरथ कीन्ह लंकेस कुमारा।।

  221. RCM 5.19.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रहे महाभट ताके संगा। गहि गहि कपि मर्दइ निज अंगा।।

    अर्थ (Hindi)

    रहे महाभट ताके संगा। गहि गहि कपि मर्दइ निज अंगा।।

  222. RCM 5.19.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तिन्हहि निपाति ताहि सन बाजा। भिरे जुगल मानहुँ गजराजा।

    अर्थ (Hindi)

    तिन्हहि निपाति ताहि सन बाजा। भिरे जुगल मानहुँ गजराजा।

  223. RCM 5.19.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मुठिका मारि चढ़ा तरु जाई। ताहि एक छन मुरुछा आई।।

    अर्थ (Hindi)

    मुठिका मारि चढ़ा तरु जाई। ताहि एक छन मुरुछा आई।।

  224. RCM 5.19.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    उठि बहोरि कीन्हिसि बहु माया। जीति न जाइ प्रभंजन जाया।।

    अर्थ (Hindi)

    उठि बहोरि कीन्हिसि बहु माया। जीति न जाइ प्रभंजन जाया।।

  225. RCM 5.19.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    ब्रह्म अस्त्र तेहिं साँधा कपि मन कीन्ह बिचार।

    अर्थ (Hindi)

    ब्रह्म अस्त्र तेहिं साँधा कपि मन कीन्ह बिचार।

  226. RCM 5.19.11
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जौं न ब्रह्मसर मानउँ महिमा मिटइ अपार।।19।।

    अर्थ (Hindi)

    जौं न ब्रह्मसर मानउँ महिमा मिटइ अपार।।19।।

  227. RCM 5.20.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    ब्रह्मबान कपि कहुँ तेहि मारा। परतिहुँ बार कटकु संघारा।।

    अर्थ (Hindi)

    ब्रह्मबान कपि कहुँ तेहि मारा। परतिहुँ बार कटकु संघारा।।

  228. RCM 5.20.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तेहि देखा कपि मुरुछित भयऊ। नागपास बाँधेसि लै गयऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    तेहि देखा कपि मुरुछित भयऊ। नागपास बाँधेसि लै गयऊ।।

  229. RCM 5.20.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जासु नाम जपि सुनहु भवानी। भव बंधन काटहिं नर ग्यानी।।

    अर्थ (Hindi)

    जासु नाम जपि सुनहु भवानी। भव बंधन काटहिं नर ग्यानी।।

  230. RCM 5.20.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तासु दूत कि बंध तरु आवा। प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा।।

    अर्थ (Hindi)

    तासु दूत कि बंध तरु आवा। प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा।।

  231. RCM 5.20.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कपि बंधन सुनि निसिचर धाए। कौतुक लागि सभाँ सब आए।।

    अर्थ (Hindi)

    कपि बंधन सुनि निसिचर धाए। कौतुक लागि सभाँ सब आए।।

  232. RCM 5.20.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    दसमुख सभा दीखि कपि जाई। कहि न जाइ कछु अति प्रभुताई।।

    अर्थ (Hindi)

    दसमुख सभा दीखि कपि जाई। कहि न जाइ कछु अति प्रभुताई।।

  233. RCM 5.20.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कर जोरें सुर दिसिप बिनीता। भृकुटि बिलोकत सकल सभीता।।

    अर्थ (Hindi)

    कर जोरें सुर दिसिप बिनीता। भृकुटि बिलोकत सकल सभीता।।

  234. RCM 5.20.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देखि प्रताप न कपि मन संका। जिमि अहिगन महुँ गरुड़ असंका।।

    अर्थ (Hindi)

    देखि प्रताप न कपि मन संका। जिमि अहिगन महुँ गरुड़ असंका।।

  235. RCM 5.20.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कपिहि बिलोकि दसानन बिहसा कहि दुर्बाद।

    अर्थ (Hindi)

    कपिहि बिलोकि दसानन बिहसा कहि दुर्बाद।

  236. RCM 5.20.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुत बध सुरति कीन्हि पुनि उपजा हृदयँ बिषाद।।20।।

    अर्थ (Hindi)

    सुत बध सुरति कीन्हि पुनि उपजा हृदयँ बिषाद।।20।।

  237. RCM 5.21.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कह लंकेस कवन तैं कीसा। केहिं के बल घालेहि बन खीसा।।

    अर्थ (Hindi)

    कह लंकेस कवन तैं कीसा। केहिं के बल घालेहि बन खीसा।।

  238. RCM 5.21.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    की धौं श्रवन सुनेहि नहिं मोही। देखउँ अति असंक सठ तोही।।

    अर्थ (Hindi)

    की धौं श्रवन सुनेहि नहिं मोही। देखउँ अति असंक सठ तोही।।

  239. RCM 5.21.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मारे निसिचर केहिं अपराधा। कहु सठ तोहि न प्रान कइ बाधा।।

    अर्थ (Hindi)

    मारे निसिचर केहिं अपराधा। कहु सठ तोहि न प्रान कइ बाधा।।

  240. RCM 5.21.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुन रावन ब्रह्मांड निकाया। पाइ जासु बल बिरचित माया।।

    अर्थ (Hindi)

    सुन रावन ब्रह्मांड निकाया। पाइ जासु बल बिरचित माया।।

  241. RCM 5.21.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जाकें बल बिरंचि हरि ईसा। पालत सृजत हरत दससीसा।

    अर्थ (Hindi)

    जाकें बल बिरंचि हरि ईसा। पालत सृजत हरत दससीसा।

  242. RCM 5.21.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जा बल सीस धरत सहसानन। अंडकोस समेत गिरि कानन।।

    अर्थ (Hindi)

    जा बल सीस धरत सहसानन। अंडकोस समेत गिरि कानन।।

  243. RCM 5.21.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    धरइ जो बिबिध देह सुरत्राता। तुम्ह ते सठन्ह सिखावनु दाता।

    अर्थ (Hindi)

    धरइ जो बिबिध देह सुरत्राता। तुम्ह ते सठन्ह सिखावनु दाता।

  244. RCM 5.21.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    हर कोदंड कठिन जेहि भंजा। तेहि समेत नृप दल मद गंजा।।

    अर्थ (Hindi)

    हर कोदंड कठिन जेहि भंजा। तेहि समेत नृप दल मद गंजा।।

  245. RCM 5.21.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    खर दूषन त्रिसिरा अरु बाली। बधे सकल अतुलित बलसाली।।

    अर्थ (Hindi)

    खर दूषन त्रिसिरा अरु बाली। बधे सकल अतुलित बलसाली।।

  246. RCM 5.21.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जाके बल लवलेस तें जितेहु चराचर झारि।

    अर्थ (Hindi)

    जाके बल लवलेस तें जितेहु चराचर झारि।

  247. RCM 5.21.11
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तासु दूत मैं जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि।।21।।

    अर्थ (Hindi)

    तासु दूत मैं जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि।।21।।

  248. RCM 5.22.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जानउँ मैं तुम्हारि प्रभुताई। सहसबाहु सन परी लराई।।

    अर्थ (Hindi)

    जानउँ मैं तुम्हारि प्रभुताई। सहसबाहु सन परी लराई।।

  249. RCM 5.22.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    समर बालि सन करि जसु पावा। सुनि कपि बचन बिहसि बिहरावा।।

    अर्थ (Hindi)

    समर बालि सन करि जसु पावा। सुनि कपि बचन बिहसि बिहरावा।।

  250. RCM 5.22.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    खायउँ फल प्रभु लागी भूँखा। कपि सुभाव तें तोरेउँ रूखा।।

    अर्थ (Hindi)

    खायउँ फल प्रभु लागी भूँखा। कपि सुभाव तें तोरेउँ रूखा।।

  251. RCM 5.22.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सब कें देह परम प्रिय स्वामी। मारहिं मोहि कुमारग गामी।।

    अर्थ (Hindi)

    सब कें देह परम प्रिय स्वामी। मारहिं मोहि कुमारग गामी।।

  252. RCM 5.22.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे। तेहि पर बाँधेउ तनयँ तुम्हारे।।

    अर्थ (Hindi)

    जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे। तेहि पर बाँधेउ तनयँ तुम्हारे।।

  253. RCM 5.22.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मोहि न कछु बाँधे कइ लाजा। कीन्ह चहउँ निज प्रभु कर काजा।।

    अर्थ (Hindi)

    मोहि न कछु बाँधे कइ लाजा। कीन्ह चहउँ निज प्रभु कर काजा।।

  254. RCM 5.22.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिनती करउँ जोरि कर रावन। सुनहु मान तजि मोर सिखावन।।

    अर्थ (Hindi)

    बिनती करउँ जोरि कर रावन। सुनहु मान तजि मोर सिखावन।।

  255. RCM 5.22.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देखहु तुम्ह निज कुलहि बिचारी। भ्रम तजि भजहु भगत भय हारी।।

    अर्थ (Hindi)

    देखहु तुम्ह निज कुलहि बिचारी। भ्रम तजि भजहु भगत भय हारी।।

  256. RCM 5.22.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जाकें डर अति काल डेराई। जो सुर असुर चराचर खाई।।

    अर्थ (Hindi)

    जाकें डर अति काल डेराई। जो सुर असुर चराचर खाई।।

  257. RCM 5.22.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तासों बयरु कबहुँ नहिं कीजै। मोरे कहें जानकी दीजै।।

    अर्थ (Hindi)

    तासों बयरु कबहुँ नहिं कीजै। मोरे कहें जानकी दीजै।।

  258. RCM 5.22.11
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रनतपाल रघुनायक करुना सिंधु खरारि।

    अर्थ (Hindi)

    प्रनतपाल रघुनायक करुना सिंधु खरारि।

  259. RCM 5.22.12
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गएँ सरन प्रभु राखिहैं तव अपराध बिसारि।।22।।

    अर्थ (Hindi)

    गएँ सरन प्रभु राखिहैं तव अपराध बिसारि।।22।।

  260. RCM 5.23.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम चरन पंकज उर धरहू। लंका अचल राज तुम्ह करहू।।

    अर्थ (Hindi)

    राम चरन पंकज उर धरहू। लंका अचल राज तुम्ह करहू।।

  261. RCM 5.23.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रिषि पुलिस्त जसु बिमल मंयका। तेहि ससि महुँ जनि होहु कलंका।।

    अर्थ (Hindi)

    रिषि पुलिस्त जसु बिमल मंयका। तेहि ससि महुँ जनि होहु कलंका।।

  262. RCM 5.23.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम नाम बिनु गिरा न सोहा। देखु बिचारि त्यागि मद मोहा।।

    अर्थ (Hindi)

    राम नाम बिनु गिरा न सोहा। देखु बिचारि त्यागि मद मोहा।।

  263. RCM 5.23.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बसन हीन नहिं सोह सुरारी। सब भूषण भूषित बर नारी।।

    अर्थ (Hindi)

    बसन हीन नहिं सोह सुरारी। सब भूषण भूषित बर नारी।।

  264. RCM 5.23.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम बिमुख संपति प्रभुताई। जाइ रही पाई बिनु पाई।।

    अर्थ (Hindi)

    राम बिमुख संपति प्रभुताई। जाइ रही पाई बिनु पाई।।

  265. RCM 5.23.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं। बरषि गए पुनि तबहिं सुखाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं। बरषि गए पुनि तबहिं सुखाहीं।।

  266. RCM 5.23.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनु दसकंठ कहउँ पन रोपी। बिमुख राम त्राता नहिं कोपी।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनु दसकंठ कहउँ पन रोपी। बिमुख राम त्राता नहिं कोपी।।

  267. RCM 5.23.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    संकर सहस बिष्नु अज तोही। सकहिं न राखि राम कर द्रोही।।

    अर्थ (Hindi)

    संकर सहस बिष्नु अज तोही। सकहिं न राखि राम कर द्रोही।।

  268. RCM 5.23.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मोहमूल बहु सूल प्रद त्यागहु तम अभिमान।

    अर्थ (Hindi)

    मोहमूल बहु सूल प्रद त्यागहु तम अभिमान।

  269. RCM 5.23.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान।।23।।

    अर्थ (Hindi)

    भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान।।23।।

  270. RCM 5.24.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जदपि कहि कपि अति हित बानी। भगति बिबेक बिरति नय सानी।।

    अर्थ (Hindi)

    जदपि कहि कपि अति हित बानी। भगति बिबेक बिरति नय सानी।।

  271. RCM 5.24.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बोला बिहसि महा अभिमानी। मिला हमहि कपि गुर बड़ ग्यानी।।

    अर्थ (Hindi)

    बोला बिहसि महा अभिमानी। मिला हमहि कपि गुर बड़ ग्यानी।।

  272. RCM 5.24.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मृत्यु निकट आई खल तोही। लागेसि अधम सिखावन मोही।।

    अर्थ (Hindi)

    मृत्यु निकट आई खल तोही। लागेसि अधम सिखावन मोही।।

  273. RCM 5.24.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    उलटा होइहि कह हनुमाना। मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना।।

    अर्थ (Hindi)

    उलटा होइहि कह हनुमाना। मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना।।

  274. RCM 5.24.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि कपि बचन बहुत खिसिआना। बेगि न हरहुँ मूढ़ कर प्राना।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि कपि बचन बहुत खिसिआना। बेगि न हरहुँ मूढ़ कर प्राना।।

  275. RCM 5.24.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनत निसाचर मारन धाए। सचिवन्ह सहित बिभीषनु आए।

    अर्थ (Hindi)

    सुनत निसाचर मारन धाए। सचिवन्ह सहित बिभीषनु आए।

  276. RCM 5.24.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नाइ सीस करि बिनय बहूता। नीति बिरोध न मारिअ दूता।।

    अर्थ (Hindi)

    नाइ सीस करि बिनय बहूता। नीति बिरोध न मारिअ दूता।।

  277. RCM 5.24.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    आन दंड कछु करिअ गोसाँई। सबहीं कहा मंत्र भल भाई।।

    अर्थ (Hindi)

    आन दंड कछु करिअ गोसाँई। सबहीं कहा मंत्र भल भाई।।

  278. RCM 5.24.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनत बिहसि बोला दसकंधर। अंग भंग करि पठइअ बंदर।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनत बिहसि बोला दसकंधर। अंग भंग करि पठइअ बंदर।।

  279. RCM 5.24.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कपि कें ममता पूँछ पर सबहि कहउँ समुझाइ।

    अर्थ (Hindi)

    कपि कें ममता पूँछ पर सबहि कहउँ समुझाइ।

  280. RCM 5.24.11
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तेल बोरि पट बाँधि पुनि पावक देहु लगाइ।।24।।

    अर्थ (Hindi)

    तेल बोरि पट बाँधि पुनि पावक देहु लगाइ।।24।।

  281. RCM 5.25.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पूँछहीन बानर तहँ जाइहि। तब सठ निज नाथहि लइ आइहि।।

    अर्थ (Hindi)

    पूँछहीन बानर तहँ जाइहि। तब सठ निज नाथहि लइ आइहि।।

  282. RCM 5.25.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जिन्ह कै कीन्हसि बहुत बड़ाई। देखेउँमैं तिन्ह कै प्रभुताई।।

    अर्थ (Hindi)

    जिन्ह कै कीन्हसि बहुत बड़ाई। देखेउँमैं तिन्ह कै प्रभुताई।।

  283. RCM 5.25.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बचन सुनत कपि मन मुसुकाना। भइ सहाय सारद मैं जाना।।

    अर्थ (Hindi)

    बचन सुनत कपि मन मुसुकाना। भइ सहाय सारद मैं जाना।।

  284. RCM 5.25.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जातुधान सुनि रावन बचना। लागे रचैं मूढ़ सोइ रचना।।

    अर्थ (Hindi)

    जातुधान सुनि रावन बचना। लागे रचैं मूढ़ सोइ रचना।।

  285. RCM 5.25.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रहा न नगर बसन घृत तेला। बाढ़ी पूँछ कीन्ह कपि खेला।।

    अर्थ (Hindi)

    रहा न नगर बसन घृत तेला। बाढ़ी पूँछ कीन्ह कपि खेला।।

  286. RCM 5.25.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कौतुक कहँ आए पुरबासी। मारहिं चरन करहिं बहु हाँसी।।

    अर्थ (Hindi)

    कौतुक कहँ आए पुरबासी। मारहिं चरन करहिं बहु हाँसी।।

  287. RCM 5.25.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बाजहिं ढोल देहिं सब तारी। नगर फेरि पुनि पूँछ प्रजारी।।

    अर्थ (Hindi)

    बाजहिं ढोल देहिं सब तारी। नगर फेरि पुनि पूँछ प्रजारी।।

  288. RCM 5.25.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पावक जरत देखि हनुमंता। भयउ परम लघु रुप तुरंता।।

    अर्थ (Hindi)

    पावक जरत देखि हनुमंता। भयउ परम लघु रुप तुरंता।।

  289. RCM 5.25.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    निबुकि चढ़ेउ कपि कनक अटारीं। भई सभीत निसाचर नारीं।।

    अर्थ (Hindi)

    निबुकि चढ़ेउ कपि कनक अटारीं। भई सभीत निसाचर नारीं।।

  290. RCM 5.25.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास।

    अर्थ (Hindi)

    हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास।

  291. RCM 5.25.11
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अट्टहास करि गर्ज़ा कपि बढ़ि लाग अकास।।25।।

    अर्थ (Hindi)

    अट्टहास करि गर्ज़ा कपि बढ़ि लाग अकास।।25।।

  292. RCM 5.26.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देह बिसाल परम हरुआई। मंदिर तें मंदिर चढ़ धाई।।

    अर्थ (Hindi)

    देह बिसाल परम हरुआई। मंदिर तें मंदिर चढ़ धाई।।

  293. RCM 5.26.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जरइ नगर भा लोग बिहाला। झपट लपट बहु कोटि कराला।।

    अर्थ (Hindi)

    जरइ नगर भा लोग बिहाला। झपट लपट बहु कोटि कराला।।

  294. RCM 5.26.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तात मातु हा सुनिअ पुकारा। एहि अवसर को हमहि उबारा।।

    अर्थ (Hindi)

    तात मातु हा सुनिअ पुकारा। एहि अवसर को हमहि उबारा।।

  295. RCM 5.26.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    हम जो कहा यह कपि नहिं होई। बानर रूप धरें सुर कोई।।

    अर्थ (Hindi)

    हम जो कहा यह कपि नहिं होई। बानर रूप धरें सुर कोई।।

  296. RCM 5.26.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    साधु अवग्या कर फलु ऐसा। जरइ नगर अनाथ कर जैसा।।

    अर्थ (Hindi)

    साधु अवग्या कर फलु ऐसा। जरइ नगर अनाथ कर जैसा।।

  297. RCM 5.26.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जारा नगरु निमिष एक माहीं। एक बिभीषन कर गृह नाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    जारा नगरु निमिष एक माहीं। एक बिभीषन कर गृह नाहीं।।

  298. RCM 5.26.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    ता कर दूत अनल जेहिं सिरिजा। जरा न सो तेहि कारन गिरिजा।।

    अर्थ (Hindi)

    ता कर दूत अनल जेहिं सिरिजा। जरा न सो तेहि कारन गिरिजा।।

  299. RCM 5.26.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    उलटि पलटि लंका सब जारी। कूदि परा पुनि सिंधु मझारी।।

    अर्थ (Hindi)

    उलटि पलटि लंका सब जारी। कूदि परा पुनि सिंधु मझारी।।

  300. RCM 5.26.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पूँछ बुझाइ खोइ श्रम धरि लघु रूप बहोरि।

    अर्थ (Hindi)

    पूँछ बुझाइ खोइ श्रम धरि लघु रूप बहोरि।

  301. RCM 5.26.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जनकसुता के आगें ठाढ़ भयउ कर जोरि।।26।।

    अर्थ (Hindi)

    जनकसुता के आगें ठाढ़ भयउ कर जोरि।।26।।

  302. RCM 5.27.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा। जैसें रघुनायक मोहि दीन्हा।।

    अर्थ (Hindi)

    मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा। जैसें रघुनायक मोहि दीन्हा।।

  303. RCM 5.27.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चूड़ामनि उतारि तब दयऊ। हरष समेत पवनसुत लयऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    चूड़ामनि उतारि तब दयऊ। हरष समेत पवनसुत लयऊ।।

  304. RCM 5.27.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहेहु तात अस मोर प्रनामा। सब प्रकार प्रभु पूरनकामा।।

    अर्थ (Hindi)

    कहेहु तात अस मोर प्रनामा। सब प्रकार प्रभु पूरनकामा।।

  305. RCM 5.27.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    दीन दयाल बिरिदु संभारी। हरहु नाथ मम संकट भारी।।

    अर्थ (Hindi)

    दीन दयाल बिरिदु संभारी। हरहु नाथ मम संकट भारी।।

  306. RCM 5.27.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तात सक्रसुत कथा सुनाएहु। बान प्रताप प्रभुहि समुझाएहु।।

    अर्थ (Hindi)

    तात सक्रसुत कथा सुनाएहु। बान प्रताप प्रभुहि समुझाएहु।।

  307. RCM 5.27.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मास दिवस महुँ नाथु न आवा। तौ पुनि मोहि जिअत नहिं पावा।।

    अर्थ (Hindi)

    मास दिवस महुँ नाथु न आवा। तौ पुनि मोहि जिअत नहिं पावा।।

  308. RCM 5.27.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहु कपि केहि बिधि राखौं प्राना। तुम्हहू तात कहत अब जाना।।

    अर्थ (Hindi)

    कहु कपि केहि बिधि राखौं प्राना। तुम्हहू तात कहत अब जाना।।

  309. RCM 5.27.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तोहि देखि सीतलि भइ छाती। पुनि मो कहुँ सोइ दिनु सो राती।।

    अर्थ (Hindi)

    तोहि देखि सीतलि भइ छाती। पुनि मो कहुँ सोइ दिनु सो राती।।

  310. RCM 5.27.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जनकसुतहि समुझाइ करि बहु बिधि धीरजु दीन्ह।

    अर्थ (Hindi)

    जनकसुतहि समुझाइ करि बहु बिधि धीरजु दीन्ह।

  311. RCM 5.27.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चरन कमल सिरु नाइ कपि गवनु राम पहिं कीन्ह।।27।।

    अर्थ (Hindi)

    चरन कमल सिरु नाइ कपि गवनु राम पहिं कीन्ह।।27।।

  312. RCM 5.28.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चलत महाधुनि गर्जेसि भारी। गर्भ स्त्रवहिं सुनि निसिचर नारी।।

    अर्थ (Hindi)

    चलत महाधुनि गर्जेसि भारी। गर्भ स्त्रवहिं सुनि निसिचर नारी।।

  313. RCM 5.28.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नाघि सिंधु एहि पारहि आवा। सबद किलकिला कपिन्ह सुनावा।।

    अर्थ (Hindi)

    नाघि सिंधु एहि पारहि आवा। सबद किलकिला कपिन्ह सुनावा।।

  314. RCM 5.28.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    हरषे सब बिलोकि हनुमाना। नूतन जन्म कपिन्ह तब जाना।।

    अर्थ (Hindi)

    हरषे सब बिलोकि हनुमाना। नूतन जन्म कपिन्ह तब जाना।।

  315. RCM 5.28.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मुख प्रसन्न तन तेज बिराजा। कीन्हेसि रामचन्द्र कर काजा।।

    अर्थ (Hindi)

    मुख प्रसन्न तन तेज बिराजा। कीन्हेसि रामचन्द्र कर काजा।।

  316. RCM 5.28.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मिले सकल अति भए सुखारी। तलफत मीन पाव जिमि बारी।।

    अर्थ (Hindi)

    मिले सकल अति भए सुखारी। तलफत मीन पाव जिमि बारी।।

  317. RCM 5.28.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चले हरषि रघुनायक पासा। पूँछत कहत नवल इतिहासा।।

    अर्थ (Hindi)

    चले हरषि रघुनायक पासा। पूँछत कहत नवल इतिहासा।।

  318. RCM 5.28.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तब मधुबन भीतर सब आए। अंगद संमत मधु फल खाए।।

    अर्थ (Hindi)

    तब मधुबन भीतर सब आए। अंगद संमत मधु फल खाए।।

  319. RCM 5.28.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रखवारे जब बरजन लागे। मुष्टि प्रहार हनत सब भागे।।

    अर्थ (Hindi)

    रखवारे जब बरजन लागे। मुष्टि प्रहार हनत सब भागे।।

  320. RCM 5.28.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जाइ पुकारे ते सब बन उजार जुबराज।

    अर्थ (Hindi)

    जाइ पुकारे ते सब बन उजार जुबराज।

  321. RCM 5.28.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि सुग्रीव हरष कपि करि आए प्रभु काज।।28।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि सुग्रीव हरष कपि करि आए प्रभु काज।।28।।

  322. RCM 5.29.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जौं न होति सीता सुधि पाई। मधुबन के फल सकहिं कि खाई।।

    अर्थ (Hindi)

    जौं न होति सीता सुधि पाई। मधुबन के फल सकहिं कि खाई।।

  323. RCM 5.29.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एहि बिधि मन बिचार कर राजा। आइ गए कपि सहित समाजा।।

    अर्थ (Hindi)

    एहि बिधि मन बिचार कर राजा। आइ गए कपि सहित समाजा।।

  324. RCM 5.29.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    आइ सबन्हि नावा पद सीसा। मिलेउ सबन्हि अति प्रेम कपीसा।।

    अर्थ (Hindi)

    आइ सबन्हि नावा पद सीसा। मिलेउ सबन्हि अति प्रेम कपीसा।।

  325. RCM 5.29.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पूँछी कुसल कुसल पद देखी। राम कृपाँ भा काजु बिसेषी।।

    अर्थ (Hindi)

    पूँछी कुसल कुसल पद देखी। राम कृपाँ भा काजु बिसेषी।।

  326. RCM 5.29.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नाथ काजु कीन्हेउ हनुमाना। राखे सकल कपिन्ह के प्राना।।

    अर्थ (Hindi)

    नाथ काजु कीन्हेउ हनुमाना। राखे सकल कपिन्ह के प्राना।।

  327. RCM 5.29.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि सुग्रीव बहुरि तेहि मिलेऊ। कपिन्ह सहित रघुपति पहिं चलेऊ।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि सुग्रीव बहुरि तेहि मिलेऊ। कपिन्ह सहित रघुपति पहिं चलेऊ।

  328. RCM 5.29.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम कपिन्ह जब आवत देखा। किएँ काजु मन हरष बिसेषा।।

    अर्थ (Hindi)

    राम कपिन्ह जब आवत देखा। किएँ काजु मन हरष बिसेषा।।

  329. RCM 5.29.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    फटिक सिला बैठे द्वौ भाई। परे सकल कपि चरनन्हि जाई।।

    अर्थ (Hindi)

    फटिक सिला बैठे द्वौ भाई। परे सकल कपि चरनन्हि जाई।।

  330. RCM 5.29.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रीति सहित सब भेटे रघुपति करुना पुंज।

    अर्थ (Hindi)

    प्रीति सहित सब भेटे रघुपति करुना पुंज।

  331. RCM 5.29.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पूँछी कुसल नाथ अब कुसल देखि पद कंज।।29।।

    अर्थ (Hindi)

    पूँछी कुसल नाथ अब कुसल देखि पद कंज।।29।।

  332. RCM 5.30.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जामवंत कह सुनु रघुराया। जा पर नाथ करहु तुम्ह दाया।।

    अर्थ (Hindi)

    जामवंत कह सुनु रघुराया। जा पर नाथ करहु तुम्ह दाया।।

  333. RCM 5.30.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    ताहि सदा सुभ कुसल निरंतर। सुर नर मुनि प्रसन्न ता ऊपर।।

    अर्थ (Hindi)

    ताहि सदा सुभ कुसल निरंतर। सुर नर मुनि प्रसन्न ता ऊपर।।

  334. RCM 5.30.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सोइ बिजई बिनई गुन सागर। तासु सुजसु त्रेलोक उजागर।।

    अर्थ (Hindi)

    सोइ बिजई बिनई गुन सागर। तासु सुजसु त्रेलोक उजागर।।

  335. RCM 5.30.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रभु कीं कृपा भयउ सबु काजू। जन्म हमार सुफल भा आजू।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रभु कीं कृपा भयउ सबु काजू। जन्म हमार सुफल भा आजू।।

  336. RCM 5.30.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नाथ पवनसुत कीन्हि जो करनी। सहसहुँ मुख न जाइ सो बरनी।।

    अर्थ (Hindi)

    नाथ पवनसुत कीन्हि जो करनी। सहसहुँ मुख न जाइ सो बरनी।।

  337. RCM 5.30.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पवनतनय के चरित सुहाए। जामवंत रघुपतिहि सुनाए।।

    अर्थ (Hindi)

    पवनतनय के चरित सुहाए। जामवंत रघुपतिहि सुनाए।।

  338. RCM 5.30.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनत कृपानिधि मन अति भाए। पुनि हनुमान हरषि हियँ लाए।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनत कृपानिधि मन अति भाए। पुनि हनुमान हरषि हियँ लाए।।

  339. RCM 5.30.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहहु तात केहि भाँति जानकी। रहति करति रच्छा स्वप्रान की।।

    अर्थ (Hindi)

    कहहु तात केहि भाँति जानकी। रहति करति रच्छा स्वप्रान की।।

  340. RCM 5.30.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नाम पाहरु दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट।

    अर्थ (Hindi)

    नाम पाहरु दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट।

  341. RCM 5.30.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहिं बाट।।30।।

    अर्थ (Hindi)

    लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहिं बाट।।30।।

  342. RCM 5.31.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चलत मोहि चूड़ामनि दीन्ही। रघुपति हृदयँ लाइ सोइ लीन्ही।।

    अर्थ (Hindi)

    चलत मोहि चूड़ामनि दीन्ही। रघुपति हृदयँ लाइ सोइ लीन्ही।।

  343. RCM 5.31.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नाथ जुगल लोचन भरि बारी। बचन कहे कछु जनककुमारी।।

    अर्थ (Hindi)

    नाथ जुगल लोचन भरि बारी। बचन कहे कछु जनककुमारी।।

  344. RCM 5.31.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अनुज समेत गहेहु प्रभु चरना। दीन बंधु प्रनतारति हरना।।

    अर्थ (Hindi)

    अनुज समेत गहेहु प्रभु चरना। दीन बंधु प्रनतारति हरना।।

  345. RCM 5.31.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मन क्रम बचन चरन अनुरागी। केहि अपराध नाथ हौं त्यागी।।

    अर्थ (Hindi)

    मन क्रम बचन चरन अनुरागी। केहि अपराध नाथ हौं त्यागी।।

  346. RCM 5.31.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अवगुन एक मोर मैं माना। बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना।।

    अर्थ (Hindi)

    अवगुन एक मोर मैं माना। बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना।।

  347. RCM 5.31.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नाथ सो नयनन्हि को अपराधा। निसरत प्रान करिहिं हठि बाधा।।

    अर्थ (Hindi)

    नाथ सो नयनन्हि को अपराधा। निसरत प्रान करिहिं हठि बाधा।।

  348. RCM 5.31.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिरह अगिनि तनु तूल समीरा। स्वास जरइ छन माहिं सरीरा।।

    अर्थ (Hindi)

    बिरह अगिनि तनु तूल समीरा। स्वास जरइ छन माहिं सरीरा।।

  349. RCM 5.31.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नयन स्त्रवहि जलु निज हित लागी। जरैं न पाव देह बिरहागी।

    अर्थ (Hindi)

    नयन स्त्रवहि जलु निज हित लागी। जरैं न पाव देह बिरहागी।

  350. RCM 5.31.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सीता के अति बिपति बिसाला। बिनहिं कहें भलि दीनदयाला।।

    अर्थ (Hindi)

    सीता के अति बिपति बिसाला। बिनहिं कहें भलि दीनदयाला।।

  351. RCM 5.31.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    निमिष निमिष करुनानिधि जाहिं कलप सम बीति।

    अर्थ (Hindi)

    निमिष निमिष करुनानिधि जाहिं कलप सम बीति।

  352. RCM 5.31.11
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बेगि चलिय प्रभु आनिअ भुज बल खल दल जीति।।31।।

    अर्थ (Hindi)

    बेगि चलिय प्रभु आनिअ भुज बल खल दल जीति।।31।।

  353. RCM 5.32.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि सीता दुख प्रभु सुख अयना। भरि आए जल राजिव नयना।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि सीता दुख प्रभु सुख अयना। भरि आए जल राजिव नयना।।

  354. RCM 5.32.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बचन काँय मन मम गति जाही। सपनेहुँ बूझिअ बिपति कि ताही।।

    अर्थ (Hindi)

    बचन काँय मन मम गति जाही। सपनेहुँ बूझिअ बिपति कि ताही।।

  355. RCM 5.32.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई। जब तव सुमिरन भजन न होई।।

    अर्थ (Hindi)

    कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई। जब तव सुमिरन भजन न होई।।

  356. RCM 5.32.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    केतिक बात प्रभु जातुधान की। रिपुहि जीति आनिबी जानकी।।

    अर्थ (Hindi)

    केतिक बात प्रभु जातुधान की। रिपुहि जीति आनिबी जानकी।।

  357. RCM 5.32.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनु कपि तोहि समान उपकारी। नहिं कोउ सुर नर मुनि तनुधारी।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनु कपि तोहि समान उपकारी। नहिं कोउ सुर नर मुनि तनुधारी।।

  358. RCM 5.32.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रति उपकार करौं का तोरा। सनमुख होइ न सकत मन मोरा।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रति उपकार करौं का तोरा। सनमुख होइ न सकत मन मोरा।।

  359. RCM 5.32.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनु सुत उरिन मैं नाहीं। देखेउँ करि बिचार मन माहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनु सुत उरिन मैं नाहीं। देखेउँ करि बिचार मन माहीं।।

  360. RCM 5.32.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पुनि पुनि कपिहि चितव सुरत्राता। लोचन नीर पुलक अति गाता।।

    अर्थ (Hindi)

    पुनि पुनि कपिहि चितव सुरत्राता। लोचन नीर पुलक अति गाता।।

  361. RCM 5.32.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि प्रभु बचन बिलोकि मुख गात हरषि हनुमंत।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि प्रभु बचन बिलोकि मुख गात हरषि हनुमंत।

  362. RCM 5.32.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चरन परेउ प्रेमाकुल त्राहि त्राहि भगवंत।।32।।

    अर्थ (Hindi)

    चरन परेउ प्रेमाकुल त्राहि त्राहि भगवंत।।32।।

  363. RCM 5.33.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बार बार प्रभु चहइ उठावा। प्रेम मगन तेहि उठब न भावा।।

    अर्थ (Hindi)

    बार बार प्रभु चहइ उठावा। प्रेम मगन तेहि उठब न भावा।।

  364. RCM 5.33.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रभु कर पंकज कपि कें सीसा। सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रभु कर पंकज कपि कें सीसा। सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा।।

  365. RCM 5.33.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सावधान मन करि पुनि संकर। लागे कहन कथा अति सुंदर।।

    अर्थ (Hindi)

    सावधान मन करि पुनि संकर। लागे कहन कथा अति सुंदर।।

  366. RCM 5.33.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कपि उठाइ प्रभु हृदयँ लगावा। कर गहि परम निकट बैठावा।।

    अर्थ (Hindi)

    कपि उठाइ प्रभु हृदयँ लगावा। कर गहि परम निकट बैठावा।।

  367. RCM 5.33.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहु कपि रावन पालित लंका। केहि बिधि दहेउ दुर्ग अति बंका।।

    अर्थ (Hindi)

    कहु कपि रावन पालित लंका। केहि बिधि दहेउ दुर्ग अति बंका।।

  368. RCM 5.33.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना। बोला बचन बिगत अभिमाना।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना। बोला बचन बिगत अभिमाना।।

  369. RCM 5.33.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    साखामृग के बड़ि मनुसाई। साखा तें साखा पर जाई।।

    अर्थ (Hindi)

    साखामृग के बड़ि मनुसाई। साखा तें साखा पर जाई।।

  370. RCM 5.33.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नाघि सिंधु हाटकपुर जारा। निसिचर गन बिधि बिपिन उजारा।

    अर्थ (Hindi)

    नाघि सिंधु हाटकपुर जारा। निसिचर गन बिधि बिपिन उजारा।

  371. RCM 5.33.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सो सब तव प्रताप रघुराई। नाथ न कछू मोरि प्रभुताई।।

    अर्थ (Hindi)

    सो सब तव प्रताप रघुराई। नाथ न कछू मोरि प्रभुताई।।

  372. RCM 5.33.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    ता कहुँ प्रभु कछु अगम नहिं जा पर तुम्ह अनुकुल।

    अर्थ (Hindi)

    ता कहुँ प्रभु कछु अगम नहिं जा पर तुम्ह अनुकुल।

  373. RCM 5.33.11
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तब प्रभावँ बड़वानलहिं जारि सकइ खलु तूल।।33।।

    अर्थ (Hindi)

    तब प्रभावँ बड़वानलहिं जारि सकइ खलु तूल।।33।।

  374. RCM 5.34.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नाथ भगति अति सुखदायनी। देहु कृपा करि अनपायनी।।

    अर्थ (Hindi)

    नाथ भगति अति सुखदायनी। देहु कृपा करि अनपायनी।।

  375. RCM 5.34.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि प्रभु परम सरल कपि बानी। एवमस्तु तब कहेउ भवानी।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि प्रभु परम सरल कपि बानी। एवमस्तु तब कहेउ भवानी।।

  376. RCM 5.34.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    उमा राम सुभाउ जेहिं जाना। ताहि भजनु तजि भाव न आना।।

    अर्थ (Hindi)

    उमा राम सुभाउ जेहिं जाना। ताहि भजनु तजि भाव न आना।।

  377. RCM 5.34.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    यह संवाद जासु उर आवा। रघुपति चरन भगति सोइ पावा।।

    अर्थ (Hindi)

    यह संवाद जासु उर आवा। रघुपति चरन भगति सोइ पावा।।

  378. RCM 5.34.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि प्रभु बचन कहहिं कपिबृंदा। जय जय जय कृपाल सुखकंदा।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि प्रभु बचन कहहिं कपिबृंदा। जय जय जय कृपाल सुखकंदा।।

  379. RCM 5.34.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तब रघुपति कपिपतिहि बोलावा। कहा चलैं कर करहु बनावा।।

    अर्थ (Hindi)

    तब रघुपति कपिपतिहि बोलावा। कहा चलैं कर करहु बनावा।।

  380. RCM 5.34.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अब बिलंबु केहि कारन कीजे। तुरत कपिन्ह कहुँ आयसु दीजे।।

    अर्थ (Hindi)

    अब बिलंबु केहि कारन कीजे। तुरत कपिन्ह कहुँ आयसु दीजे।।

  381. RCM 5.34.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कौतुक देखि सुमन बहु बरषी। नभ तें भवन चले सुर हरषी।।

    अर्थ (Hindi)

    कौतुक देखि सुमन बहु बरषी। नभ तें भवन चले सुर हरषी।।

  382. RCM 5.34.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कपिपति बेगि बोलाए आए जूथप जूथ।

    अर्थ (Hindi)

    कपिपति बेगि बोलाए आए जूथप जूथ।

  383. RCM 5.34.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नाना बरन अतुल बल बानर भालु बरूथ।।34।।

    अर्थ (Hindi)

    नाना बरन अतुल बल बानर भालु बरूथ।।34।।

  384. RCM 5.35.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रभु पद पंकज नावहिं सीसा। गरजहिं भालु महाबल कीसा।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रभु पद पंकज नावहिं सीसा। गरजहिं भालु महाबल कीसा।।

  385. RCM 5.35.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देखी राम सकल कपि सेना। चितइ कृपा करि राजिव नैना।।

    अर्थ (Hindi)

    देखी राम सकल कपि सेना। चितइ कृपा करि राजिव नैना।।

  386. RCM 5.35.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम कृपा बल पाइ कपिंदा। भए पच्छजुत मनहुँ गिरिंदा।।

    अर्थ (Hindi)

    राम कृपा बल पाइ कपिंदा। भए पच्छजुत मनहुँ गिरिंदा।।

  387. RCM 5.35.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    हरषि राम तब कीन्ह पयाना। सगुन भए सुंदर सुभ नाना।।

    अर्थ (Hindi)

    हरषि राम तब कीन्ह पयाना। सगुन भए सुंदर सुभ नाना।।

  388. RCM 5.35.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जासु सकल मंगलमय कीती। तासु पयान सगुन यह नीती।।

    अर्थ (Hindi)

    जासु सकल मंगलमय कीती। तासु पयान सगुन यह नीती।।

  389. RCM 5.35.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रभु पयान जाना बैदेहीं। फरकि बाम अँग जनु कहि देहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रभु पयान जाना बैदेहीं। फरकि बाम अँग जनु कहि देहीं।।

  390. RCM 5.35.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जोइ जोइ सगुन जानकिहि होई। असगुन भयउ रावनहि सोई।।

    अर्थ (Hindi)

    जोइ जोइ सगुन जानकिहि होई। असगुन भयउ रावनहि सोई।।

  391. RCM 5.35.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चला कटकु को बरनैं पारा। गर्जहि बानर भालु अपारा।।

    अर्थ (Hindi)

    चला कटकु को बरनैं पारा। गर्जहि बानर भालु अपारा।।

  392. RCM 5.35.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नख आयुध गिरि पादपधारी। चले गगन महि इच्छाचारी।।

    अर्थ (Hindi)

    नख आयुध गिरि पादपधारी। चले गगन महि इच्छाचारी।।

  393. RCM 5.35.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    केहरिनाद भालु कपि करहीं। डगमगाहिं दिग्गज चिक्करहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    केहरिनाद भालु कपि करहीं। डगमगाहिं दिग्गज चिक्करहीं।।

  394. RCM 5.35.11
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चिक्करहिं दिग्गज डोल महि गिरि लोल सागर खरभरे।

    अर्थ (Hindi)

    चिक्करहिं दिग्गज डोल महि गिरि लोल सागर खरभरे।

  395. RCM 5.35.12
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मन हरष सभ गंधर्ब सुर मुनि नाग किन्नर दुख टरे।।

    अर्थ (Hindi)

    मन हरष सभ गंधर्ब सुर मुनि नाग किन्नर दुख टरे।।

  396. RCM 5.35.13
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कटकटहिं मर्कट बिकट भट बहु कोटि कोटिन्ह धावहीं।

    अर्थ (Hindi)

    कटकटहिं मर्कट बिकट भट बहु कोटि कोटिन्ह धावहीं।

  397. RCM 5.35.14
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जय राम प्रबल प्रताप कोसलनाथ गुन गन गावहीं।।1।।

    अर्थ (Hindi)

    जय राम प्रबल प्रताप कोसलनाथ गुन गन गावहीं।।1।।

  398. RCM 5.35.15
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सहि सक न भार उदार अहिपति बार बारहिं मोहई।

    अर्थ (Hindi)

    सहि सक न भार उदार अहिपति बार बारहिं मोहई।

  399. RCM 5.35.16
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गह दसन पुनि पुनि कमठ पृष्ट कठोर सो किमि सोहई।।

    अर्थ (Hindi)

    गह दसन पुनि पुनि कमठ पृष्ट कठोर सो किमि सोहई।।

  400. RCM 5.35.17
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रघुबीर रुचिर प्रयान प्रस्थिति जानि परम सुहावनी।

    अर्थ (Hindi)

    रघुबीर रुचिर प्रयान प्रस्थिति जानि परम सुहावनी।

  401. RCM 5.35.18
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जनु कमठ खर्पर सर्पराज सो लिखत अबिचल पावनी।।2।।

    अर्थ (Hindi)

    जनु कमठ खर्पर सर्पराज सो लिखत अबिचल पावनी।।2।।

  402. RCM 5.35.19
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एहि बिधि जाइ कृपानिधि उतरे सागर तीर।

    अर्थ (Hindi)

    एहि बिधि जाइ कृपानिधि उतरे सागर तीर।

  403. RCM 5.35.20
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जहँ तहँ लागे खान फल भालु बिपुल कपि बीर।।35।।

    अर्थ (Hindi)

    जहँ तहँ लागे खान फल भालु बिपुल कपि बीर।।35।।

  404. RCM 5.36.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    उहाँ निसाचर रहहिं ससंका। जब ते जारि गयउ कपि लंका।।

    अर्थ (Hindi)

    उहाँ निसाचर रहहिं ससंका। जब ते जारि गयउ कपि लंका।।

  405. RCM 5.36.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    निज निज गृहँ सब करहिं बिचारा। नहिं निसिचर कुल केर उबारा।।

    अर्थ (Hindi)

    निज निज गृहँ सब करहिं बिचारा। नहिं निसिचर कुल केर उबारा।।

  406. RCM 5.36.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जासु दूत बल बरनि न जाई। तेहि आएँ पुर कवन भलाई।।

    अर्थ (Hindi)

    जासु दूत बल बरनि न जाई। तेहि आएँ पुर कवन भलाई।।

  407. RCM 5.36.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    दूतन्हि सन सुनि पुरजन बानी। मंदोदरी अधिक अकुलानी।।

    अर्थ (Hindi)

    दूतन्हि सन सुनि पुरजन बानी। मंदोदरी अधिक अकुलानी।।

  408. RCM 5.36.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रहसि जोरि कर पति पग लागी। बोली बचन नीति रस पागी।।

    अर्थ (Hindi)

    रहसि जोरि कर पति पग लागी। बोली बचन नीति रस पागी।।

  409. RCM 5.36.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कंत करष हरि सन परिहरहू। मोर कहा अति हित हियँ धरहु।।

    अर्थ (Hindi)

    कंत करष हरि सन परिहरहू। मोर कहा अति हित हियँ धरहु।।

  410. RCM 5.36.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    समुझत जासु दूत कइ करनी। स्त्रवहीं गर्भ रजनीचर धरनी।।

    अर्थ (Hindi)

    समुझत जासु दूत कइ करनी। स्त्रवहीं गर्भ रजनीचर धरनी।।

  411. RCM 5.36.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तासु नारि निज सचिव बोलाई। पठवहु कंत जो चहहु भलाई।।

    अर्थ (Hindi)

    तासु नारि निज सचिव बोलाई। पठवहु कंत जो चहहु भलाई।।

  412. RCM 5.36.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तब कुल कमल बिपिन दुखदाई। सीता सीत निसा सम आई।।

    अर्थ (Hindi)

    तब कुल कमल बिपिन दुखदाई। सीता सीत निसा सम आई।।

  413. RCM 5.36.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनहु नाथ सीता बिनु दीन्हें। हित न तुम्हार संभु अज कीन्हें।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनहु नाथ सीता बिनु दीन्हें। हित न तुम्हार संभु अज कीन्हें।।

  414. RCM 5.36.11
    📖 Open verse-by-verse reader#

    -राम बान अहि गन सरिस निकर निसाचर भेक।

    अर्थ (Hindi)

    -राम बान अहि गन सरिस निकर निसाचर भेक।

  415. RCM 5.36.12
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जब लगि ग्रसत न तब लगि जतनु करहु तजि टेक।।36।।

    अर्थ (Hindi)

    जब लगि ग्रसत न तब लगि जतनु करहु तजि टेक।।36।।

  416. RCM 5.37.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    श्रवन सुनी सठ ता करि बानी। बिहसा जगत बिदित अभिमानी।।

    अर्थ (Hindi)

    श्रवन सुनी सठ ता करि बानी। बिहसा जगत बिदित अभिमानी।।

  417. RCM 5.37.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सभय सुभाउ नारि कर साचा। मंगल महुँ भय मन अति काचा।।

    अर्थ (Hindi)

    सभय सुभाउ नारि कर साचा। मंगल महुँ भय मन अति काचा।।

  418. RCM 5.37.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जौं आवइ मर्कट कटकाई। जिअहिं बिचारे निसिचर खाई।।

    अर्थ (Hindi)

    जौं आवइ मर्कट कटकाई। जिअहिं बिचारे निसिचर खाई।।

  419. RCM 5.37.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कंपहिं लोकप जाकी त्रासा। तासु नारि सभीत बड़ि हासा।।

    अर्थ (Hindi)

    कंपहिं लोकप जाकी त्रासा। तासु नारि सभीत बड़ि हासा।।

  420. RCM 5.37.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अस कहि बिहसि ताहि उर लाई। चलेउ सभाँ ममता अधिकाई।।

    अर्थ (Hindi)

    अस कहि बिहसि ताहि उर लाई। चलेउ सभाँ ममता अधिकाई।।

  421. RCM 5.37.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मंदोदरी हृदयँ कर चिंता। भयउ कंत पर बिधि बिपरीता।।

    अर्थ (Hindi)

    मंदोदरी हृदयँ कर चिंता। भयउ कंत पर बिधि बिपरीता।।

  422. RCM 5.37.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बैठेउ सभाँ खबरि असि पाई। सिंधु पार सेना सब आई।।

    अर्थ (Hindi)

    बैठेउ सभाँ खबरि असि पाई। सिंधु पार सेना सब आई।।

  423. RCM 5.37.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बूझेसि सचिव उचित मत कहहू। ते सब हँसे मष्ट करि रहहू।।

    अर्थ (Hindi)

    बूझेसि सचिव उचित मत कहहू। ते सब हँसे मष्ट करि रहहू।।

  424. RCM 5.37.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जितेहु सुरासुर तब श्रम नाहीं। नर बानर केहि लेखे माही।।

    अर्थ (Hindi)

    जितेहु सुरासुर तब श्रम नाहीं। नर बानर केहि लेखे माही।।

  425. RCM 5.37.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस।

    अर्थ (Hindi)

    सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस।

  426. RCM 5.37.11
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास।।37।।

    अर्थ (Hindi)

    राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास।।37।।

  427. RCM 5.38.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सोइ रावन कहुँ बनि सहाई। अस्तुति करहिं सुनाइ सुनाई।।

    अर्थ (Hindi)

    सोइ रावन कहुँ बनि सहाई। अस्तुति करहिं सुनाइ सुनाई।।

  428. RCM 5.38.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अवसर जानि बिभीषनु आवा। भ्राता चरन सीसु तेहिं नावा।।

    अर्थ (Hindi)

    अवसर जानि बिभीषनु आवा। भ्राता चरन सीसु तेहिं नावा।।

  429. RCM 5.38.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पुनि सिरु नाइ बैठ निज आसन। बोला बचन पाइ अनुसासन।।

    अर्थ (Hindi)

    पुनि सिरु नाइ बैठ निज आसन। बोला बचन पाइ अनुसासन।।

  430. RCM 5.38.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जौ कृपाल पूँछिहु मोहि बाता। मति अनुरुप कहउँ हित ताता।।

    अर्थ (Hindi)

    जौ कृपाल पूँछिहु मोहि बाता। मति अनुरुप कहउँ हित ताता।।

  431. RCM 5.38.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जो आपन चाहै कल्याना। सुजसु सुमति सुभ गति सुख नाना।।

    अर्थ (Hindi)

    जो आपन चाहै कल्याना। सुजसु सुमति सुभ गति सुख नाना।।

  432. RCM 5.38.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सो परनारि लिलार गोसाईं। तजउ चउथि के चंद कि नाई।।

    अर्थ (Hindi)

    सो परनारि लिलार गोसाईं। तजउ चउथि के चंद कि नाई।।

  433. RCM 5.38.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चौदह भुवन एक पति होई। भूतद्रोह तिष्टइ नहिं सोई।।

    अर्थ (Hindi)

    चौदह भुवन एक पति होई। भूतद्रोह तिष्टइ नहिं सोई।।

  434. RCM 5.38.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गुन सागर नागर नर जोऊ। अलप लोभ भल कहइ न कोऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    गुन सागर नागर नर जोऊ। अलप लोभ भल कहइ न कोऊ।।

  435. RCM 5.38.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ।

    अर्थ (Hindi)

    काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ।

  436. RCM 5.38.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सब परिहरि रघुबीरहि भजहु भजहिं जेहि संत।।38।।

    अर्थ (Hindi)

    सब परिहरि रघुबीरहि भजहु भजहिं जेहि संत।।38।।

  437. RCM 5.39.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तात राम नहिं नर भूपाला। भुवनेस्वर कालहु कर काला।।

    अर्थ (Hindi)

    तात राम नहिं नर भूपाला। भुवनेस्वर कालहु कर काला।।

  438. RCM 5.39.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    ब्रह्म अनामय अज भगवंता। ब्यापक अजित अनादि अनंता।।

    अर्थ (Hindi)

    ब्रह्म अनामय अज भगवंता। ब्यापक अजित अनादि अनंता।।

  439. RCM 5.39.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गो द्विज धेनु देव हितकारी। कृपासिंधु मानुष तनुधारी।।

    अर्थ (Hindi)

    गो द्विज धेनु देव हितकारी। कृपासिंधु मानुष तनुधारी।।

  440. RCM 5.39.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जन रंजन भंजन खल ब्राता। बेद धर्म रच्छक सुनु भ्राता।।

    अर्थ (Hindi)

    जन रंजन भंजन खल ब्राता। बेद धर्म रच्छक सुनु भ्राता।।

  441. RCM 5.39.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    ताहि बयरु तजि नाइअ माथा। प्रनतारति भंजन रघुनाथा।।

    अर्थ (Hindi)

    ताहि बयरु तजि नाइअ माथा। प्रनतारति भंजन रघुनाथा।।

  442. RCM 5.39.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देहु नाथ प्रभु कहुँ बैदेही। भजहु राम बिनु हेतु सनेही।।

    अर्थ (Hindi)

    देहु नाथ प्रभु कहुँ बैदेही। भजहु राम बिनु हेतु सनेही।।

  443. RCM 5.39.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सरन गएँ प्रभु ताहु न त्यागा। बिस्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा।।

    अर्थ (Hindi)

    सरन गएँ प्रभु ताहु न त्यागा। बिस्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा।।

  444. RCM 5.39.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जासु नाम त्रय ताप नसावन। सोइ प्रभु प्रगट समुझु जियँ रावन।।

    अर्थ (Hindi)

    जासु नाम त्रय ताप नसावन। सोइ प्रभु प्रगट समुझु जियँ रावन।।

  445. RCM 5.39.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बार बार पद लागउँ बिनय करउँ दससीस।

    अर्थ (Hindi)

    बार बार पद लागउँ बिनय करउँ दससीस।

  446. RCM 5.39.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    परिहरि मान मोह मद भजहु कोसलाधीस।।39(क)।।

    अर्थ (Hindi)

    परिहरि मान मोह मद भजहु कोसलाधीस।।39(क)।।

  447. RCM 5.39.11
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मुनि पुलस्ति निज सिष्य सन कहि पठई यह बात।

    अर्थ (Hindi)

    मुनि पुलस्ति निज सिष्य सन कहि पठई यह बात।

  448. RCM 5.39.12
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तुरत सो मैं प्रभु सन कही पाइ सुअवसरु तात।।39(ख)।।

    अर्थ (Hindi)

    तुरत सो मैं प्रभु सन कही पाइ सुअवसरु तात।।39(ख)।।

  449. RCM 5.40.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    माल्यवंत अति सचिव सयाना। तासु बचन सुनि अति सुख माना।।

    अर्थ (Hindi)

    माल्यवंत अति सचिव सयाना। तासु बचन सुनि अति सुख माना।।

  450. RCM 5.40.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तात अनुज तव नीति बिभूषन। सो उर धरहु जो कहत बिभीषन।।

    अर्थ (Hindi)

    तात अनुज तव नीति बिभूषन। सो उर धरहु जो कहत बिभीषन।।

  451. RCM 5.40.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रिपु उतकरष कहत सठ दोऊ। दूरि न करहु इहाँ हइ कोऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    रिपु उतकरष कहत सठ दोऊ। दूरि न करहु इहाँ हइ कोऊ।।

  452. RCM 5.40.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    माल्यवंत गृह गयउ बहोरी। कहइ बिभीषनु पुनि कर जोरी।।

    अर्थ (Hindi)

    माल्यवंत गृह गयउ बहोरी। कहइ बिभीषनु पुनि कर जोरी।।

  453. RCM 5.40.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुमति कुमति सब कें उर रहहीं। नाथ पुरान निगम अस कहहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    सुमति कुमति सब कें उर रहहीं। नाथ पुरान निगम अस कहहीं।।

  454. RCM 5.40.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जहाँ सुमति तहँ संपति नाना। जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना।।

    अर्थ (Hindi)

    जहाँ सुमति तहँ संपति नाना। जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना।।

  455. RCM 5.40.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तव उर कुमति बसी बिपरीता। हित अनहित मानहु रिपु प्रीता।।

    अर्थ (Hindi)

    तव उर कुमति बसी बिपरीता। हित अनहित मानहु रिपु प्रीता।।

  456. RCM 5.40.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कालराति निसिचर कुल केरी। तेहि सीता पर प्रीति घनेरी।।

    अर्थ (Hindi)

    कालराति निसिचर कुल केरी। तेहि सीता पर प्रीति घनेरी।।

  457. RCM 5.40.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तात चरन गहि मागउँ राखहु मोर दुलार।

    अर्थ (Hindi)

    तात चरन गहि मागउँ राखहु मोर दुलार।

  458. RCM 5.40.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सीत देहु राम कहुँ अहित न होइ तुम्हार।।40।।

    अर्थ (Hindi)

    सीत देहु राम कहुँ अहित न होइ तुम्हार।।40।।

  459. RCM 5.41.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बुध पुरान श्रुति संमत बानी। कही बिभीषन नीति बखानी।।

    अर्थ (Hindi)

    बुध पुरान श्रुति संमत बानी। कही बिभीषन नीति बखानी।।

  460. RCM 5.41.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनत दसानन उठा रिसाई। खल तोहि निकट मुत्यु अब आई।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनत दसानन उठा रिसाई। खल तोहि निकट मुत्यु अब आई।।

  461. RCM 5.41.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जिअसि सदा सठ मोर जिआवा। रिपु कर पच्छ मूढ़ तोहि भावा।।

    अर्थ (Hindi)

    जिअसि सदा सठ मोर जिआवा। रिपु कर पच्छ मूढ़ तोहि भावा।।

  462. RCM 5.41.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहसि न खल अस को जग माहीं। भुज बल जाहि जिता मैं नाही।।

    अर्थ (Hindi)

    कहसि न खल अस को जग माहीं। भुज बल जाहि जिता मैं नाही।।

  463. RCM 5.41.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मम पुर बसि तपसिन्ह पर प्रीती। सठ मिलु जाइ तिन्हहि कहु नीती।।

    अर्थ (Hindi)

    मम पुर बसि तपसिन्ह पर प्रीती। सठ मिलु जाइ तिन्हहि कहु नीती।।

  464. RCM 5.41.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अस कहि कीन्हेसि चरन प्रहारा। अनुज गहे पद बारहिं बारा।।

    अर्थ (Hindi)

    अस कहि कीन्हेसि चरन प्रहारा। अनुज गहे पद बारहिं बारा।।

  465. RCM 5.41.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    उमा संत कइ इहइ बड़ाई। मंद करत जो करइ भलाई।।

    अर्थ (Hindi)

    उमा संत कइ इहइ बड़ाई। मंद करत जो करइ भलाई।।

  466. RCM 5.41.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तुम्ह पितु सरिस भलेहिं मोहि मारा। रामु भजें हित नाथ तुम्हारा।।

    अर्थ (Hindi)

    तुम्ह पितु सरिस भलेहिं मोहि मारा। रामु भजें हित नाथ तुम्हारा।।

  467. RCM 5.41.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सचिव संग लै नभ पथ गयऊ। सबहि सुनाइ कहत अस भयऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    सचिव संग लै नभ पथ गयऊ। सबहि सुनाइ कहत अस भयऊ।।

  468. RCM 5.41.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रामु सत्यसंकल्प प्रभु सभा कालबस तोरि।

    अर्थ (Hindi)

    रामु सत्यसंकल्प प्रभु सभा कालबस तोरि।

  469. RCM 5.41.11
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मै रघुबीर सरन अब जाउँ देहु जनि खोरि।।41।।

    अर्थ (Hindi)

    मै रघुबीर सरन अब जाउँ देहु जनि खोरि।।41।।

  470. RCM 5.42.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अस कहि चला बिभीषनु जबहीं। आयूहीन भए सब तबहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    अस कहि चला बिभीषनु जबहीं। आयूहीन भए सब तबहीं।।

  471. RCM 5.42.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    साधु अवग्या तुरत भवानी। कर कल्यान अखिल कै हानी।।

    अर्थ (Hindi)

    साधु अवग्या तुरत भवानी। कर कल्यान अखिल कै हानी।।

  472. RCM 5.42.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रावन जबहिं बिभीषन त्यागा। भयउ बिभव बिनु तबहिं अभागा।।

    अर्थ (Hindi)

    रावन जबहिं बिभीषन त्यागा। भयउ बिभव बिनु तबहिं अभागा।।

  473. RCM 5.42.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चलेउ हरषि रघुनायक पाहीं। करत मनोरथ बहु मन माहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    चलेउ हरषि रघुनायक पाहीं। करत मनोरथ बहु मन माहीं।।

  474. RCM 5.42.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देखिहउँ जाइ चरन जलजाता। अरुन मृदुल सेवक सुखदाता।।

    अर्थ (Hindi)

    देखिहउँ जाइ चरन जलजाता। अरुन मृदुल सेवक सुखदाता।।

  475. RCM 5.42.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जे पद परसि तरी रिषिनारी। दंडक कानन पावनकारी।।

    अर्थ (Hindi)

    जे पद परसि तरी रिषिनारी। दंडक कानन पावनकारी।।

  476. RCM 5.42.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जे पद जनकसुताँ उर लाए। कपट कुरंग संग धर धाए।।

    अर्थ (Hindi)

    जे पद जनकसुताँ उर लाए। कपट कुरंग संग धर धाए।।

  477. RCM 5.42.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    हर उर सर सरोज पद जेई। अहोभाग्य मै देखिहउँ तेई।।

    अर्थ (Hindi)

    हर उर सर सरोज पद जेई। अहोभाग्य मै देखिहउँ तेई।।

  478. RCM 5.42.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जिन्ह पायन्ह के पादुकन्हि भरतु रहे मन लाइ।

    अर्थ (Hindi)

    जिन्ह पायन्ह के पादुकन्हि भरतु रहे मन लाइ।

  479. RCM 5.42.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    ते पद आजु बिलोकिहउँ इन्ह नयनन्हि अब जाइ।।42।।

    अर्थ (Hindi)

    ते पद आजु बिलोकिहउँ इन्ह नयनन्हि अब जाइ।।42।।

  480. RCM 5.43.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एहि बिधि करत सप्रेम बिचारा। आयउ सपदि सिंधु एहिं पारा।।

    अर्थ (Hindi)

    एहि बिधि करत सप्रेम बिचारा। आयउ सपदि सिंधु एहिं पारा।।

  481. RCM 5.43.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कपिन्ह बिभीषनु आवत देखा। जाना कोउ रिपु दूत बिसेषा।।

    अर्थ (Hindi)

    कपिन्ह बिभीषनु आवत देखा। जाना कोउ रिपु दूत बिसेषा।।

  482. RCM 5.43.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    ताहि राखि कपीस पहिं आए। समाचार सब ताहि सुनाए।।

    अर्थ (Hindi)

    ताहि राखि कपीस पहिं आए। समाचार सब ताहि सुनाए।।

  483. RCM 5.43.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कह सुग्रीव सुनहु रघुराई। आवा मिलन दसानन भाई।।

    अर्थ (Hindi)

    कह सुग्रीव सुनहु रघुराई। आवा मिलन दसानन भाई।।

  484. RCM 5.43.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कह प्रभु सखा बूझिऐ काहा। कहइ कपीस सुनहु नरनाहा।।

    अर्थ (Hindi)

    कह प्रभु सखा बूझिऐ काहा। कहइ कपीस सुनहु नरनाहा।।

  485. RCM 5.43.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जानि न जाइ निसाचर माया। कामरूप केहि कारन आया।।

    अर्थ (Hindi)

    जानि न जाइ निसाचर माया। कामरूप केहि कारन आया।।

  486. RCM 5.43.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भेद हमार लेन सठ आवा। राखिअ बाँधि मोहि अस भावा।।

    अर्थ (Hindi)

    भेद हमार लेन सठ आवा। राखिअ बाँधि मोहि अस भावा।।

  487. RCM 5.43.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सखा नीति तुम्ह नीकि बिचारी। मम पन सरनागत भयहारी।।

    अर्थ (Hindi)

    सखा नीति तुम्ह नीकि बिचारी। मम पन सरनागत भयहारी।।

  488. RCM 5.43.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि प्रभु बचन हरष हनुमाना। सरनागत बच्छल भगवाना।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि प्रभु बचन हरष हनुमाना। सरनागत बच्छल भगवाना।।

  489. RCM 5.43.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि।

    अर्थ (Hindi)

    सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि।

  490. RCM 5.43.11
    📖 Open verse-by-verse reader#

    ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि।।43।।

    अर्थ (Hindi)

    ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि।।43।।

  491. RCM 5.44.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू। आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू।।

    अर्थ (Hindi)

    कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू। आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू।।

  492. RCM 5.44.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं।।

  493. RCM 5.44.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पापवंत कर सहज सुभाऊ। भजनु मोर तेहि भाव न काऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    पापवंत कर सहज सुभाऊ। भजनु मोर तेहि भाव न काऊ।।

  494. RCM 5.44.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जौं पै दुष्टहदय सोइ होई। मोरें सनमुख आव कि सोई।।

    अर्थ (Hindi)

    जौं पै दुष्टहदय सोइ होई। मोरें सनमुख आव कि सोई।।

  495. RCM 5.44.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा।।

    अर्थ (Hindi)

    निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा।।

  496. RCM 5.44.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भेद लेन पठवा दससीसा। तबहुँ न कछु भय हानि कपीसा।।

    अर्थ (Hindi)

    भेद लेन पठवा दससीसा। तबहुँ न कछु भय हानि कपीसा।।

  497. RCM 5.44.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जग महुँ सखा निसाचर जेते। लछिमनु हनइ निमिष महुँ तेते।।

    अर्थ (Hindi)

    जग महुँ सखा निसाचर जेते। लछिमनु हनइ निमिष महुँ तेते।।

  498. RCM 5.44.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जौं सभीत आवा सरनाई। रखिहउँ ताहि प्रान की नाई।।

    अर्थ (Hindi)

    जौं सभीत आवा सरनाई। रखिहउँ ताहि प्रान की नाई।।

  499. RCM 5.44.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    उभय भाँति तेहि आनहु हँसि कह कृपानिकेत।

    अर्थ (Hindi)

    उभय भाँति तेहि आनहु हँसि कह कृपानिकेत।

  500. RCM 5.44.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जय कृपाल कहि चले अंगद हनू समेत।।44।।

    अर्थ (Hindi)

    जय कृपाल कहि चले अंगद हनू समेत।।44।।

  501. RCM 5.45.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सादर तेहि आगें करि बानर। चले जहाँ रघुपति करुनाकर।।

    अर्थ (Hindi)

    सादर तेहि आगें करि बानर। चले जहाँ रघुपति करुनाकर।।

  502. RCM 5.45.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    दूरिहि ते देखे द्वौ भ्राता। नयनानंद दान के दाता।।

    अर्थ (Hindi)

    दूरिहि ते देखे द्वौ भ्राता। नयनानंद दान के दाता।।

  503. RCM 5.45.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बहुरि राम छबिधाम बिलोकी। रहेउ ठटुकि एकटक पल रोकी।।

    अर्थ (Hindi)

    बहुरि राम छबिधाम बिलोकी। रहेउ ठटुकि एकटक पल रोकी।।

  504. RCM 5.45.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भुज प्रलंब कंजारुन लोचन। स्यामल गात प्रनत भय मोचन।।

    अर्थ (Hindi)

    भुज प्रलंब कंजारुन लोचन। स्यामल गात प्रनत भय मोचन।।

  505. RCM 5.45.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सिंघ कंध आयत उर सोहा। आनन अमित मदन मन मोहा।।

    अर्थ (Hindi)

    सिंघ कंध आयत उर सोहा। आनन अमित मदन मन मोहा।।

  506. RCM 5.45.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नयन नीर पुलकित अति गाता। मन धरि धीर कही मृदु बाता।।

    अर्थ (Hindi)

    नयन नीर पुलकित अति गाता। मन धरि धीर कही मृदु बाता।।

  507. RCM 5.45.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नाथ दसानन कर मैं भ्राता। निसिचर बंस जनम सुरत्राता।।

    अर्थ (Hindi)

    नाथ दसानन कर मैं भ्राता। निसिचर बंस जनम सुरत्राता।।

  508. RCM 5.45.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सहज पापप्रिय तामस देहा। जथा उलूकहि तम पर नेहा।।

    अर्थ (Hindi)

    सहज पापप्रिय तामस देहा। जथा उलूकहि तम पर नेहा।।

  509. RCM 5.45.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    श्रवन सुजसु सुनि आयउँ प्रभु भंजन भव भीर।

    अर्थ (Hindi)

    श्रवन सुजसु सुनि आयउँ प्रभु भंजन भव भीर।

  510. RCM 5.45.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर।।45।।

    अर्थ (Hindi)

    त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर।।45।।

  511. RCM 5.46.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अस कहि करत दंडवत देखा। तुरत उठे प्रभु हरष बिसेषा।।

    अर्थ (Hindi)

    अस कहि करत दंडवत देखा। तुरत उठे प्रभु हरष बिसेषा।।

  512. RCM 5.46.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    दीन बचन सुनि प्रभु मन भावा। भुज बिसाल गहि हृदयँ लगावा।।

    अर्थ (Hindi)

    दीन बचन सुनि प्रभु मन भावा। भुज बिसाल गहि हृदयँ लगावा।।

  513. RCM 5.46.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अनुज सहित मिलि ढिग बैठारी। बोले बचन भगत भयहारी।।

    अर्थ (Hindi)

    अनुज सहित मिलि ढिग बैठारी। बोले बचन भगत भयहारी।।

  514. RCM 5.46.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहु लंकेस सहित परिवारा। कुसल कुठाहर बास तुम्हारा।।

    अर्थ (Hindi)

    कहु लंकेस सहित परिवारा। कुसल कुठाहर बास तुम्हारा।।

  515. RCM 5.46.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    खल मंडलीं बसहु दिनु राती। सखा धरम निबहइ केहि भाँती।।

    अर्थ (Hindi)

    खल मंडलीं बसहु दिनु राती। सखा धरम निबहइ केहि भाँती।।

  516. RCM 5.46.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मैं जानउँ तुम्हारि सब रीती। अति नय निपुन न भाव अनीती।।

    अर्थ (Hindi)

    मैं जानउँ तुम्हारि सब रीती। अति नय निपुन न भाव अनीती।।

  517. RCM 5.46.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बरु भल बास नरक कर ताता। दुष्ट संग जनि देइ बिधाता।।

    अर्थ (Hindi)

    बरु भल बास नरक कर ताता। दुष्ट संग जनि देइ बिधाता।।

  518. RCM 5.46.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अब पद देखि कुसल रघुराया। जौं तुम्ह कीन्ह जानि जन दाया।।

    अर्थ (Hindi)

    अब पद देखि कुसल रघुराया। जौं तुम्ह कीन्ह जानि जन दाया।।

  519. RCM 5.46.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तब लगि कुसल न जीव कहुँ सपनेहुँ मन बिश्राम।

    अर्थ (Hindi)

    तब लगि कुसल न जीव कहुँ सपनेहुँ मन बिश्राम।

  520. RCM 5.46.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जब लगि भजत न राम कहुँ सोक धाम तजि काम।।46।।

    अर्थ (Hindi)

    जब लगि भजत न राम कहुँ सोक धाम तजि काम।।46।।

  521. RCM 5.47.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तब लगि हृदयँ बसत खल नाना। लोभ मोह मच्छर मद माना।।

    अर्थ (Hindi)

    तब लगि हृदयँ बसत खल नाना। लोभ मोह मच्छर मद माना।।

  522. RCM 5.47.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जब लगि उर न बसत रघुनाथा। धरें चाप सायक कटि भाथा।।

    अर्थ (Hindi)

    जब लगि उर न बसत रघुनाथा। धरें चाप सायक कटि भाथा।।

  523. RCM 5.47.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    ममता तरुन तमी अँधिआरी। राग द्वेष उलूक सुखकारी।।

    अर्थ (Hindi)

    ममता तरुन तमी अँधिआरी। राग द्वेष उलूक सुखकारी।।

  524. RCM 5.47.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तब लगि बसति जीव मन माहीं। जब लगि प्रभु प्रताप रबि नाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    तब लगि बसति जीव मन माहीं। जब लगि प्रभु प्रताप रबि नाहीं।।

  525. RCM 5.47.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अब मैं कुसल मिटे भय भारे। देखि राम पद कमल तुम्हारे।।

    अर्थ (Hindi)

    अब मैं कुसल मिटे भय भारे। देखि राम पद कमल तुम्हारे।।

  526. RCM 5.47.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तुम्ह कृपाल जा पर अनुकूला। ताहि न ब्याप त्रिबिध भव सूला।।

    अर्थ (Hindi)

    तुम्ह कृपाल जा पर अनुकूला। ताहि न ब्याप त्रिबिध भव सूला।।

  527. RCM 5.47.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मैं निसिचर अति अधम सुभाऊ। सुभ आचरनु कीन्ह नहिं काऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    मैं निसिचर अति अधम सुभाऊ। सुभ आचरनु कीन्ह नहिं काऊ।।

  528. RCM 5.47.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जासु रूप मुनि ध्यान न आवा। तेहिं प्रभु हरषि हृदयँ मोहि लावा।।

    अर्थ (Hindi)

    जासु रूप मुनि ध्यान न आवा। तेहिं प्रभु हरषि हृदयँ मोहि लावा।।

  529. RCM 5.47.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    -अहोभाग्य मम अमित अति राम कृपा सुख पुंज।

    अर्थ (Hindi)

    -अहोभाग्य मम अमित अति राम कृपा सुख पुंज।

  530. RCM 5.47.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देखेउँ नयन बिरंचि सिब सेब्य जुगल पद कंज।।47।।

    अर्थ (Hindi)

    देखेउँ नयन बिरंचि सिब सेब्य जुगल पद कंज।।47।।

  531. RCM 5.48.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनहु सखा निज कहउँ सुभाऊ। जान भुसुंडि संभु गिरिजाऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनहु सखा निज कहउँ सुभाऊ। जान भुसुंडि संभु गिरिजाऊ।।

  532. RCM 5.48.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जौं नर होइ चराचर द्रोही। आवे सभय सरन तकि मोही।।

    अर्थ (Hindi)

    जौं नर होइ चराचर द्रोही। आवे सभय सरन तकि मोही।।

  533. RCM 5.48.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तजि मद मोह कपट छल नाना। करउँ सद्य तेहि साधु समाना।।

    अर्थ (Hindi)

    तजि मद मोह कपट छल नाना। करउँ सद्य तेहि साधु समाना।।

  534. RCM 5.48.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जननी जनक बंधु सुत दारा। तनु धनु भवन सुह्रद परिवारा।।

    अर्थ (Hindi)

    जननी जनक बंधु सुत दारा। तनु धनु भवन सुह्रद परिवारा।।

  535. RCM 5.48.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सब कै ममता ताग बटोरी। मम पद मनहि बाँध बरि डोरी।।

    अर्थ (Hindi)

    सब कै ममता ताग बटोरी। मम पद मनहि बाँध बरि डोरी।।

  536. RCM 5.48.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    समदरसी इच्छा कछु नाहीं। हरष सोक भय नहिं मन माहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    समदरसी इच्छा कछु नाहीं। हरष सोक भय नहिं मन माहीं।।

  537. RCM 5.48.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अस सज्जन मम उर बस कैसें। लोभी हृदयँ बसइ धनु जैसें।।

    अर्थ (Hindi)

    अस सज्जन मम उर बस कैसें। लोभी हृदयँ बसइ धनु जैसें।।

  538. RCM 5.48.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें। धरउँ देह नहिं आन निहोरें।।

    अर्थ (Hindi)

    तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें। धरउँ देह नहिं आन निहोरें।।

  539. RCM 5.48.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम।

    अर्थ (Hindi)

    सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम।

  540. RCM 5.48.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    ते नर प्रान समान मम जिन्ह कें द्विज पद प्रेम।।48।।

    अर्थ (Hindi)

    ते नर प्रान समान मम जिन्ह कें द्विज पद प्रेम।।48।।

  541. RCM 5.49.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनु लंकेस सकल गुन तोरें। तातें तुम्ह अतिसय प्रिय मोरें।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनु लंकेस सकल गुन तोरें। तातें तुम्ह अतिसय प्रिय मोरें।।

  542. RCM 5.49.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम बचन सुनि बानर जूथा। सकल कहहिं जय कृपा बरूथा।।

    अर्थ (Hindi)

    राम बचन सुनि बानर जूथा। सकल कहहिं जय कृपा बरूथा।।

  543. RCM 5.49.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनत बिभीषनु प्रभु कै बानी। नहिं अघात श्रवनामृत जानी।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनत बिभीषनु प्रभु कै बानी। नहिं अघात श्रवनामृत जानी।।

  544. RCM 5.49.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पद अंबुज गहि बारहिं बारा। हृदयँ समात न प्रेमु अपारा।।

    अर्थ (Hindi)

    पद अंबुज गहि बारहिं बारा। हृदयँ समात न प्रेमु अपारा।।

  545. RCM 5.49.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनहु देव सचराचर स्वामी। प्रनतपाल उर अंतरजामी।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनहु देव सचराचर स्वामी। प्रनतपाल उर अंतरजामी।।

  546. RCM 5.49.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    उर कछु प्रथम बासना रही। प्रभु पद प्रीति सरित सो बही।।

    अर्थ (Hindi)

    उर कछु प्रथम बासना रही। प्रभु पद प्रीति सरित सो बही।।

  547. RCM 5.49.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अब कृपाल निज भगति पावनी। देहु सदा सिव मन भावनी।।

    अर्थ (Hindi)

    अब कृपाल निज भगति पावनी। देहु सदा सिव मन भावनी।।

  548. RCM 5.49.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एवमस्तु कहि प्रभु रनधीरा। मागा तुरत सिंधु कर नीरा।।

    अर्थ (Hindi)

    एवमस्तु कहि प्रभु रनधीरा। मागा तुरत सिंधु कर नीरा।।

  549. RCM 5.49.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जदपि सखा तव इच्छा नाहीं। मोर दरसु अमोघ जग माहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    जदपि सखा तव इच्छा नाहीं। मोर दरसु अमोघ जग माहीं।।

  550. RCM 5.49.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अस कहि राम तिलक तेहि सारा। सुमन बृष्टि नभ भई अपारा।।

    अर्थ (Hindi)

    अस कहि राम तिलक तेहि सारा। सुमन बृष्टि नभ भई अपारा।।

  551. RCM 5.49.11
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रावन क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचंड।

    अर्थ (Hindi)

    रावन क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचंड।

  552. RCM 5.49.12
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जरत बिभीषनु राखेउ दीन्हेहु राजु अखंड।।49(क)।।

    अर्थ (Hindi)

    जरत बिभीषनु राखेउ दीन्हेहु राजु अखंड।।49(क)।।

  553. RCM 5.49.13
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जो संपति सिव रावनहि दीन्हि दिएँ दस माथ।

    अर्थ (Hindi)

    जो संपति सिव रावनहि दीन्हि दिएँ दस माथ।

  554. RCM 5.49.14
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सोइ संपदा बिभीषनहि सकुचि दीन्ह रघुनाथ।।49(ख)।।

    अर्थ (Hindi)

    सोइ संपदा बिभीषनहि सकुचि दीन्ह रघुनाथ।।49(ख)।।

  555. RCM 5.50.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अस प्रभु छाड़ि भजहिं जे आना। ते नर पसु बिनु पूँछ बिषाना।।

    अर्थ (Hindi)

    अस प्रभु छाड़ि भजहिं जे आना। ते नर पसु बिनु पूँछ बिषाना।।

  556. RCM 5.50.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    निज जन जानि ताहि अपनावा। प्रभु सुभाव कपि कुल मन भावा।।

    अर्थ (Hindi)

    निज जन जानि ताहि अपनावा। प्रभु सुभाव कपि कुल मन भावा।।

  557. RCM 5.50.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पुनि सर्बग्य सर्ब उर बासी। सर्बरूप सब रहित उदासी।।

    अर्थ (Hindi)

    पुनि सर्बग्य सर्ब उर बासी। सर्बरूप सब रहित उदासी।।

  558. RCM 5.50.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बोले बचन नीति प्रतिपालक। कारन मनुज दनुज कुल घालक।।

    अर्थ (Hindi)

    बोले बचन नीति प्रतिपालक। कारन मनुज दनुज कुल घालक।।

  559. RCM 5.50.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनु कपीस लंकापति बीरा। केहि बिधि तरिअ जलधि गंभीरा।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनु कपीस लंकापति बीरा। केहि बिधि तरिअ जलधि गंभीरा।।

  560. RCM 5.50.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    संकुल मकर उरग झष जाती। अति अगाध दुस्तर सब भाँती।।

    अर्थ (Hindi)

    संकुल मकर उरग झष जाती। अति अगाध दुस्तर सब भाँती।।

  561. RCM 5.50.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कह लंकेस सुनहु रघुनायक। कोटि सिंधु सोषक तव सायक।।

    अर्थ (Hindi)

    कह लंकेस सुनहु रघुनायक। कोटि सिंधु सोषक तव सायक।।

  562. RCM 5.50.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जद्यपि तदपि नीति असि गाई। बिनय करिअ सागर सन जाई।।

    अर्थ (Hindi)

    जद्यपि तदपि नीति असि गाई। बिनय करिअ सागर सन जाई।।

  563. RCM 5.50.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रभु तुम्हार कुलगुर जलधि कहिहि उपाय बिचारि।

    अर्थ (Hindi)

    प्रभु तुम्हार कुलगुर जलधि कहिहि उपाय बिचारि।

  564. RCM 5.50.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिनु प्रयास सागर तरिहि सकल भालु कपि धारि।।50।।

    अर्थ (Hindi)

    बिनु प्रयास सागर तरिहि सकल भालु कपि धारि।।50।।

  565. RCM 5.51.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सखा कही तुम्ह नीकि उपाई। करिअ दैव जौं होइ सहाई।।

    अर्थ (Hindi)

    सखा कही तुम्ह नीकि उपाई। करिअ दैव जौं होइ सहाई।।

  566. RCM 5.51.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मंत्र न यह लछिमन मन भावा। राम बचन सुनि अति दुख पावा।।

    अर्थ (Hindi)

    मंत्र न यह लछिमन मन भावा। राम बचन सुनि अति दुख पावा।।

  567. RCM 5.51.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नाथ दैव कर कवन भरोसा। सोषिअ सिंधु करिअ मन रोसा।।

    अर्थ (Hindi)

    नाथ दैव कर कवन भरोसा। सोषिअ सिंधु करिअ मन रोसा।।

  568. RCM 5.51.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कादर मन कहुँ एक अधारा। दैव दैव आलसी पुकारा।।

    अर्थ (Hindi)

    कादर मन कहुँ एक अधारा। दैव दैव आलसी पुकारा।।

  569. RCM 5.51.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनत बिहसि बोले रघुबीरा। ऐसेहिं करब धरहु मन धीरा।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनत बिहसि बोले रघुबीरा। ऐसेहिं करब धरहु मन धीरा।।

  570. RCM 5.51.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अस कहि प्रभु अनुजहि समुझाई। सिंधु समीप गए रघुराई।।

    अर्थ (Hindi)

    अस कहि प्रभु अनुजहि समुझाई। सिंधु समीप गए रघुराई।।

  571. RCM 5.51.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रथम प्रनाम कीन्ह सिरु नाई। बैठे पुनि तट दर्भ डसाई।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रथम प्रनाम कीन्ह सिरु नाई। बैठे पुनि तट दर्भ डसाई।।

  572. RCM 5.51.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जबहिं बिभीषन प्रभु पहिं आए। पाछें रावन दूत पठाए।।

    अर्थ (Hindi)

    जबहिं बिभीषन प्रभु पहिं आए। पाछें रावन दूत पठाए।।

  573. RCM 5.51.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सकल चरित तिन्ह देखे धरें कपट कपि देह।

    अर्थ (Hindi)

    सकल चरित तिन्ह देखे धरें कपट कपि देह।

  574. RCM 5.51.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रभु गुन हृदयँ सराहहिं सरनागत पर नेह।।51।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रभु गुन हृदयँ सराहहिं सरनागत पर नेह।।51।।

  575. RCM 5.52.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रगट बखानहिं राम सुभाऊ। अति सप्रेम गा बिसरि दुराऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रगट बखानहिं राम सुभाऊ। अति सप्रेम गा बिसरि दुराऊ।।

  576. RCM 5.52.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रिपु के दूत कपिन्ह तब जाने। सकल बाँधि कपीस पहिं आने।।

    अर्थ (Hindi)

    रिपु के दूत कपिन्ह तब जाने। सकल बाँधि कपीस पहिं आने।।

  577. RCM 5.52.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कह सुग्रीव सुनहु सब बानर। अंग भंग करि पठवहु निसिचर।।

    अर्थ (Hindi)

    कह सुग्रीव सुनहु सब बानर। अंग भंग करि पठवहु निसिचर।।

  578. RCM 5.52.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि सुग्रीव बचन कपि धाए। बाँधि कटक चहु पास फिराए।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि सुग्रीव बचन कपि धाए। बाँधि कटक चहु पास फिराए।।

  579. RCM 5.52.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बहु प्रकार मारन कपि लागे। दीन पुकारत तदपि न त्यागे।।

    अर्थ (Hindi)

    बहु प्रकार मारन कपि लागे। दीन पुकारत तदपि न त्यागे।।

  580. RCM 5.52.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जो हमार हर नासा काना। तेहि कोसलाधीस कै आना।।

    अर्थ (Hindi)

    जो हमार हर नासा काना। तेहि कोसलाधीस कै आना।।

  581. RCM 5.52.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि लछिमन सब निकट बोलाए। दया लागि हँसि तुरत छोडाए।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि लछिमन सब निकट बोलाए। दया लागि हँसि तुरत छोडाए।।

  582. RCM 5.52.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रावन कर दीजहु यह पाती। लछिमन बचन बाचु कुलघाती।।

    अर्थ (Hindi)

    रावन कर दीजहु यह पाती। लछिमन बचन बाचु कुलघाती।।

  583. RCM 5.52.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहेहु मुखागर मूढ़ सन मम संदेसु उदार।

    अर्थ (Hindi)

    कहेहु मुखागर मूढ़ सन मम संदेसु उदार।

  584. RCM 5.52.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सीता देइ मिलेहु न त आवा काल तुम्हार।।52।।

    अर्थ (Hindi)

    सीता देइ मिलेहु न त आवा काल तुम्हार।।52।।

  585. RCM 5.53.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तुरत नाइ लछिमन पद माथा। चले दूत बरनत गुन गाथा।।

    अर्थ (Hindi)

    तुरत नाइ लछिमन पद माथा। चले दूत बरनत गुन गाथा।।

  586. RCM 5.53.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहत राम जसु लंकाँ आए। रावन चरन सीस तिन्ह नाए।।

    अर्थ (Hindi)

    कहत राम जसु लंकाँ आए। रावन चरन सीस तिन्ह नाए।।

  587. RCM 5.53.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिहसि दसानन पूँछी बाता। कहसि न सुक आपनि कुसलाता।।

    अर्थ (Hindi)

    बिहसि दसानन पूँछी बाता। कहसि न सुक आपनि कुसलाता।।

  588. RCM 5.53.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पुनि कहु खबरि बिभीषन केरी। जाहि मृत्यु आई अति नेरी।।

    अर्थ (Hindi)

    पुनि कहु खबरि बिभीषन केरी। जाहि मृत्यु आई अति नेरी।।

  589. RCM 5.53.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करत राज लंका सठ त्यागी। होइहि जब कर कीट अभागी।।

    अर्थ (Hindi)

    करत राज लंका सठ त्यागी। होइहि जब कर कीट अभागी।।

  590. RCM 5.53.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पुनि कहु भालु कीस कटकाई। कठिन काल प्रेरित चलि आई।।

    अर्थ (Hindi)

    पुनि कहु भालु कीस कटकाई। कठिन काल प्रेरित चलि आई।।

  591. RCM 5.53.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जिन्ह के जीवन कर रखवारा। भयउ मृदुल चित सिंधु बिचारा।।

    अर्थ (Hindi)

    जिन्ह के जीवन कर रखवारा। भयउ मृदुल चित सिंधु बिचारा।।

  592. RCM 5.53.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहु तपसिन्ह कै बात बहोरी। जिन्ह के हृदयँ त्रास अति मोरी।।

    अर्थ (Hindi)

    कहु तपसिन्ह कै बात बहोरी। जिन्ह के हृदयँ त्रास अति मोरी।।

  593. RCM 5.53.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    -की भइ भेंट कि फिरि गए श्रवन सुजसु सुनि मोर।

    अर्थ (Hindi)

    -की भइ भेंट कि फिरि गए श्रवन सुजसु सुनि मोर।

  594. RCM 5.53.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहसि न रिपु दल तेज बल बहुत चकित चित तोर।।53।।

    अर्थ (Hindi)

    कहसि न रिपु दल तेज बल बहुत चकित चित तोर।।53।।

  595. RCM 5.54.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नाथ कृपा करि पूँछेहु जैसें। मानहु कहा क्रोध तजि तैसें।।

    अर्थ (Hindi)

    नाथ कृपा करि पूँछेहु जैसें। मानहु कहा क्रोध तजि तैसें।।

  596. RCM 5.54.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मिला जाइ जब अनुज तुम्हारा। जातहिं राम तिलक तेहि सारा।।

    अर्थ (Hindi)

    मिला जाइ जब अनुज तुम्हारा। जातहिं राम तिलक तेहि सारा।।

  597. RCM 5.54.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रावन दूत हमहि सुनि काना। कपिन्ह बाँधि दीन्हे दुख नाना।।

    अर्थ (Hindi)

    रावन दूत हमहि सुनि काना। कपिन्ह बाँधि दीन्हे दुख नाना।।

  598. RCM 5.54.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    श्रवन नासिका काटै लागे। राम सपथ दीन्हे हम त्यागे।।

    अर्थ (Hindi)

    श्रवन नासिका काटै लागे। राम सपथ दीन्हे हम त्यागे।।

  599. RCM 5.54.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पूँछिहु नाथ राम कटकाई। बदन कोटि सत बरनि न जाई।।

    अर्थ (Hindi)

    पूँछिहु नाथ राम कटकाई। बदन कोटि सत बरनि न जाई।।

  600. RCM 5.54.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नाना बरन भालु कपि धारी। बिकटानन बिसाल भयकारी।।

    अर्थ (Hindi)

    नाना बरन भालु कपि धारी। बिकटानन बिसाल भयकारी।।

  601. RCM 5.54.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जेहिं पुर दहेउ हतेउ सुत तोरा। सकल कपिन्ह महँ तेहि बलु थोरा।।

    अर्थ (Hindi)

    जेहिं पुर दहेउ हतेउ सुत तोरा। सकल कपिन्ह महँ तेहि बलु थोरा।।

  602. RCM 5.54.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अमित नाम भट कठिन कराला। अमित नाग बल बिपुल बिसाला।।

    अर्थ (Hindi)

    अमित नाम भट कठिन कराला। अमित नाग बल बिपुल बिसाला।।

  603. RCM 5.54.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    द्विबिद मयंद नील नल अंगद गद बिकटासि।

    अर्थ (Hindi)

    द्विबिद मयंद नील नल अंगद गद बिकटासि।

  604. RCM 5.54.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    दधिमुख केहरि निसठ सठ जामवंत बलरासि।।54।।

    अर्थ (Hindi)

    दधिमुख केहरि निसठ सठ जामवंत बलरासि।।54।।

  605. RCM 5.55.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    ए कपि सब सुग्रीव समाना। इन्ह सम कोटिन्ह गनइ को नाना।।

    अर्थ (Hindi)

    ए कपि सब सुग्रीव समाना। इन्ह सम कोटिन्ह गनइ को नाना।।

  606. RCM 5.55.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम कृपाँ अतुलित बल तिन्हहीं। तृन समान त्रेलोकहि गनहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    राम कृपाँ अतुलित बल तिन्हहीं। तृन समान त्रेलोकहि गनहीं।।

  607. RCM 5.55.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अस मैं सुना श्रवन दसकंधर। पदुम अठारह जूथप बंदर।।

    अर्थ (Hindi)

    अस मैं सुना श्रवन दसकंधर। पदुम अठारह जूथप बंदर।।

  608. RCM 5.55.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नाथ कटक महँ सो कपि नाहीं। जो न तुम्हहि जीतै रन माहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    नाथ कटक महँ सो कपि नाहीं। जो न तुम्हहि जीतै रन माहीं।।

  609. RCM 5.55.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    परम क्रोध मीजहिं सब हाथा। आयसु पै न देहिं रघुनाथा।।

    अर्थ (Hindi)

    परम क्रोध मीजहिं सब हाथा। आयसु पै न देहिं रघुनाथा।।

  610. RCM 5.55.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सोषहिं सिंधु सहित झष ब्याला। पूरहीं न त भरि कुधर बिसाला।।

    अर्थ (Hindi)

    सोषहिं सिंधु सहित झष ब्याला। पूरहीं न त भरि कुधर बिसाला।।

  611. RCM 5.55.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मर्दि गर्द मिलवहिं दससीसा। ऐसेइ बचन कहहिं सब कीसा।।

    अर्थ (Hindi)

    मर्दि गर्द मिलवहिं दससीसा। ऐसेइ बचन कहहिं सब कीसा।।

  612. RCM 5.55.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गर्जहिं तर्जहिं सहज असंका। मानहु ग्रसन चहत हहिं लंका।।

    अर्थ (Hindi)

    गर्जहिं तर्जहिं सहज असंका। मानहु ग्रसन चहत हहिं लंका।।

  613. RCM 5.55.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    -सहज सूर कपि भालु सब पुनि सिर पर प्रभु राम।

    अर्थ (Hindi)

    -सहज सूर कपि भालु सब पुनि सिर पर प्रभु राम।

  614. RCM 5.55.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रावन काल कोटि कहु जीति सकहिं संग्राम।।55।।

    अर्थ (Hindi)

    रावन काल कोटि कहु जीति सकहिं संग्राम।।55।।

  615. RCM 5.56.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम तेज बल बुधि बिपुलाई। सेष सहस सत सकहिं न गाई।।

    अर्थ (Hindi)

    राम तेज बल बुधि बिपुलाई। सेष सहस सत सकहिं न गाई।।

  616. RCM 5.56.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सक सर एक सोषि सत सागर। तब भ्रातहि पूँछेउ नय नागर।।

    अर्थ (Hindi)

    सक सर एक सोषि सत सागर। तब भ्रातहि पूँछेउ नय नागर।।

  617. RCM 5.56.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तासु बचन सुनि सागर पाहीं। मागत पंथ कृपा मन माहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    तासु बचन सुनि सागर पाहीं। मागत पंथ कृपा मन माहीं।।

  618. RCM 5.56.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनत बचन बिहसा दससीसा। जौं असि मति सहाय कृत कीसा।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनत बचन बिहसा दससीसा। जौं असि मति सहाय कृत कीसा।।

  619. RCM 5.56.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सहज भीरु कर बचन दृढ़ाई। सागर सन ठानी मचलाई।।

    अर्थ (Hindi)

    सहज भीरु कर बचन दृढ़ाई। सागर सन ठानी मचलाई।।

  620. RCM 5.56.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मूढ़ मृषा का करसि बड़ाई। रिपु बल बुद्धि थाह मैं पाई।।

    अर्थ (Hindi)

    मूढ़ मृषा का करसि बड़ाई। रिपु बल बुद्धि थाह मैं पाई।।

  621. RCM 5.56.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सचिव सभीत बिभीषन जाकें। बिजय बिभूति कहाँ जग ताकें।।

    अर्थ (Hindi)

    सचिव सभीत बिभीषन जाकें। बिजय बिभूति कहाँ जग ताकें।।

  622. RCM 5.56.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि खल बचन दूत रिस बाढ़ी। समय बिचारि पत्रिका काढ़ी।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि खल बचन दूत रिस बाढ़ी। समय बिचारि पत्रिका काढ़ी।।

  623. RCM 5.56.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रामानुज दीन्ही यह पाती। नाथ बचाइ जुड़ावहु छाती।।

    अर्थ (Hindi)

    रामानुज दीन्ही यह पाती। नाथ बचाइ जुड़ावहु छाती।।

  624. RCM 5.56.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिहसि बाम कर लीन्ही रावन। सचिव बोलि सठ लाग बचावन।।

    अर्थ (Hindi)

    बिहसि बाम कर लीन्ही रावन। सचिव बोलि सठ लाग बचावन।।

  625. RCM 5.56.11
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बातन्ह मनहि रिझाइ सठ जनि घालसि कुल खीस।

    अर्थ (Hindi)

    बातन्ह मनहि रिझाइ सठ जनि घालसि कुल खीस।

  626. RCM 5.56.12
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम बिरोध न उबरसि सरन बिष्नु अज ईस।।56(क)।।

    अर्थ (Hindi)

    राम बिरोध न उबरसि सरन बिष्नु अज ईस।।56(क)।।

  627. RCM 5.56.13
    📖 Open verse-by-verse reader#

    की तजि मान अनुज इव प्रभु पद पंकज भृंग।

    अर्थ (Hindi)

    की तजि मान अनुज इव प्रभु पद पंकज भृंग।

  628. RCM 5.56.14
    📖 Open verse-by-verse reader#

    होहि कि राम सरानल खल कुल सहित पतंग।।56(ख)।।

    अर्थ (Hindi)

    होहि कि राम सरानल खल कुल सहित पतंग।।56(ख)।।

  629. RCM 5.57.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनत सभय मन मुख मुसुकाई। कहत दसानन सबहि सुनाई।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनत सभय मन मुख मुसुकाई। कहत दसानन सबहि सुनाई।।

  630. RCM 5.57.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भूमि परा कर गहत अकासा। लघु तापस कर बाग बिलासा।।

    अर्थ (Hindi)

    भूमि परा कर गहत अकासा। लघु तापस कर बाग बिलासा।।

  631. RCM 5.57.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कह सुक नाथ सत्य सब बानी। समुझहु छाड़ि प्रकृति अभिमानी।।

    अर्थ (Hindi)

    कह सुक नाथ सत्य सब बानी। समुझहु छाड़ि प्रकृति अभिमानी।।

  632. RCM 5.57.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनहु बचन मम परिहरि क्रोधा। नाथ राम सन तजहु बिरोधा।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनहु बचन मम परिहरि क्रोधा। नाथ राम सन तजहु बिरोधा।।

  633. RCM 5.57.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अति कोमल रघुबीर सुभाऊ। जद्यपि अखिल लोक कर राऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    अति कोमल रघुबीर सुभाऊ। जद्यपि अखिल लोक कर राऊ।।

  634. RCM 5.57.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मिलत कृपा तुम्ह पर प्रभु करिही। उर अपराध न एकउ धरिही।।

    अर्थ (Hindi)

    मिलत कृपा तुम्ह पर प्रभु करिही। उर अपराध न एकउ धरिही।।

  635. RCM 5.57.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जनकसुता रघुनाथहि दीजे। एतना कहा मोर प्रभु कीजे।

    अर्थ (Hindi)

    जनकसुता रघुनाथहि दीजे। एतना कहा मोर प्रभु कीजे।

  636. RCM 5.57.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जब तेहिं कहा देन बैदेही। चरन प्रहार कीन्ह सठ तेही।।

    अर्थ (Hindi)

    जब तेहिं कहा देन बैदेही। चरन प्रहार कीन्ह सठ तेही।।

  637. RCM 5.57.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नाइ चरन सिरु चला सो तहाँ। कृपासिंधु रघुनायक जहाँ।।

    अर्थ (Hindi)

    नाइ चरन सिरु चला सो तहाँ। कृपासिंधु रघुनायक जहाँ।।

  638. RCM 5.57.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करि प्रनामु निज कथा सुनाई। राम कृपाँ आपनि गति पाई।।

    अर्थ (Hindi)

    करि प्रनामु निज कथा सुनाई। राम कृपाँ आपनि गति पाई।।

  639. RCM 5.57.11
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रिषि अगस्ति कीं साप भवानी। राछस भयउ रहा मुनि ग्यानी।।

    अर्थ (Hindi)

    रिषि अगस्ति कीं साप भवानी। राछस भयउ रहा मुनि ग्यानी।।

  640. RCM 5.57.12
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बंदि राम पद बारहिं बारा। मुनि निज आश्रम कहुँ पगु धारा।।

    अर्थ (Hindi)

    बंदि राम पद बारहिं बारा। मुनि निज आश्रम कहुँ पगु धारा।।

  641. RCM 5.57.13
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीन दिन बीति।

    अर्थ (Hindi)

    बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीन दिन बीति।

  642. RCM 5.57.14
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति।।57।।

    अर्थ (Hindi)

    बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति।।57।।

  643. RCM 5.58.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लछिमन बान सरासन आनू। सोषौं बारिधि बिसिख कृसानू।।

    अर्थ (Hindi)

    लछिमन बान सरासन आनू। सोषौं बारिधि बिसिख कृसानू।।

  644. RCM 5.58.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीती। सहज कृपन सन सुंदर नीती।।

    अर्थ (Hindi)

    सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीती। सहज कृपन सन सुंदर नीती।।

  645. RCM 5.58.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    ममता रत सन ग्यान कहानी। अति लोभी सन बिरति बखानी।।

    अर्थ (Hindi)

    ममता रत सन ग्यान कहानी। अति लोभी सन बिरति बखानी।।

  646. RCM 5.58.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    क्रोधिहि सम कामिहि हरि कथा। ऊसर बीज बएँ फल जथा।।

    अर्थ (Hindi)

    क्रोधिहि सम कामिहि हरि कथा। ऊसर बीज बएँ फल जथा।।

  647. RCM 5.58.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा। यह मत लछिमन के मन भावा।।

    अर्थ (Hindi)

    अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा। यह मत लछिमन के मन भावा।।

  648. RCM 5.58.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    संघानेउ प्रभु बिसिख कराला। उठी उदधि उर अंतर ज्वाला।।

    अर्थ (Hindi)

    संघानेउ प्रभु बिसिख कराला। उठी उदधि उर अंतर ज्वाला।।

  649. RCM 5.58.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मकर उरग झष गन अकुलाने। जरत जंतु जलनिधि जब जाने।।

    अर्थ (Hindi)

    मकर उरग झष गन अकुलाने। जरत जंतु जलनिधि जब जाने।।

  650. RCM 5.58.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कनक थार भरि मनि गन नाना। बिप्र रूप आयउ तजि माना।।

    अर्थ (Hindi)

    कनक थार भरि मनि गन नाना। बिप्र रूप आयउ तजि माना।।

  651. RCM 5.58.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    काटेहिं पइ कदरी फरइ कोटि जतन कोउ सींच।

    अर्थ (Hindi)

    काटेहिं पइ कदरी फरइ कोटि जतन कोउ सींच।

  652. RCM 5.58.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पइ नव नीच।।58।।

    अर्थ (Hindi)

    बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पइ नव नीच।।58।।

  653. RCM 5.59.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे। छमहु नाथ सब अवगुन मेरे।।

    अर्थ (Hindi)

    सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे। छमहु नाथ सब अवगुन मेरे।।

  654. RCM 5.59.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गगन समीर अनल जल धरनी। इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी।।

    अर्थ (Hindi)

    गगन समीर अनल जल धरनी। इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी।।

  655. RCM 5.59.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तव प्रेरित मायाँ उपजाए। सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए।।

    अर्थ (Hindi)

    तव प्रेरित मायाँ उपजाए। सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए।।

  656. RCM 5.59.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रभु आयसु जेहि कहँ जस अहई। सो तेहि भाँति रहे सुख लहई।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रभु आयसु जेहि कहँ जस अहई। सो तेहि भाँति रहे सुख लहई।।

  657. RCM 5.59.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रभु भल कीन्ही मोहि सिख दीन्ही। मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्ही।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रभु भल कीन्ही मोहि सिख दीन्ही। मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्ही।।

  658. RCM 5.59.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी।।

    अर्थ (Hindi)

    ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी।।

  659. RCM 5.59.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई। उतरिहि कटकु न मोरि बड़ाई।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई। उतरिहि कटकु न मोरि बड़ाई।।

  660. RCM 5.59.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रभु अग्या अपेल श्रुति गाई। करौं सो बेगि जौ तुम्हहि सोहाई।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रभु अग्या अपेल श्रुति गाई। करौं सो बेगि जौ तुम्हहि सोहाई।।

  661. RCM 5.59.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनत बिनीत बचन अति कह कृपाल मुसुकाइ।

    अर्थ (Hindi)

    सुनत बिनीत बचन अति कह कृपाल मुसुकाइ।

  662. RCM 5.59.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जेहि बिधि उतरै कपि कटकु तात सो कहहु उपाइ।।59।।

    अर्थ (Hindi)

    जेहि बिधि उतरै कपि कटकु तात सो कहहु उपाइ।।59।।

  663. RCM 5.60.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नाथ नील नल कपि द्वौ भाई। लरिकाई रिषि आसिष पाई।।

    अर्थ (Hindi)

    नाथ नील नल कपि द्वौ भाई। लरिकाई रिषि आसिष पाई।।

  664. RCM 5.60.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तिन्ह के परस किएँ गिरि भारे। तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे।।

    अर्थ (Hindi)

    तिन्ह के परस किएँ गिरि भारे। तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे।।

  665. RCM 5.60.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मैं पुनि उर धरि प्रभुताई। करिहउँ बल अनुमान सहाई।।

    अर्थ (Hindi)

    मैं पुनि उर धरि प्रभुताई। करिहउँ बल अनुमान सहाई।।

  666. RCM 5.60.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एहि बिधि नाथ पयोधि बँधाइअ। जेहिं यह सुजसु लोक तिहुँ गाइअ।।

    अर्थ (Hindi)

    एहि बिधि नाथ पयोधि बँधाइअ। जेहिं यह सुजसु लोक तिहुँ गाइअ।।

  667. RCM 5.60.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एहि सर मम उत्तर तट बासी। हतहु नाथ खल नर अघ रासी।।

    अर्थ (Hindi)

    एहि सर मम उत्तर तट बासी। हतहु नाथ खल नर अघ रासी।।

  668. RCM 5.60.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि कृपाल सागर मन पीरा। तुरतहिं हरी राम रनधीरा।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि कृपाल सागर मन पीरा। तुरतहिं हरी राम रनधीरा।।

  669. RCM 5.60.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देखि राम बल पौरुष भारी। हरषि पयोनिधि भयउ सुखारी।।

    अर्थ (Hindi)

    देखि राम बल पौरुष भारी। हरषि पयोनिधि भयउ सुखारी।।

  670. RCM 5.60.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सकल चरित कहि प्रभुहि सुनावा। चरन बंदि पाथोधि सिधावा।।

    अर्थ (Hindi)

    सकल चरित कहि प्रभुहि सुनावा। चरन बंदि पाथोधि सिधावा।।

  671. RCM 5.60.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    निज भवन गवनेउ सिंधु श्रीरघुपतिहि यह मत भायऊ।

    अर्थ (Hindi)

    निज भवन गवनेउ सिंधु श्रीरघुपतिहि यह मत भायऊ।

  672. RCM 5.60.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    यह चरित कलि मलहर जथामति दास तुलसी गायऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    यह चरित कलि मलहर जथामति दास तुलसी गायऊ।।

  673. RCM 5.60.11
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुख भवन संसय समन दवन बिषाद रघुपति गुन गना।।

    अर्थ (Hindi)

    सुख भवन संसय समन दवन बिषाद रघुपति गुन गना।।

  674. RCM 5.60.12
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तजि सकल आस भरोस गावहि सुनहि संतत सठ मना।।

    अर्थ (Hindi)

    तजि सकल आस भरोस गावहि सुनहि संतत सठ मना।।

  675. RCM 5.60.13
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान।

    अर्थ (Hindi)

    सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान।

  676. RCM 5.60.14
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान।।60।।

    अर्थ (Hindi)

    सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान।।60।।